भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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शाकवर्गः ८५३ अथ शालूकम् भिस्साण्डञ्च । तयोर्नामानि गुणाँश्चाह पद्मादिकन्दः शालूकं करहाटश्च कथ्यते ।।११४।। मृणालमूलं भिस्साण्डं १जलालूकञ्च कथ्यते । शालूकं शीतलं वृष्यं पित्तदाहास्त्रनुद् गुरु ।।११५।। दुर्जरं स्वादुपाकश्च स्तन्यानिलकफप्रदम् । संग्राही मधुरं रूक्षं भिस्साण्डमपि तद्गुणम् ।।११४।। कमल आदि के कन्दों के संस्कृत नाम—कमलकन्द, शालूक तथा करहाट ये सब हैं। मृणाल (कमल के नाल) के मूल भाग के संस्कृत नाम—मृणालमूल, भिस्साण्ड और जलालूक ये सब हैं। कमलकन्द—शीतल, वीर्यवर्धक, गुरु, कठिनता से हजम होने वाला, दुग्ध, वायु तथा कफ को करने वाला, ग्राही, रूक्ष, मधुर रसयुक्त, विपाक में भी मधुर एवम्—पित्त, दाह और रक्तविकार को दूर करने वाला होता है। भसींडा—गुणों में कमल कन्द के ही समान होता है। [११४-११६] ७०. कमलकन्द, भसींडा वास्तव में भसींडा यह कमल के नाल का आधारीय भाग है जो मोटा तथा लम्बा होता है एवं कुमुद में आधारीय भाग कन्दवत् होता है। कमल का पूर्ण परिचय पुष्पादिपर्व (पृष्ठ ६४०) में दिया गया है। अथ निषिद्धशाकान्याह बालं ह्यनार्त्तवं जीर्णं व्याधितं कृमिभक्षितम् । कन्दं विवर्जयेत्सर्वं यद्वाऽग्न्यादिविदूषितम् । अतिजीर्णमकालोत्थं रूक्षसिद्धमदेशजम् ।।११७।। कर्कशं कोमलं चातिशीतव्यालादिदूषितम् । संशुष्कं सकलं शाकं नाश्नीयान्मूलकं विना ।।११८।। निषिद्ध (न खाने योग्य)—जो कन्द-कच्चा, बिना ऋतु के (असमय में) होने वाला, पुराना, रोगयुक्त, कीड़ों से खाया हुआ अर्थात् जिसमें कीड़े आदि पड़े हों या खाये हों अथवा अग्नि आदि से दूषित हो गये हों उन सबों को त्याग देना चाहिये। जो शाक—अत्यन्त पुराना, अकाल में उत्पन्न हुआ, बिना तेल आदि के पकाया हुआ, अशुभ स्थान श्मशान आदि में उत्पन्न हुआ, कठिन, कोमल, अत्यन्त शीत पड़ने तथा सर्पादि से दूषित हुआ हो उसे त्याग देना चाहिये। एवम्—सभी सूखे शाक नहीं खाने चाहिये, किन्तु मूली के लिये यह नियम नहीं है, उसे सूखी भी खा सकते हैं। [११७-११८] रूक्षसिद्धम् = अतैलादिसिद्धम् । अदेशजम् = अशुभस्थानजम् ।।११७-११८।। यहाँ पर मूल में "रूक्षसिद्ध" पद का "बिना तेल आदि के पकाया हुआ" तथा "अदेशज" पद का "अशुभ स्थान श्मशान आदि में उत्पन्न हुआ" अर्थ समझना चाहिये। [११७-११८] ।। इति कन्दशाकानि ।। अथ संस्वेदजशाकानि । तेषां नामानि गुणानाह उक्तं सस्वेदजं शाकं भूमिच्छत्रं शिलीन्ध्रकम् । क्षितिगोमयकाष्ठेषु वृक्षादिषु तदुद्भवेत् ।।११९।। सर्वे संस्वेदजाः शीता दोषालाः पिच्छिलाश्च ते । गुरवश्छर्द्यतीसारज्वरश्लेष्मामयप्रदाः ।।१२०।। श्वेताश्शुचिस्थलीकाष्ठवंशगोमयसम्भवाः । नातिदोषकरास्ते स्युः शेषास्तेभ्यो विगर्हिताः ।।१२१।। संस्वेदज शाक के संस्कृत नाम—संस्वेदज, भूमिच्छत्र और शिलीन्ध्रक ये सब हैं। १. जलालूबं इति पाठ० ।