भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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पृष्ठ 895

८४४ भावप्रकाशनिघण्टुः इति नालशाकानि अथ कन्दशाकानि । तत्र सूरणम् (जमीकन्द) । तस्य नामानि गुणांश्चाह सूरणः कन्द ओलश्च कन्दलोऽर्शोघ्न इत्यपि । सूरणो दीपनो रूक्षः कषायः कण्डुकृत् कटुः ॥९१॥ विष्टम्भी विशदो रुच्यः कफार्शः कृन्तनो लघुः । विशेषादर्शसे पथ्यः प्लीहगुल्मविनाशनः ॥९२॥ सर्वेषां कन्दशाकानां सूरणः श्रेष्ठ उच्यते । दद्रूणां कुष्ठिनां रक्तपित्तिनां न हितो हि सः । सन्धानयोगं सम्प्राप्तः सूरणो गुणवत्तरः ॥९३॥ कन्द शाकों में सूरन (जिमीकन्द) के संस्कृत नाम-सूरन, कन्द, ओल, कन्दल तथा अर्शोघ्न ये सब हैं। सूरन-कषाय तथा कटुरसयुक्त, अग्निदीपक, रूक्ष, खुजली पैदा करने वाला, विष्टम्भक, विशद गुण युक्त, रुचिकारक, लघु एवम्-कफ तथा अर्श को नष्ट करने वाला होता है। और यह विशेष रूप से अर्श के रोगियों के लिये पथ्य है तथा प्लीहा और गुल्म का नाशक है। सम्पूर्ण कन्दशाकों में सूरन श्रेष्ठ समझा जाता है किन्तु यह दाद, कुष्ठ तथा रक्तपित्त के रोगियों के लिये हितकर नहीं होता है। और यदि सूरन का सन्धान के साथ योग ही अर्थात् इसका अचार आदि बनाया जाय तो विशेष गुणकारी हो जाता है। [९१-९३] ५९. सूरन कन्द हिं०-सूरन कन्द, जमी कन्द, जिमिकन्द, जिमीकन्द, ओल। बं०-ओल। म०-सुरण। गु०-सूरण। क०- सूरण, सूर्णगड्ड। ते०-कन्द। ता०-कर्णैकिलंगु। फा०-ओला। ले०-Amorphophallus campanulatus Blume. (एमोर्फोफेलस् कम्पैनुलेटस्)। Fam. Araceae (अॅरेसी)। यह प्रायः सब प्रान्तों में उत्पन्न होता है। कहीं इसको रोपण करते हैं, कहीं आप ही आप उगता है। इसका क्षुप- दृढ़ होता है। इसके नीचे बड़े-बड़े कन्द होते हैं। पत्र-पुष्पित होने के बहुत बाद आता है। पत्रफलक १ से ३ फीट चौड़ा, अनेक भागों में विभक्त, हरे रंग का एवं छत्र की तरह फैला हुआ रहता है। पत्रवृन्त २ से ३ फीट लम्बा, दृढ़, कुछ काँटों जैसे उभारों से खुरदरा, हरे रंग का तथा हलके रंग के धब्बों से युक्त होता है। यह ऊपर ३ भागों में विभक्त हो जाता है जिसमें कटे हुए पत्रक लगे होते हैं। पुष्पव्यूह-पत्रावृत अवृन्त काण्डज (Spadix) स्वरूप का तथा हरिताभ बैंगनी रंग का होता है। पुं एवं स्त्री पुष्पव्यूह अलग-अलग होते हैं। फल-लाल तथा २ से ३ बीजों से युक्त होता है। कन्द (Corm)-शीर्ष पर धँसा हुआ, गोलार्ध के सदृश, ८ से १० इञ्च व्यास का तथा हलके भूरे रंग का होता है। इसके अनेक प्रकार वन्य एवं कृषित होते हैं। वन्य के कन्द बहुत प्रक्षोभक तथा रक्ताभ श्वेत होते हैं क्योंकि उसमें कॅल्शियम आक्झेलेट (Calcium oxalate) के रवे होते हैं। कृषित (प्रायः श्वेत) में खुजली कम होती है। चिकित्सा में प्रायः वन्य कन्द का एवं शाकार्थ कृषित का उपयोग करते हैं। रासायनिक संगठन-इसमें आर्द्रता ७८.७, प्रोटीन १.२, स्नेह ८०.१, कार्बोहाइड्रेट १८.४, खनिज ०.८, खटिक ०.०५, फॉस्फोरस् ०.०२%, लोह ०.४ मि० ग्रा०, विटामिन 'ए' ४३४ अ० एकक एवं विटामिन 'बी₁', २० अ० ए० प्रति १०० ग्राम रहता है ! गुण और प्रयोग-यह कटु, वातहर, दीपन, पाचन एवं रुचिकर है। इसका उपयोग अर्श, कास, श्वास, प्लीहावृद्धि, गुल्म, आमवात एवं आन्त्र के रोगों में किया जाता है। कन्दशाक में इसे श्रेष्ठ मानते हैं।