भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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८६० भावप्रकाशनिघण्टुः पड़ता है अतएव “भल्लुक” से बड़ी “कौड़ी” का ग्रहण करना चाहिये) ये सब तथा इसी प्रकार के अन्य भी जो जीव हैं वे सब “कोशस्थ” कहलाते हैं। [३४] शङ्खनखः = क्षुद्रशङ्खः ।।३४।। यहाँ पर “शङ्खनख” से क्षुद्रशङ्ख अर्थात् “छोटे शङ्ख” का ग्रहण करना चाहिये। [३४] कोशस्था मधुराः स्निग्धा वातपित्तहरा हिमाः । बृंहणा बहुवर्चस्का वृष्याश्च बलवर्द्धनाः ।।३५।। कोशस्थ जीवों का मांस—मधुर रस युक्त, स्निग्ध, वात तथा पित्तनाशक, शीतल, बृंहण (रस रक्त-मांसादि वर्धक), अधिक मात्रा में मल निकालने वाला, वीर्यवर्धक तथा बलवर्धक होता है। [३५] अथ पादिनः (पाँवों के प्राणी)। तेषां गणनां गुणाँश्चाह कुम्भीरकूर्मनक्राश्च गोधामकरशङ्कव । घण्टिकः शिशुमारश्चेत्यादयः पादिनः स्मृताः ।।३६।। पादी अर्थात् पाँव वाले प्राणियों की गणना—कुम्भीर, कछुआ, नाक, गोह, मगर, शाकुचा, घड़ियाल, सूस इत्यादि जीव पादी (पाँव वाले) कहलाते हैं। [३६] कुम्भीरो = मारको जलजन्तुः । कूर्मः = कच्छपः । नक्रः = “नाकः” इति लोके (सरख्वादिनदीषु बहुलः) । गोधा = “गोहि” जलजन्तुः । मकरः = “मगर” इति लोके । शङ्कुः = “शाकुवा” इति लोके । घण्टिकः = “घड़ियाल” इति लोके । शिशुमारः = “सूस” इति लोके ।।३६।। यहाँ पर मूल में— “कुम्भीर” से मारने वाला नाक के भेद का जीव विशेष; “कूर्म” से कछवा; “नक्र” के लोक प्रसिद्ध-नाक (सरयू आदि नदियों में अधिक रूप से रहने वाला); “गोधा” से गोह नामक जल का जीव; “मकर” से मगर नाम से प्रसिद्ध जीव; “शंकु” से शाकुचा नामक जीव; “घण्टिक” से घड़ियाल; “शिशुमार” से सूस नाम से प्रसिद्ध जीव समझना चाहिये। [३६] पादिनोऽपि च ये ते तु कोशस्थानां गुणैः समाः ।।३७।। पादी अर्थात् पाँव वाले जीवों का मांस—गुणों में उपर्युक्त कोशस्थ जीवों के मांस के समान होता है। [३७] अथ मत्स्याः (मछली)। तेषां नामानि गुणाँश्चाह मत्स्यो मीनो विसारश्च झषो वैसारिणोऽण्डजः । शकुली पृथुरोमा च स सुदर्शन इत्यपि ।।३८।। रोहिताद्यास्तु ये जीवास्ते मत्स्याः परिकीर्त्तिताः । मत्स्याः स्निग्धोष्णमधुरा गुरवः कफपित्तलाः ।।३९।। वातघ्नाबृंहणा वृष्या रोचका बलवर्द्धनाः । मद्यव्यवायसक्तानां दीप्ताग्नीनाञ्च पूजिताः ।।४०।। मछलियों के संस्कृत नाम—मत्स्य, मीन, विसार, झष, वैसारिण, अण्डज, शकुली, पृथुरोमा और सुदर्शन ये सब हैं। मछलियों की गणना—रोहू आदि जो जीव हैं (जिनका आगे वर्णन आने वाला है) उनकी गणना मत्स्यों (मछलियों) के अन्तर्गत समझनी चाहिये। मछली का मांस—स्निग्ध, उष्ण, मधुर रस युक्त, गुरु, कफ तथा पित्तजनक, वातनाशक, बृंहण, वृष्य, रोचक, बलवर्द्धक तथा मद्य (शराब) पीने तथा मैथुन करने में आसक्त चित्त वालों एवम् प्रदीप्त जठराग्नि वालों के लिये हितकर होता है। [३८-४०]