भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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मांसवर्गः ८५९ "कूलेचर" शब्द की निरुक्ति-जो जीव नदी आदि जलाशयों के तट पर चरने वाले होत हैं उन्हें "कूलेचर" कहा जाता है । [२९] लुलायो = महिषः । गण्डः = खड्गः । चमरी = चमरपुच्छी गौः ।।२९।। यहाँ पर मूल में "लुलाय" से भैंसा, "गण्ड" से गैंडा, चमरी से जिस गोजाति के पशु की पूँछ से चमर बनाया जाता है उस चमरी जाति का ग्रहण करना चाहिये । [२९] कूलेचरा मरुत्पित्तहरा वृष्या बलावहाः । मधुराः शीतलाः स्निग्धा मूत्रलाः श्लेष्मवर्धनाः ।।३०।। कूलेचर संज्ञक जीवों का मांस-वात तथा पित्त को दूर करने वाला, वीर्यवर्धक, बलकारक, मधुर रसयुक्त, शीतल, स्निग्ध, मूत्रकारक तथा कफ को बढ़ाने वाला होता है । [३०] अथ प्लवाः (जलपर तैरने वाले पक्षी) । तेषां गणनां गुणाँश्चाह हंससारसकारण्‍डबकक्रौञ्चशरारिकाः ।।३१।। नन्दीमुखी सकादम्बा बलाकाद्याः प्लवाः स्मृताः । प्लवन्ति सलिले यस्मादेते तस्मात्प्लवा स्मृताः ।।३२।। प्लवसंज्ञक पक्षियों की गणना-हंस, सारस, कारण्ड (करंड), बगला, क्रौञ्च, शरारिका, नन्दीमुखी, कादम्ब, बगुली आदि ये सब "प्लव" संज्ञक हैं । प्लव शब्द की निरुक्ति जो पक्षी जल पर तैरने वाले होते हैं वे "प्लव" कहे जाते हैं । [३१-३२] ❖ कारण्ड = कपर्दिकाक्षो बृहद्धंसभेदः । क्रौञ्चः = शरद्विहङ्गः स्यात्-"टेंक" इति लोके । शरारिका = "सिन्धू" इति लोके ।। स्थूला कठोरा वृत्ता च यस्याश्चञ्चुपरिस्थिता । गुटिका जम्बुसदृशी प्रोक्ता नन्दीमुखीति सा ।। ❖ कादम्बः = "करवा" इति लोके । बलाका = "बगुली" इति लोके ।।३१-३२।। यहाँ पर मूल में-"कारण्‍ड" पद से "कपर्दिकाक्ष", बड़े हंस का भेद, काले रंग के बड़े-बड़े पैर वाले पक्षी; "क्रौञ्च" से शरद ऋतु का पक्षी, "टेंक" नाम से प्रसिद्ध; "शरारिका" से "सिन्धू" नाम से लोक प्रसिद्ध पक्षी का ग्रहण करना चाहिये । "नन्दीमुखी" से उस पक्षी का ग्रहण करना चाहिये कि जिसके चोंच के ऊपर मोटी, कठोर, गोल, जामुन के फल के समान गुटिका हो और "कादम्ब" से लोक प्रसिद्ध करना अर्थात् बत्तख का तथा "बलाका" से "बगुली" का बोध करना चाहिये । [३१-३२] प्लवा पित्तहराः स्निग्धा मधुरा गुरवो हिमाः । वातश्लेष्मप्रदाश्चापि बलशुक्रकराः सराः ।।३३।। प्लव संज्ञक पक्षियों का मांस-पित्तनाशक, स्निग्ध, मधुररसयुक्त, गुरु, शीतल, वात तथा कफ को उत्पन्न करने वाला, बल तथा शुक्रवर्धक एवम् सारक होता है । [३३] अथ कोशस्थाः (ढकने के मध्य में रहनेवाले प्राणी) । तेषां गणनां गुणाँश्चाह शङ्खः शङ्खनखश्चापि शुक्तिशम्बूककर्कटाः । जीवा एवंविधाश्चान्येकोशस्थाः परिकीर्तिताः ।।३४।। कोशस्थ (ढकने के मध्य में रहने वाले) प्राणियों की गणना-शंख, क्षुद्रशंख (छोटे शंख), सितुही, घोंघा, केकड़ा, (यहाँ पर सु० सू० ४६ अ० में कोशस्थ जीवों में "भल्लुक" का पाठ है अतः "कर्कट" पाठ ठीक नहीं मालूम