भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमांसवर्गः ८६७ निद्राशुक्रप्रदं बल्यं तनुदार्ढ्यकरं गुरु । वृष्यञ्च सृष्टविण्मूत्रं वातपित्तास्रनाशनम् ।। ९० ।। कूलेचर संज्ञक पशुओं में भैंसा के संस्कृत नाम-महिष, घोटकारि, कासर, रजस्वल, पीनस्कन्ध, कृष्णकाय, लुलाय और यमवाहन ये सब हैं। भैंसे का मांस-स्वादिष्ट, स्निग्ध, उष्ण, वातनाशक, निद्रा तथा शुक्र को उत्पन्न करने वाला, बलकारक, शरीर को पुष्ट करने वाला, गुरु, वीर्यवर्धक, मूत्र तथा मल को निकालने वाला एवम् वातपित्त तथा रक्तविकार को दूर करने वाला होता है। [८८-९०] अथ मण्डूकः (मेंढक) । तस्य नामानि मांसगुणाँश्चाह मण्डूकः प्लवगो भेको वर्षाभूर्दर्दुरो हरिः । मण्डूकः श्लेष्मलो नातिपित्तलो बलकारकः ।। ९१ ।। मेढक के संस्कृत नाम-मण्डूक, प्लवग, भेक, वर्षाभू, दर्दुर तथा हरि ये सब हैं। मेढक का मांस-कफ पैदा करने वाला, अत्यन्त पित्तकारक नहीं (थोड़ा पित्तकारक) तथा बलकारक होता है। [९१] अथ पादिनः । तत्र कच्छपः (कछुआ) । तस्य नामानि मांसगुणाँश्चाह कच्छपो गूढपात्कूर्मः कमठो दृढपृष्ठकः । कच्छपो बलदो वातपित्तनुत्पुंस्त्वकारकः ।। ९२ ।। कूलेचरों के अन्तर्गत पादी अर्थात् पाँववाले जीवों में कछुये का संस्कृत नाम-कच्छप, गूढपाद, कूर्म, कमठ तथा दृढपृष्ठक ये सब हैं। कछुये का मांस-बलदायक, वात-पित्त को दूर करने वाला एवम् पुंस्त्व (मैथुनशक्ति) बढ़ाने वाला है। [९२] अथ विशेषाः । तत्र सद्योहतस्य मांसगुणानाह सद्योहतस्य मांसं स्याद्व्याधिघाति यथाऽमृतम् । वयस्यं बृंहणं सात्म्यमन्यथा तद् विवर्जयेत् ।। ९३ ।। मांस विषयक विशेष बातों में तत्काल मारे गये जीवों के मांस का गुण-अमृत के समान व्याधि को दूर करने वाला, आयु को स्थिर करने वाला, बृंहण (रस-रक्तादि वर्धक) तथा हितकर होता है। यदि तत्काल का मारा हुआ जीव न हो तो उसका मांस नहीं खाना चाहिये। [९३] अथ स्वयं मृतस्य मांसगुणानाह स्वयं मृतस्य चाबल्यमतीसारकरं गुरु ।। ९४ ।। स्वयं मरे हुये जीवों का मांस-बलकारक नहीं होता है अर्थात् निर्बलता-कारक, अतीसार को उत्पन्न करने वाला तथा गुरु होता है। [९४] अथ वृद्धबालयोर्मांसगुणानाह वृद्धानां दोषलं मांसं बालानां बलदं लघु ।। ९५ ।। बुड्ढे जीवों का मांस-दोषों को बढ़ाने वाला होता है। बच्चे जीवों का मांस-बलकारक तथा लघु होता है। [९५] अथ सर्पव्यालदष्टयोर्मांसयोः शुष्कमांसस्य च गुणानाह सर्पदष्टस्य मांसञ्च शुष्कमांस त्रिदोषकृत् । त्रिदोषकृद् व्यालदष्टं शुष्कं शूलकरं परम् ।। ९६ ।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA