भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८५४ भावप्रकाशनिघण्टुः उत्पत्ति स्थान—संस्वेदज शाक—पृथ्वी, गोबर, काष्ठ तथा वृक्षादिकों पर उत्पन्न होता है । संस्वेदज शाक—शीतल, दोषकारक, पिच्छिल, गुरु एवम्—वमन, अतिसार, ज्वर और कफ सम्बन्धी रोगों को उत्पन्न करने वाले होते हैं । किन्तु जो संस्वेदक शाक—श्वेत वर्णवाले, पवित्र स्थान, काष्ठ, बाँस तथा गोबर पर उत्पन्न होने वाले होते हैं, वे अत्यन्त दोषकारक नहीं (साधारण दोषकारक) होते हैं । शेष अर्थात् इनसे अन्य स्थान में उत्पन्न होने वाले संस्वेदज शाक निन्दित (त्याज्य) होते हैं । [११९-१२१] ७१. छत्रक हिं०—भुईं छत्ता, भुई फोड़ छत्ता छतोना, छाता, साँप की छत्री, खुमी, धरतीफूल । बं०—कोड़क छाता, व्यांगेर छाता, छातकुड़, भुई छाति, छात कुण्ड । पं०—ब्लेओफोरे । सि०—खुम्भी । म०—अलम्बे । गु०—बिलाडीनो रोम । अं०—Mush-room (मशरूम) । ले०—Agaricus campe stris Linn. (एगेरिकस् कॅम्पेस्ट्रिस्) । Fam. Agaricaceae (एगेरिकेसी) । यह सभी प्रांतों में होता है किन्तु पंजाब में अधिक होता है । भुईं छात्ता—वर्षाऋतु में आप ही आप जमीन फोड़कर उत्पन्न होता है । यह खाद की ढेरी पर अधिक होता है । इसका क्षुप—६-७ इञ्च ऊँचा होता है और इसमें कोई डाली नहीं होती, केवल एक डण्डी जो जमीन फोड़ कर निकलती है उस पर गोल छत्ते के आकार का एक छत्र होता है । छत्र के नीचे की सतह से पतले परदे लटकते हैं जिन्हें गिल (Gill) कहा जाता है जिसमें अनेक बीजाणु (Spores) रहते हैं । छत्रक के अनेक प्रकार होते हैं जिनमें से कुछ विषैले होते हैं । निम्नलिखित लक्षणों से यद्यपि इसका ज्ञान हो सकता है तथापि अनुभव के आधार पर ही इसका आसानी से ज्ञान होता है । जब तक निश्चित ज्ञान न हो तब तक इनका प्रयोग उचित नहीं है । इनकी उपज भी की जाती है । निर्विष के लक्षण—छोटे, शीर्ष का भाग २ से ४ इञ्च चौड़ा, दुर्गन्धहीन, श्वेत या गुलाबी, गिल गुलाबी, कांड से अलग तथा बीजाणु गहरे बैंगनी, ठोस, घासं या कचरे के ढेर पर होने वाले, छत्र के नीचे कांड पर वलययुक्त प्रायः विषैले नहीं होते । विषैले छत्रक—बहुत भंगुर या कड़े, छत्र चमकीला, पतला, गिल समान लम्बाई के, गढ़े में उत्पन्न, कृमि द्वारा खाये हुए, तोड़ने पर नीले रंग के, दुर्गन्धयुक्त, स्वाद में कड़वे, अम्ल, खराब, डण्ठल के आधार भाग पर कटोरी जैसी रचना युक्त, पकाने पर चमकीले पीले हो जाने वाले, छायादार स्थान में होने वाले एवं दुग्ध जैसे रसयुक्त अखाद्य होते हैं । गुण और प्रयोग—यह पौष्टिक एवं कामवर्धक होते हैं । मांस के समान यह पौष्टिक है । इसका साग आमाशय की दुर्बलता से उत्पन्न दुर्बलता तथा कृशता में दिया जाता है । क्षय में दूध तथा शर्करा के साथ इसे उबालकर देते हैं । मात्रा—५ से १० तोला । इति श्रीमिश्रलटकनतनय श्रीमिश्रभावविरचिते भावप्रकाशे वर्गप्रकरणे शाकवर्गः समाप्त ।