भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८६८ भावप्रकाशनिघण्टुः सर्प के काटने से मरे हुए जीवों का मांस-त्रिदोषकारक तथा उसी का सूखा मांस भी त्रिदोषकारक होता है। और हिंस्र जीव व्याघ्रादिकों से काटे हुये जीवों का मांस भी त्रिदोषकारक ही होता है किन्तु सूखा मांस अत्यन्त शूलकारक होता है। [९६] अथ विषादिमृतस्य मांसगुणानाह विषाम्बुरुङ्मृतस्यैतन्मृत्युदोषरुजाकरम् । क्लिन्नमुत्क्लेशजनकं कृशं वातप्रकोपणम्। तोयपूर्णं शिराराजं मृतमप्सु त्रिदोषकृत् ।।९७।। विष से, जल में डूब कर अथवा रोग से पीड़ित होकर मरे जीवों का मांस-मृत्युदायक, दोषकारक तथा रोगों को उत्पन्न करने वाला होता है। क्लिन्न (सड़ा गला) मांस-उत्क्लेश (वमन की इच्छा) को उत्पन्न करने वाला होता है। कृश (दुर्बल) जीवों का मांस-वायु को प्रकुपित करने वाला होता है। जल में मरे हुये जीवों का मांस- त्रिदोषकारक होता है क्योंकि उसकी जितनी शिरायें (नाड़ियाँ) होती हैं वे सब जल से पूर्ण रहती हैं। [९७] अथ जात्यादिपरत्वेन मांसस्य गुणानाह परार्द्धं लघु पुंसां स्यात्स्त्रीणां पूर्वार्द्धमादिशेत् । देहमध्यं गुरुप्रायं सर्वेषां प्राणिनां स्मृतम् ।।९८।। पक्षक्षेपाद्विहङ्गानां तदेव लघु कथ्यते। गुरूण्यण्डानि सर्वेषां गुर्वी ग्रीवा च पक्षिणाम् ।।९९।। उरःस्कन्धोदरं कुक्षी पादौ पाणी कटी तथा । पृष्ठत्वग्यकृदन्त्राणि गुरूणीह यथोत्तरम् ।।१००।। लघुवातकरं मांसं खगानां धान्यचारिणाम् । मत्स्याशिनां पित्तकरं वातघ्नं गुरु कीर्त्तितम् ।।१०१।। फलाशिनां श्लेष्मकरं लघु रूक्षमुदीरितम् । बृंहणं गुरु वातघ्नं तेषामेव पलाशिनाम् ।।१०२।। तुल्यजातिष्वल्पदेहा महादेहेषु पूजिताः । अल्पदेहेषु शस्यन्ते तथैव स्थूलदेहिनः ।।१०३।। जीवों के जाति आदि की प्रधानता से मांस का गुण-जाति की प्रधानता-पक्षियों में पुरुष जाति के जीवों का मांस-श्रेष्ठ होता है तथा चौपायों (बकरा आदि) में स्त्री जाति के जीवों का मांस-श्रेष्ठ होता है। अंग की प्रधानता- पुरुष संज्ञक जीवों के शरीर में नीचे भाग का मांस-लघु होता है। तथा स्त्रीसंज्ञक जीवों के ऊपरी भाग का मांस लघु होता है। सम्पूर्ण जीवों के शरीर में मध्य भाग का मांस-प्रायः करके गुरु होता है। सम्पूर्ण पक्षियों के अण्डे तथा गर्दन गुरु होते हैं। छाती, कन्धा, उदर, दोनों कोख, दोनों पैर, दोनों हाथ, कमर, पीठ, त्वचा, यकृत् (जिगर) और आँत ये सब एक दूसरे की अपेक्षा उत्तरोत्तर गुरु होते हैं। भोजन की प्रधानता-धान्य भोजन करने वाले पक्षियों का मांस- लघु तथा वातकारक होता है। मछली भोजन करने वाले पक्षियों का मांस-पित्तकारक, वातनाशक तथा गुरु होता है। फलभोजी पक्षियों का मांस-कफ कारक, लघु तथा रूक्ष होता है। मांसभोजी पक्षियों का मांस-बृंहण (रस- रक्तादिवर्धक), गुरु तथा वातनाशक होता है। सजातियों में शरीर की छुटाई बड़ाई की प्रधानता-समान जाति वाले जीवों में यदि वे बड़े शरीर वाले हैं तो उनमें जो अपेक्षाकृत छोटे शरीरवाले हैं उनका मांस श्रेष्ठ होता है। एवम्-समान जाति के छोटे शरीरवाले जीवों में जो अपेक्षाकृत स्थूल शरीर वाले हैं उनका मांस-श्रेष्ठ होता है। [९८-१०३] अथ मत्स्याः । तत्र रोहितः (रोहू) । तस्य लक्षणं मांसमुण्डयोगुणाँश्चाह रक्तोदरो रक्तमुखो रक्ताक्षो रक्तपक्षतिः । कृष्णपुच्छो झषः श्रेष्ठो रोहितः कथितो बुधैः ।।१०४।। रोहितः सर्वमत्स्यानां वरो वृष्योऽर्द्दिमार्त्तिजित् । कषायानुरसः स्वादुर्वातघ्नो नातिपित्तकृत् । ऊर्ध्वजत्रुगतान् रोगान् हन्याद्रोहितमुण्डकम् ।।१०५।।