भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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मांसवर्गः ८५७ स्थूलपुच्छो रक्तनेत्रो बभ्रुदेहः स नाकुलः ।।१६।। यहाँ पर मूल में "तरक्षु" से "तेंदुआबाघ" और "द्वीप" से "चित्रव्याघ्र" (चीता) समझना चाहिये और "बभ्रु" से स्थूल पूँछ तथा लाल नेत्रों वाला, पीले रंग का जो जीव (नेवला) होता है उसका ग्रहण करना चाहिये। [१६] गुहाशया वातहरा गुरूष्णा मधुराश्च ते। स्निग्धा बल्या हिता नित्यं नेत्रगुदविकारिणाम् ।।१७।। गुहाशय जीवों का मांस-वातनाशक, गुरु, उष्ण, मधुर, स्निग्ध, बलकारक तथा नेत्र और गुदा रोग (अर्श) वालों के लिये नित्य हितकर होता है। [१७] अथ पर्णमृगाः (वृक्षों पर चढ़ने वाले प्राणी)। तेषां गणनां गुणांश्चाह ❖ वनौका वृक्षमार्जारो वृक्षमर्कटिकाऽऽदयः। एते पर्णमृगाः प्रोक्ताः सुश्रुताद्यैर्महर्षिभिः ।।१८।। पर्णमृग (वृक्ष पर चढ़ने वाले) जीवों की गणना-वानर, वृक्षविडाल (वन बिलाव), रूपी वानर आदि को सुश्रुतादि महर्षियों ने "पर्णमृग" संज्ञक बतलाया है। [१८] वनौका = वानरः। वृक्षमार्जारो = वृक्षविडालः। वृक्षमर्कटिका = 'रूपी वानर' इति लोके ।।१८।। यहाँ पर मूल में- "वनौका" से "वानर" तथा "वृक्षमार्जार" से वृक्षविडाल अर्थात् पेड़ पर रहने वाले वन विलाव और "वृक्षमर्कटिका" से "रूपी वानर" नाम से लोक में प्रसिद्ध जीव का ग्रहण करना चाहिये। [१८] स्मृताः पर्णमृगा वृष्याश्चक्षुष्या शोषिणे हिताः। श्वासाशः कासशमनाः सृष्टमूत्रपुरीषकाः ।।१९।। पर्णमृग संज्ञक जीवों का मांस-वीर्यवर्धक, नेत्रों के लिये हितकर, शोष (क्षय) रोगियों के लिये हितकारी, मूत्र तथा मल को निकालने वाला एवम्-श्वास, अर्श (बवासीर) और खाँसी को दूर करने वाला होता है। [१९] अथ विष्किराः (विष्किरपक्षी)। तेषां गणनां गुणांश्चाह वर्त्तका वाववर्त्तीरकपिञ्जलकत्तित्तिराः। कुलिङ्गकुक्कुटाद्याश्च विष्किरा समुदाहृताः ।।२०।। विकीर्य भक्षयन्त्येते यस्मात्तस्माद्धि विष्किराः। कपिञ्जल इति प्राज्ञै कथितो गौरतित्तिरिः ।।२१।। विष्किरा मधुराः शीताः कषायाः कटुपाकिनः।बल्या वृष्यास्त्रिदोषघ्नाः पथ्यास्ते लघवः स्मृताः ।।२२।। विष्किर (कुरेद-कुरेद कर खाने वाले) पक्षियों की गणना-वर्तका, (बटेर-जङ्गली गौरैया), लाव (लबा), वत्तीर (कपिञ्जल के सदृश पक्षिविशेष), कपिञ्जलक (गौर तीतर), तीतर, कुलिङ्ग (गौरैया) और मुर्गा इत्यादि पक्षी विष्किर कहलाते हैं। विष्किर शब्द की निरुक्ति-जो पक्षी पहले चोंच आदि से बिखेर कर पीछे खाते हैं इसी से वे "विष्किर" कहलाते हैं और कपिञ्जल को विद्वान् लोग "गौरतित्तिरि" कहते हैं। विष्किर पक्षियों का मांस-मधुर, शीतल, कषाय (कसैला), विपाक में कटु रस युक्त, बलकारक, वीर्यवर्धक, त्रिदोषनाशक, पथ्य तथा लघु होता है। [२०-२२] अथ प्रतुदाः (चोंच से खानेवाले पक्षी)। तेषां गणनां गुणांश्चाह कालकण्ठकहारीतकपोतशतपत्रकाः। वारावतः खञ्जरीटः पिकाद्याः प्रतुदाः स्मृताः। प्रतुद्य भक्षयन्त्येते तुण्डेन प्रतुदास्ततः ।।२३।। प्रतुद पक्षियों को गणना-कालकण्ठक (धूंयें के रंग का जलकौवा), हरियल, पडुकी (कपोत भेद), शतपत्रक (कठफोरा), पारावत (कबूतर), खिड़रिच, कोयल आदि पक्षी "प्रतुद" कहलाते हैं। प्रतुद शब्द की निरुक्ति-जो पक्षी चोंच से निखोर कर खाते हैं। इसी से वे "प्रतुद" कहे जाते हैं। [२३]