भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८५२ भावप्रकाशनिघण्टुः नोट-गलती से इसे कहीं-कहीं कलिहारी माना जाता है। इसी प्रकार कुष्ठ के नाम से भी इसका गलत उपयोग, विशेष रूप से दक्षिण में होता है। रासायनिक संगठन-इसमें स्टार्च होता है। गुण और प्रयोग-इसे बल्य, कुछ विरेचन, रक्तशोधक एवं कृमिनाशक मानते हैं। इसके ताजे कंदों का मुरब्बा रुचिकारक एवं पौष्टिक मानते हैं। हड्डियों में पीड़ा होने पर इसका उपयोग करते हैं। नवीन प्रयोगों से देखा गया है कि कलिहारी की तुलना में इसमें गर्भाशय संकोचक, गुण अधिक होता है (कु० प्रे० तिवारी तथा अन्य; आ० अनु० पत्रिका, भाग १, अंक २)। अथ कसेरू, चिचोढं च। तयोर्गुणानाह कसेरु द्विविधं तत्तु महद्राजकसेरुकम्। मुस्ताकृति लघु स्याद्यत्तच्चिचोढमिति स्मृतम् ।।११२।। कसेरुकद्वयं शीतं मधुरं तुवरं गुरु। पित्तशोणितदाहघ्नं नयनामयनाशनम्। ग्राहि शुक्रानिलश्लेष्मारुचिस्तन्यकरं स्मृतम् ।।११३।। कसेरू के भेद-(१) बड़ा, (२) छोटा, भेद से कसेरू दो प्रकार का होता। उनके संस्कृत नाम-जो बड़ा कसेरू होता है उसे “राजकसेरुक” कहते हैं और छोटा मोथे के समान आकार वाला होता है उसे “चिचोढ़” कहते हैं। दोनों प्रकार के कसेरू-शीतल, मधुर तथा कषाय रसयुक्त, गुरु, ग्राही एवम्-शुक्र, वायु, कफ, अरुचि तथा दुग्धवर्धक होते हैं और पित्त, रक्तविकार, दाह, नेत्ररोग इन सबका नाश करने वाले होते हैं। [११२-११३] ६९. कसेरू हिं०-कसेरू। बं०-केसूर । म०-कचरा। अं०-Water chestnut (वाटर चेस्टनट)। ले०-Scirpus kysoor Roxb. (स्किर्पस् काय्सूर)। Fam. Cyperaceae (साइपेरेसी)। सभी प्रान्तों में यह होता है। इसके पौधे-तालाबों में प्रायः एक फुट या अधिक गहरे पानी में होते हैं। काण्ड-४ से ६ फीट ऊँचा तथा ३ पहल का होता है। पत्ते-एक इञ्च चौड़े तथा काण्ड के बराबर या कुछ कम लम्बे होते हैं। पुष्प मंजरी-करीब-करीब ३ फीट लम्बी होती है। फल-छोटे, धूसर या कृष्णवर्ण के होते हैं। कन्द-ऊपर से काले रंग के, अंदर से श्वेत, जायफल इतने बड़े एवं कुछ गोलाई लिये हुये होते हैं। इनका स्वाद कुछ मधुर एवं सुगन्धित होता है। स्कि. आर्टिक्युलेटस् (S. articulatus Linn.) तथा साइपेरस् एस्क्यूलेन्टस् (Cyperus esculentus Linn.) के कन्दों को जो कसेरू जैसे ही होते हैं 'चिचोडा' कहा जाता है जो भावप्रकाशोक्त चिचोढ हैं। कसेरू को भून कर, उबाल कर या वैसे ही खाया जाता है। रासायनिक संगठन-इसमें कार्बोहाइड्रेट ६३, प्रोटीन ७, गोंद ७, रेशा ६ एवं राख २.५ भाग होती है। गुण और प्रयोग-यह मधुर, शीत, ग्राही, कफ-वातवर्धक, शुक्रल तथा स्तन्य है। इसका उपयोग तृषा, दाह, अतिसार एवं वमन में किया जाता है। गर्भावस्था में गर्भपात की संभावना होने पर तथा प्रसूता को दुग्धवृद्धि के लिये इसे देते हैं। हैजे में इसे गुलाबजल में पीस कर पिलातें हैं जिससे प्यास कम होती है, दस्त एवं वमन कम होता है तथा हृदय को बल भी मिलता है। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA