भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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मांसवर्गः ८६३ अथ लावः (लवा) । तस्य मांसगुणसहितान् भेदान् मांसगुणाँश्चाह लावा विष्किरवर्गेषु ते चतुर्धा मता बुधैः ।।५४।। पांशुलो गौरकोऽन्यस्तु पौण्ड्रको दर्भरस्तथा । लावा वह्निकराः स्निग्धा गरघ्ना ग्राहका हिताः ।।५५।। पांशुलःश्लेष्मलस्तेषु वीर्योष्णोऽनिलनाशनः । गौरो लघुसरो रूक्षो वह्निकारी त्रिदोषजित् ।।५६।। पौण्ड्रकः पित्तकृत्किञ्चिल्लघुर्वातकफापहः । दर्भरो रक्तपित्तघ्नो हृदामयहरो हिमः ।।५७।। विष्किर वर्ग के पक्षियों में जो लवा है, उसके ४ भेद पण्डितों ने कहे हैं । उसमें प्रथम—पांशुल, दूसरा—गौरक, तीसरा—पौण्ड्रक एवं चौथा—दर्भर भेद है । लवा पक्षियों का मांस—अग्निकारक, स्निग्ध, विषनाशक, ग्राही तथा हितकर(पथ्य) होता है । पांशुल संज्ञक लवा का मांस—कफकारक, उष्णवीर्य तथा वातनाशक होता है । गौरक संज्ञक लवा का मांस—अत्यन्त लघु, रूक्ष, अग्नि वृद्धिकारक एवम् त्रिदोषनाशक होता है । पौण्ड्रक संज्ञक लवा का मांस—पित्तकारक, किञ्चित् लघु, वात तथा कफनाशक होता है । दर्भर संज्ञक लवा का मांस—रक्तपित्तनाशक, हृद्रोग को दूर करनेवाला तथा शीतल होता है । [५४-५७] अथ वार्त्तीकः (बगेरा, बटेरा) । तस्य नामानि मांसगुणानाह वर्त्तीको वर्त्तिचटको वार्त्तीकश्चैव स स्मृतः । वर्त्तीको मधुरः शीतो रूक्षश्च कफपित्तनुत् ।।५८।। बगेरा के संस्कृत नाम—वर्त्तीक, वर्त्तिचटक तथा वार्त्तीक ये सब हैं । बगेरा के मांस—मधुर रस युक्त, शीतल, रूक्ष एवम् कफ तथा पित्तनाशक होता है । [५८] अथ कृष्णतित्तिरिगौरतित्तिरिञ्च (तीतर) । तयोर्नामानि मांसगुणाँश्चाह तित्तिरिः कृष्णवर्णः स्यात्स तु गौरः कपिञ्जलः । तित्तिरिर्बलदो ग्राही हिक्कादोषत्रयापहः ।। श्वासकासज्वरहरस्तस्माद्गौरोऽधिको गुणैः ।।५९।। तीतर के भेद और लक्षण—तीतर दो प्रकार का होता है । (१) तीतर, (२) गौर तीतर । काले रंग का जो तीतर होता है उसे कृष्णतित्तिरि, या तित्तिरि, संस्कृत में कहते हैं । यदि वही तीतर गौर वर्ण का हो तो उसे संस्कृत में गौर तित्तिरि या कपिञ्जल कहते हैं । तीतर का मांस—बलदायक, ग्राही एवम्-हिचकी, त्रिदोष, श्वास, खाँसी तथा ज्वर को दूर करने वाला होता है । गौर तीतर का मांस—तीसर के मांस की अपेक्षा अधिक गुणकारी होता है । [५९] अथ चटकः (गौरैया, चिडा) । तस्य नामानि मांसगुणानाह चटकः कलविङ्कः स्यात्कुलिङ्गः कालकण्ठकः ।।६०।। कुलिङ्गः शीतलः स्निग्धः स्वादुः शुक्रकफप्रदः । सन्निपातहरो वेश्मचटकश्चातिशुक्रलः ।।६१।। गौरैया के संस्कृत नाम—चटक, कलविङ्क, कुलिङ्ग और कालकण्ठक ये सब हैं । गौरैया का मांस—शीतल, स्निग्ध, स्वादिष्ट, शुक्र तथा कफ को उत्पन्न करने वाला एवम् सन्निपात को दूर करने वाला होता है । घर में रहने वाले गौरैया का मांस—अत्यन्त शुक्र को उत्पन्न करने वाला होता है । [६०-६१] अथ कुक्कुटो वनकुक्कुटश्च (मुरगा-बनमुरगा) । तयोर्नामानि मांसगुणाँश्चाह कुक्कुटः कृकवाकुः स्यात्कालज्ञश्चरणायुधः । ताम्रचूडस्तथा दक्षो यामनादी शिखण्डिकः ।।६२।। कुक्कुटो बृंहणः स्निग्धो वीर्योष्णोऽनिलहृद् गुरुः । चक्षुष्यः शुक्रकफकृद् बल्यो वृष्यः कषायकः ।।६३।। आरण्यकुक्कुटः स्निग्धो बृंहणः श्लेष्मलो गुरुः । वातपित्तक्षयवमिविषमज्वरनाशनः ।।६४।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

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