भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

पृष्ठ 912, कुल 1167 में से

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मांसवर्गः ८६१ अथ जङ्घालाः (जाँघ के बल से चलने वाले प्राणी)। तत्र हरिणस्य मांसगुणानाह हरिणः शीतलो बद्धविण्मूत्रो दीपनो लघुः। रसे पाके च मधुरः सुगन्धिः सन्निपातहा ।।४१।। हरिन का मांस—शीतल, मल तथा मूत्र का विबन्ध करने वाला, अग्निदीपक, लघु, रस तथा विपाक में मधुर रस युक्त, अच्छे गन्ध वाला तथा सन्निपातनाशक होता है। [४१] अथैणहरिणः (कालाहरिण)। तस्य मांसगुणानाह एणः कषायो मधुरः पित्तासृक्कफवातहृत् । संग्राही रोचनो बल्यो ज्वरप्रशमनः स्मृतः ।।४२।। काले हरिण का मांस—कषाय तथा मधुर रस युक्त, संग्राही, रोचक, बलकारक एवम्—पित्त, रक्तविकार, कफ, वात तथा ज्वर का नाशक होता है। [४२] अथ कुरङ्गः। तस्य मांसगुणानाह कुरङ्गो बृंहणो बल्यः शीतलः पित्तहृद् गुरुः। मधुरो वातहृद् ग्राही किञ्चित्कफकरः स्मृतः ।।४३।। कुरङ्गनामक मृग का मांस—बृंहण (रस—रक्तादिवर्धक), बलकारक, शीतल, पित्तनाशक, गुरु, मधुररसयुक्त, वातनाशक, ग्राही तथा किंचित् कफ करने वाला होता है। [४३] अथ ऋष्यः (रोझ)। तस्य नामानि मांसगुणाँश्चाह ऋष्यो नीलाण्डकश्चापि गवयो रोझ इत्यपि। गवयो मधुरो बल्यः स्निग्धोष्णः कफपित्तलः ।।४४।। ऋष्य (रोझ) नामक मृग के संस्कृत नाम—ऋष्य, नीलाण्डक, गवय, रोझ ये सब हैं। (यहाँ पर "रोझ', संस्कृत का नाम नहीं मालूम पड़ता है, ग्रन्थानुरोध से लिख दिया गया है)। रोझ का मांस—मधुर रस युक्त, बलकारक, स्निग्ध, उष्ण, एवम् कफ तथा पित्त जनक होता है। [४४] अथ पृषतः (चित्तलमृग)। तस्य मांसगुणानाह पृषतस्तु भवेत्स्वादुर्गाहकः शीतलो लघुः। दीपनो रोचनः श्वासज्वरदोषत्रयास्रजित् ।।४५।। चित्तल मृग का मांस—स्वादिष्ट, ग्राही, शीतल, लघु, अग्निदीपक, रोचक एवम्—श्वास (दमा), ज्वर, त्रिदोष तथा रक्तविकार को दूर करने वाला होता है। [४५] अथ न्यङ्कुः (बारहसिंगा)। तस्य मांसगुणानाह न्यङ्कुः स्वादुलघुर्बल्यो वृष्यो दोषत्रयापहः ।।४६।। न्यङ्कुसंज्ञक मृग का मांस—स्वादिष्ट, लघु, बलकारक, वीर्यवर्धक तथा त्रिदोषनाश होता है। [४६] अथ साबरम् । तस्य मांसगुणानाह साबरं पललं स्निग्धं शीतलं गुरु च स्मृतम् । रसे पाके च मधुरं कफदं रक्तपित्तहृत् ।।४७।। सांभर मृग का मांस—स्निग्ध, शीतल, गुरु, रस तथा विपाक में मधुर रस युक्त, कफजनक एवम्—रक्तपित्त को दूर करने वाला होता है। [४७] अथ राजीवः । तस्य मांसगुणानाह राजीवस्तु गुणैर्ज्ञेयः पृषतेन समो जनैः ।।४८।। राजीव मृग का मांस—गुणों में चित्तलमृग के मांस के समान ही होता है, ऐसा समझना चाहिये। [४८] CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

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