भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८५८ भावप्रकाशनिघण्टुः ❖ हारीतः = "हरियल" इति लोके । कपोतो धवलः पाण्डुः । शतपत्रो बृहच्छुकः । "दार्वाघाटः" इत्यमरः । "कठफोरा" इति लोके ।।२३।। यहाँ पर "हारीत" से लोक प्रसिद्ध "हरियल" तथा कपोत पद से उसी का भेद शुक्लपीत वर्ण की पड्डुखी एवम् "शतपत्रक" से अमरकोश के प्रमाण से दार्वाघाट अर्थात् लोकप्रसिद्ध "कठफोरा" का बोध करना चाहिये । [२३] प्रतुदा मधुराः पित्तकफघ्नास्तुवरा हिमाः । लघवो बद्धवर्चस्काः किञ्चिद्वातकराः स्मृताः ।।२४।। प्रतुदा संज्ञक पक्षियों के मांस—मधुर तथा कषाय रसयुक्त, पित्त तथा कफनाशक, शीतल, लघु, मल को गाढ़ा करने वाले तथा किञ्चित् वातकारक होते हैं । [२४] अथ प्रसहाः (दूसरे से छीनकर खानेवाले पक्षी) । तेषां गणनां गुणाँश्चाह काको गृध्र उलूकश्च चिल्लश्च शशघातकः । चाषो भासश्च कुरर इत्याद्याः प्रसहाः स्मृताः ।।२५।। प्रसह संज्ञक (दूसरे से जबरदस्ती छीन कर खानेवाले) पक्षियों की गणना—कौवा, गीध, उल्लू, चील्ह, बाज, नीलकण्ठ, भास (गीध का भेद) और कुरांकुर या कडांकुल इत्यादि पक्षी प्रसह संज्ञक हैं । [२५] ❖ शशघातकः = "बाज" इति लोके । चाषः = "नीलकण्ठ" इति लोके । भासः = गृध्रविशेषः स्यात् । कुररः = "कुरांकुर" इति लोके ।।२५।। यहाँ पर "शशघातक" काक लोकप्रसिद्ध "बाज" पक्षी, "चाष" का "नीलकण्ठ" इस नाम से लोकप्रसिद्ध पक्षी, "भास" का गीध के भेद का पक्षी, "कुरर" का "कुरांकुर" इस नाम से लोकप्रसिद्ध पक्षी का ग्रहण करना चाहिये ॥२५॥ प्रसहाः कीर्त्तिता एते प्रसह्याच्छिद्य भक्षणात् ।।२६।। "प्रसह" शब्द की उत्पत्ति—जो पक्षी दूसरे से जबरदस्ती छीनकर खाते हैं इससे वे "प्रसह" कहलाते हैं । [२६] प्रसहाः खलु वीर्योष्णास्तन्मांसं भक्षयन्ति ये । तेषोषभस्मकोन्मादशुक्रक्षीणा भवन्ति हि ।।२७।। प्रसह संज्ञक के मांस—ये सब उष्णवीर्य होते हैं, अतः जो उनके मांस को खाते हैं उनको शोष (क्षय), भस्मक रोग, पागलपन तथा शुक्रक्षीणता हो जाती है । [२७] अथ ग्राम्याः (ग्राम्यपशु) । तेषां गणनां गुणाँश्चाह छागमेषवृषाश्वाद्या ग्राम्याः प्रोक्ता महर्षिभिः । ग्राम्या वातहराः सर्वे दीपनाः कफपित्तलाः । मधुरा रसपाकाभ्यां बृंहणा बलवर्द्धनाः ।।२८।। ग्राम्य (गाँव के अन्दर रहने वाले) पशुओं की गणना—बकरा, भेंडा (मेढ़ा), बैल (गोजाति), घोड़ा आदि पशुओं को महर्षियों ने "ग्राम्य" संज्ञक कहा है । ग्राम्य पशुओं का मांस—वातनाशक, अग्निदीपक, कफ तथा पित्तकारक, रस तथा विपाक में मधुर रसयुक्त, बृंहण (रस-रक्तादि वर्द्धक) एवम् बल को बढ़ाने वाला होता है । [२८] अथानूपाः । तत्र कूलेचराणां गणनां गुणाँश्चाह लुलायगण्डवाराहचमरीवारणादयः । एते कूलेचराः प्रोक्ता यतः कूले चरन्त्यपाम् ।।२९।। आनूप जाति के जीवों में कुलेचर संज्ञक जीवों की गणना—भैंसा, गैंडा, सूअर, चमरी (Yak—याक्) जाति की गाय और हाथी ये "कूलेचर" संज्ञक जीव कहलाते हैं ।