भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंशाकवर्गः ८४३ इसकी स्त्री जाति की लता के कंद का उपयोग चिकित्सा में करते हैं। गुण और प्रयोग—इसका कंद कुछ रक्तसंग्राहक होता है। इसे रक्तार्श में देते हैं। मधुमेह में कंदचूर्ण वंगभस्म के साथ देते हैं। इसकी अधिक मात्रा से वमन होता है। इसको पीसकर इसका लेप ज्वर एवं प्रलाप में शरीर पर किया जाता है। इसके फल का चूर्ण या फांट का नस्य के लिये उपयोग करते हैं। मात्रा—१ से ५ ड्राम शर्करा के साथ। अथ डोडिका। तस्या नामानि गुणाँश्चाह डोडिका विषमुष्टिश्च डोडित्यपि सुमुष्टिका ॥८७॥ डोडिका पुष्टिदा वृष्या रुच्या वह्निप्रदा लघुः। हन्ति पित्तकफार्शांसि कृमिगुल्मविषामयान् ॥८८॥ डोडिका के संस्कृत नाम—डोडिका, विषमुष्टि, डोडी और सुमुष्टिका ये सब हैं। डोडिका—पुष्टिदायक, वीर्यवर्धक, रुचिकारक, जठराग्नि को दीप्त करने वाला, लघु एवम्—पित्त, कफ, अर्श, कृमि, गुल्म तथा विषरोग को दूर करने वाला है। [८७-८८] ५६. डोडिका नोट—इसके सम्बन्ध में मतभेद है। कोई इसे करेरुआ मानते हैं। कोई जीवन्ती शाक मानते हैं। अधिक संभावना जीवन्ती शाक की है जिसका वर्णन पहले गुडूच्यादि वर्ग (पृष्ठ ४७२) में किया जा चुका है। अथ कण्टकारीफलं (कटेरी का फल)। तस्य गुणानाह कण्टकारीफलं तिक्तं कटुकं दीपनं लघु। रूक्षोष्णं श्वासकासघ्नं ज्वरानिलकफापहम् ॥८९॥ कटेरी का फल—तिक्त तथा कटुरसयुक्त, अग्निदीपक, लघु, रूक्ष, उष्ण एवम्—श्वास, खाँसी, ज्वर, वायु तथा कफ को दूर करने वाला होता है। [८९] ५७. कंटकारी फल कंटकारी का पूर्ण परिचय गुडूच्यादि वर्ग (पृष्ठ ४६६) में दिया गया है। इति फलशाकानि। अथ नालशाकानि। तत्र सार्षपनालगुणानाह तीक्ष्णोष्णं सार्षपं नालं वातश्लेष्मव्रणापहम्। कण्डूकृमिहरं दद्रुकुष्ठघ्नं रुचिकारकम् ॥९०॥ सरसों का नाल—तीक्ष्ण, उष्ण, रुचिकारक एवम्—वात, कफ, व्रण, खुजली, कृमि, दाद तथा कुष्ठ को दूर करने वाला होता है। ५८. सरसों का नाल सरसों का विवरण शिम्बीधान्य वर्ग (पृष्ठ ८०७) में किया गया है।