भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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पृष्ठ 893

८४२ भावप्रकाशनिघण्टुः ५४. पिंडार हिं०-पिंडार, पिंडारी, पिंडारू, पिंडालु। बं०-पिरालो। गु०-गंगेडा। म०-पेंढर, पेंढारी, पेंढ्र, पेंदूर। क०- पेरालु। ते०, ता०-नलैक। ले०-Randia uliginosa DC. (रॅण्डिया युलिजिनोसा)। Fam. Rubiaceae (रूबिएसी)। यह पूर्व, मध्य, पश्चिम तथा दक्षिण भारत में होता है। उत्तर में कम होता है। इसके वृक्ष-छोटे; टहनियाँ मोटी और कृष्णाभ; काँटे कम; पत्ते-अंडाकार, आयताकार या कभी-कभी अभिलट्वाकार, २-८ x १-४ इञ्च बड़े, टहनियों पर गुच्छाकार क्रम में निकले हुये; पुष्प-१-२ इञ्च व्यास के बड़े, श्वेत, सुगंधित फल-मांसल, दीर्घवृत्ताभ, २-२.५ इञ्च व्यास के, पकने पर पीले, चिकने तथा अमरूद की तरह दिखलाई देते हैं। कच्चे फल का शाकार्थ उपयोग करते हैं। नोट-पिंडार नाम एक अन्य वृक्ष ट्रेविआ न्यूडिफ्लोरा (Trewia nudiflora Linn.) को भी लिखा मिलता है जिसका गंभारी के स्थान पर कहीं-कहीं प्रयोग किया जाता है। उसका वर्णन पृष्ठ २७८ पर किया जा चुका है। यहाँ शाकवर्ग में जिसका वर्णन आया है वह उपर्युक्त रँ. युलिजिनोसा है। इसके गुणों में विषघ्न गुण भी लिखा हुआ है। इस वृक्ष का स्थानिक नाम 'गद पिडार' भी मिलता है जो इसके अगद के रूप में व्यवहार का द्योतक है। शाकार्थ इसके फल का उपयोग भी करते हैं। डॉ. देसाई ने इसे 'गांगेरुक' लिखा है। गुण और प्रयोग-इसका पका फल मधुर, शीतल एवं मूत्रजनन है। कच्चा फल स्तंभन है। कच्चे फल को आग में भूनकर ऊपर का भाग अतिसार एवं आँव में देते हैं। अन्दर का बीज का भाग नहीं देते। अथ कर्कोटी (ककोडा, खेखसा) । तस्या नामानि गुणाँश्चाह कर्कोटकी पीतपुष्पा महाजालीति चोच्यते। कर्कोटी मलहत्कुष्ठहृल्लासारुचिनाशिनी। श्वासकासज्वरान्हन्ति कटुपाका च दीपनी ॥८६॥ ककोड़ा के संस्कृत नाम-कर्कोटकी, पीतपुष्पा और महाजाली ये सब हैं। ककोडा-विपाक में कटुरस युक्त, अग्निदीपक, मलनाशक एवम्-कुष्ठ, हल्लास (जी मचलाना), अरुचि, श्वास, खाँसी तथा ज्वर का नाशक है। [८६] ५५. ककोड़ा (खेखसा) हिं०-खेखसा, खेखसा, ककोड़ा, ककोरा। बं०-वनकरेला। म०-कटोली, कांटोलें। गु०-कंटोला, कोडा। ते०-आगाकर। क०-माडहा। ता०-एगारवल्लि। ले०-Momor-dica dioica, Roxb. (मोमोर्डिका डायोइका)। Fam. Cucurbitaceae (कुकुर्बिटेसी)। सभी प्रान्तों में यह होता है। इसकी लता-आरोहणशील, चिकनी एवं प्रायः दुर्गन्धयुक्त होती है। काण्ड-कोनदार होते हैं। तन्तु बिना शाखा के होते हैं। पत्ते-हृदयाकार, लट्वाकार, अखण्ड या ३ खण्ड वाले, प्रायः लहरदार दन्तुर किनारेवाले एवं २-४१/२ इञ्च व्यास के होते हैं। पुष्प-पीले होते हैं। इसमें नर एवं नारी पुष्पों की लताएँ अलग-अलग होती हैं। नर पुष्प की लता में फल न लगने के कारण उसे बाँझ खेखसा या वन्ध्याकर्कोटकी कहा जाता है। फल देने वाली, नारीपुष्प की लता होती है जिसे कर्कोटकी कहते हैं। नरपुष्प पतले एवं २ से ६ इञ्च लम्बे दण्ड से युक्त तथा नारीपुष्प के दण्ड छोटे या उतने ही बड़े होते हैं। फल-१ से ३ इञ्च लम्बा, दीर्घ वृत्ताभ एवं तीक्ष्णाग्र या अंडाकार होता है तथा इस पर मुलायम काँटे सदृश उभार होते हैं। इसमें नीचे कन्दवत् बहुवर्षायु मूल होता है जो शलगम की तरह किन्तु लम्बा, पीताभ श्वेत, गोल कंकणाकृति चिह्नों से युक्त एवं स्वाद में कसैला होता है। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA