भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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पृष्ठ 915

८६४ भावप्रकाशनिघण्टुः मुर्गा का संस्कृत नाम-कुक्कुट, कृकवाकु, कालज्ञ, चरणायुध, ताम्रचूड, दक्ष, यामनादी तथा शिखण्डिक ये सब हैं । वनमुरगा का संस्कृत नाम-वनकुक्कुट तथा आरण्यकुक्कुट आदि हैं । मुर्गा का मांस-बृंहण (रस-रक्तादि वर्धक), स्निग्ध, उष्णवीर्य, वायु को नष्ट करने वाला, गुरु, नेत्रों के लिये हितकर, शुक्र तथा कफकारक, बलदायक, वृष्य (वीर्यवर्धक) तथा कषाय रसयुक्त होता है । वनमुरगा का मांस- स्निग्ध, बृंहण (रस रक्तादि वर्धक), कफजनक, गुरु, एवम् वात, पित्त, क्षय, वमन तथा विषमज्वर को दूर करने वाला होता है । [६२-६४] अथ प्रतुदाः तत्र हारीतः (हरियल) । तस्य नामानि मांसगुणाँश्चाह हारीतो रक्तपीतः स्याद्धरितोऽपि स कथ्यते । हारीतो रूक्ष उष्णश्च रक्तपित्तकफापहः । स्वेदस्वरकरः प्रोक्तः ईषद्रातकरश्च सः ।।६५।। प्रतुद जाति के पक्षियों में हरियल के संस्कृत नाम-हारीत, रक्तपीत और हरित ये सब हैं । हरियल का मांस-रूक्ष, उष्ण, रक्तपित्त तथा कफनाशक, स्वेद (पसीना) लाने वाला, स्वर को उत्तम करने वाला एवम् किञ्चित् वातकारक होता है । [६५] अथ पाण्डुर्धवलवाण्डुश्च (पण्डुक) । तयोर्नामानि मांसगुणाँश्चाह पाण्डुस्तु द्विविधो ज्ञेयश्चित्रपक्षः कलध्वनिः ।।६६।। द्वितीयो धवलः प्रोक्तः स कपोतः स्फुटध्वनिः । चित्रपक्षः कफहरो वातघ्नो ग्रहणीप्रणुत् ।।६७।। धवलः पाण्डुरुद्दिष्टो रक्तपित्तहरो हिमः । रसे पाके च मधुरः संग्राही वातशान्तिकृत् ।।६८।। पंडुक का भेद एवं नाम-पंडुक दो प्रकार का होता है, उसमें जो अनेक प्रकार के रंगों से युक्त पङ्खवाला तथा अस्फुट एवम् मधुर ध्वनि करने वाला पंडु होता है उसे संस्कृत में चित्रपक्ष, पाण्डु तथा कलध्वनि कहते हैं । दूसरा पंडु जो (सफेद) है उसे धवल पाण्डु संस्कृत में कहते हैं । यह स्फुट शब्द करने वाला कबूतर है । चित्रपक्ष का मांस-कफ को दूर करने वाला, वातनाशक एवम् ग्रहणी रोग को नष्ट करने वाला होता है । धवलपाण्डु-रक्तपित्त को दूर करने वाला, शीतल, रस तथा विपाक में मधुर रसयुक्त, संग्राही एवम् वायु को शमन करने वाला होता है । [६६-६८] अथ मयूरः (मोर) । तस्य नामानि मांसगुणाँश्चाह मयूरश्चन्द्रकी केकी मेघरावो भुजङ्गभुक् । शिखी शिखावलो बर्ही शिखण्डी नीलकण्ठकः ।।६९।। शुक्लापाङ्गः कलापी च मेघनादानुलास्यपि । रसे पाके च मधुरः संग्राही वातशान्तिकृत् ।।७०।। मोर के संस्कृत नाम-मयूर, चन्द्रकी, केकी, मेघराव, भुजङ्गभुक्, शिखी, शिखाबल, बर्ही, शिखण्डी, नीलकण्ठक, शुक्लापाङ्ग, कलापी तथा मेघनादानुलासी ये सब हैं । मोर का मांस-रस तथा विपाक में मधुर रसयुक्त, संग्राही तथा वायु को शमन करने वाला होता है । [६९-७०] अथ पारावतः (कबूतर, परेवा) । तस्य नामानि मांसगुणाँश्चाह वारावतः कलरवः कपोतो रक्तलोचनः । पारावतो गुरुः स्निग्धो रक्तपित्तानिलापहः । संग्राही शीतलस्तज्ज्ञैः कथितो वीर्यवर्द्धनः ।।७१।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA