भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

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मांसवर्गः ८६५ परेवा के संस्कृत नाम-पारावत, कलरव, कपोत तथा रक्तलोचन ये सब हैं। परेवा का मांस-गुरु, स्निग्ध, रक्तपित्त तथा वायुनाशक, संग्राही, शीतल तथा वीर्य को बढ़ाने वाला होता है, ऐसा द्रव्य गुण के विद्वानों ने कहा है। [७१] अथ पक्ष्यण्डानि (पक्षियों के अण्डे)। तेषां गुणानाह नातिस्निग्धानि वृष्याणि स्वादुपाकरसानि च। वातघ्नान्यतिशुक्राणि गुरूण्यण्डानि पक्षिणाम् ।।७२।। पक्षियों के अण्डे-अत्यन्त स्निग्ध नहीं (किञ्चित् स्निग्ध) होते हैं और वृष्य (वीर्यवर्धक), विपाक तथा रस में मधुर रस युक्त, वातनाशक तथा अत्यन्त शुक्र को उत्पन्न करने वाले होते हैं। [७२] अथ ग्राम्याः। तत्र छागः (बकरा)। तस्य नामानि मांसगुणांश्चाह छागलो बर्करश्छागो बस्तोऽजश्छेलकः स्तुभः ।।७३।। अजा छागी स्तुभा चापि छेलिका च गलस्तनी। छागमांसं लघु स्निग्धं स्वादुपाकं त्रिदोषनुत् ।।७४।। नातिशीतमदाहि स्यात्स्वादु पीनसनाशनम्। परं बलकरं रुच्यं बृंहणं वीर्यवर्द्धनम् ।।७५।। ग्राम्य पशुओं में बकरा के संस्कृत नाम-छागल, बर्कर, छाग, बस्त, अज, छेलक तथा स्तुभ ये सब हैं। बकरी के संस्कृत नाम—अजा, छागी तथा स्तुभा ये सब हैं। जिसके गले में स्तन के समान मांस लटकता हो उस बकरी को संस्कृत में-गलस्तनी तथा छेलिका कहते हैं। बकरे का मांस-लघु, स्निग्ध, विपाक में मधुर रस युक्त, त्रिदोषनाशक, अत्यन्त शीतल नहीं (किञ्चित् शीतल), दाह न पैदा करने वाला, स्वादिष्ट, पीनस रोग को दूर करने वाला, अत्यन्त बलकारक, रोचक, बृंहण तथा वीर्यवर्धक होता है। [७३-७५] अथाप्रसूताजाया बालकाजासुतस्य च मांसगुणानाह अजायास्त्वप्रसूताया मांसं पीनसनाशनम्। शुष्ककासेऽरुचौ शोषे हितमग्नेश्च दीपनम् ।।७६।। अजासुतस्य बालस्य मांसं लघुतरं स्मृतम्। हृद्यं ज्वरहरं श्रेष्ठं सुखदं बलदं भृशम् ।।७७।। बिना ब्याई हुई बकरी का मांस-पीनस रोगनाशक, सूखी खाँसी, अरुचि तथा शोष रोग में हितकारक एवम् अग्निदीपक होता है। बकरी के छोटे बच्चों का मांस-अत्यन्त लघु, हृदय को हितकर, ज्वरनाशक, अत्यन्त सुख तथा बल को देने वाला अतएव श्रेष्ठ होता है। [७३-७७] अथ निष्कासिताण्ड-वृद्ध-व्याधिमृतानां छागानां मांसस्य छागमुण्डस्य च गुणानाह मांसंनिष्कासिताण्डस्य छागस्य कफकृद् गुरु। स्रोतःशुद्धिकरं बल्यं मांसदं वातपित्तनुत् ।।७८।। वृद्धस्य वातलं रूक्षं तथा व्याधिमृतस्य च। ऊर्ध्वजत्रुविकारघ्नं छागमुण्डं रुचिप्रदम् ।।७९।। जिस बकरे के अण्ड-कोश निकाल लिये गये हैं उसके अर्थात् बधिया किये हुए बकरे का मांस-कफकारक, गुरु, स्रोतों की शुद्धि करने वाला, बलकारक, मांसवर्धक, वात तथा पित्त नाशक होता है। बुड्ढे बकरे का मांस- वायु को उत्पन्न करने वाला तथा रूक्ष होता है। रोग से पीड़ित होकर मरे हुए बकरे का मांस-भी वात कारक तथा रूक्ष होता है। बकरे का मुण्ड (शिर)-जत्रु (काँख तथा कन्धे के सन्धि स्थान) के ऊपरी भाग में होने वाले रोगों को दूर करने वाला तथा रुचिजनक होता है। [७८-७९] ५८ भाव. I . CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammnu. Digitized by S3 Foundation USA