भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

पृष्ठ 906, कुल 1167 में से

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पृष्ठ 906

अथ मांसवर्गः

अथ मांसम् । तस्य नामानि गुणाँश्चाह

मांसं तु पिशितं क्रव्यमामिषं पललं पलम् । मांसं वातहरं सर्वं बृंहणं बलपुष्टिकृत् ।। प्रीणनं गुरु हृद्यञ्च मधुरं रसपाकयोः ।। १ ।। मांसवर्ग में प्रथम मांस के संस्कृत नाम-मांस, पिशित, क्रव्य, आमिष, पलल तथा पल ये हैं । सभी मांस- रस तथा विपाक में मधुर रसयुक्त, बृंहण (रस रक्तादि वर्धक), बल तथा पुष्टि के करने वाले, सन्तर्पण कारक, गुरु, हृदय के लिये हितकर तथा वातनाशक होते हैं । [१]

अथ मांसभेदानाह

मांसवर्गो द्विधा ज्ञेयो जाङ्गलाानूपभेदतः ।। २ ।। मांस के भेद—मांसवर्ग दो भागों में विभक्त है, (१)—जाङ्गल (जङ्गली जीवों के) मांस (२)—आनूप (जल के समीप या जल में रहने वाले जीवों के) मांस । [२]

अथ जाङ्गलमांसस्य भेदान् गुणाँश्चाह

मांसवर्गेऽत्र जङ्घाला विलस्थाश्च गुहाशयाः । तथा पर्णमृगा ज्ञेया विष्किराः प्रतुदस्तथा ।। ३ ।। प्रसहा अथ च ग्राम्या अष्टौ जाङ्गलजातयः । जाङ्गला मधुरा रूक्षास्तुवरा लघवस्तथा ।। ४ ।। बल्यास्ते बृंहणं वृष्या दीपना दोषहारिणः । मूकतां मिन्मिनत्वं च गद्गदत्वार्दिते तथा ।। ५ ।। बाधिर्यमरुचिच्छर्दिप्रमेहमुखजान् गदान् । श्लीपदं गलगण्डञ्च नाशयन्त्यनिलामयान् ।। ६ ।। जाङ्गल मांस के भेद—इस मांसवर्ग में—(१) जङ्घाल (जङ्घा के बल से चलने वाले), (२) बिलस्थ (बिल में रहने वाले), (३) गुहाशय (गुफा में सोने वाले), (४) पर्णमृग (वृक्षों पर चढ़ने वाले), (५) विष्किर (कुरेद २ कर खाने वाले), (६) प्रतुद (चोंच से पदार्थ को निकाल कर खाने वाले) (७) प्रसह (जबरदस्ती से छीन कर खाने वाले), (८) ग्राम्य (ग्राम में रहने वाले) ये ८ जातियाँ “जाङ्गल” होती हैं । इन्हीं का मांस “जाङ्गल” मांस कहलाता है । जाङ्गल मांस—मधुर तथा कषाय रसयुक्त, रूक्ष, लघु, बलकारक, बृंहण (रसरक्तादि वर्धक), वीर्यवर्धक, अग्निदीपक, दोषनाशक एवम्—मूकता (गुँगापन), मिन्मिनापन, तोतलापन, अर्दितवात (मुँह का लकवा), बहिरापन, अरुचि, वमन, प्रमेह, मुख में होने वाले रोग, श्लीपद (फीलपाँव), गलगण्ड औश्च वातसम्बन्धी रोग को दूर करने वाला होता है । [३-६]

अथानूपमांसस्य भेदान् गुणाँश्चाह

कूलेचराः प्लवाश्चापि कोशस्थाः पादिनस्तथा । मत्स्या एते समाख्याताः पञ्चधाऽऽनूपजातयः ।। ७ ।। अनूपा मधुराः स्निग्धा गुरवो वह्निसादनाः । श्लेष्मलाः पिच्छिलाश्चापि मांसपुष्टिप्रदा भृशम् ।। तथाऽभिष्यन्दिनस्ते हि प्रायः पथ्यतमाः स्मृताः ।। ८ ।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

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