भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंशाकवर्गः ८४१ आकार में मुर्गे के अण्डे के समान होता है। सफेद बैंगन-अर्श में विशेष करके हितकर होता है और पूर्वोक्त बैंगन की अपेक्षा यह हीन गुण वाला होता है। [८२] ५२. भंटा हिं०-भंटा, बैंगन, बैगुन। बं०-बेगुन। म०-वांगे, वांगी। गु०-रिङ्गणा, वेंगण, वंताक। क०-बदने। ते०-वंकाया। ता०-कत्तरिक्काइ। फा०-बांदगान। अ०-वार्द जान, वादंजान, बाजं जान। अं०-Brinjal (ब्रिझल); Egg-Plant (एग प्लॅण्ट)। ले०-Solanum melongena Linn. (सोलेनम् मेलोंगेना)। Fam. Solanaceae (सोलेनेसी)। यह गुडूच्यादि वर्गोक्त बृहती के अन्तर्गत वर्णित एक जाति का कृषित प्रकार है। यह प्रसिद्ध फल शाक प्रायः सब प्रान्तों में उत्पन्न होता है। इसका क्षुप-३ फुट तक ऊँचा होता है। पत्ते-वन भाँटे के समान परन्तु इनसे लम्बे चौड़े होते हैं। फूल-कंटकारी के समान बैंगनी रंग के और फल-गोल लम्बे होते हैं। किसी के फल गोल, हरे और बैंगनी रंग के, किसी के गोलाई लिये लम्बे सफेद होते हैं। गुण और प्रयोग-इसके वन्य प्रकार का बृहती की तरह उपयोग होता है। कृषित का शाकार्थ उपयोग करते हैं। अथ डिण्डिशः (टिंडा) तस्य नामगुणानाह डिण्डिशो रोमशफलो मुनिनिर्मित इत्यपि ।।८३।। डिण्डिशो रुचिकृद्भेदी पित्तश्लेष्मापहः स्मृतः । सुशीतो वातलो रूक्षो मूत्रलश्चाश्मरीहरः ।।८४।। टिंडा के संस्कृत नाम-डिण्डिश, रोमशफल तथा मुनिनिर्मित ये सब हैं। टिंडा-रुचिकारक, मलभेदक, अत्यन्त शीतल, वातजनक, रूक्ष, मूत्र लाने वाला एवम् पित्त, कफ तथा पथरी को दूर करने वाला होता है। [८३-८४] ५३. टिंडा हिं०-ढेंड़स, टिंडा। म०-ढेंडेसे, दिंडशी। ले०-Citrullus vulgaris var. fistulosus (सिट्रुलस् वल्गेरिस् प्रकार फिस्चुलोसस्)। Fam. Cucurbitaceae (कुकुर्बिटेसी)। उत्तर प्रदेश, पंजाब तथा बम्बई में इसकी उपज की जाती है। इसका क्षुप-आरोही या प्रसरणशील होता है तथा काण्ड दृढ़ होता हैं। इसके फल-छोटे, बड़े, २-३ इञ्च व्यास के गोल, हलके या गहरे हरे रंग के होते हैं। बीज-कुछ कृष्णाभ होते हैं। इनमें से हलके रंग के फल अधिक अच्छे होते हैं। रासायनिक संगठन-इसमें आर्द्रता ९२.३, प्रोटीन १.७, स्नेह ०.१, खनिज ०.६, कार्बोहाइड्रेट ५.३, खटिक ०.०२, फास्फोरस ०.०३%, लोह ०.९ मि० ग्राम प्र० १०० ग्रा०, विटामिन 'ए' २८ अ० एकक् प्रति १०० ग्रा० आदि पाये जाते हैं। गुण और प्रयोग-इसका फल शाकार्थ व्यवहार में लाते हैं। बीजों को सुखाकर भूनकर उपयोग में लाते हैं। अथ पिण्डारम् (पिण्डार)। तस्य गुणानाह पिण्डारं शीतलं बल्यं पित्तघ्नं रुचिकारकम् । पाके लघु विशेषेण विषशान्तिकरं स्मृतम् ।।८५।। पिण्डालू-शीतल, बलकारक, पित्तनाशक, रुचिकारक, विपाक में लघु होता है। एवम्-यह विशेष करके विष का शमन करने वाला होता है। [८५]