भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

पृष्ठ 924, कुल 1167 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 924

अथ कृतान्नवर्गः

तत्रान्नानां साधनप्रकारान् सिद्धानां गुणांश्चाह । तत्र परिभाषामाह समवायिनि हेतौ ये मुनिभिर्गणिता गुणाः । कार्योऽपि तेऽखिलाज्ञेयाः परिभाषेति भाषिताः ॥१॥ क्वचित्संस्कारभेदेन गुणभेदो भवेद्यतः । भक्तं लघु पुराणस्य शालेस्तच्चिपिटो गुरुः ॥२॥ क्वचिद्योगप्रभावेण गुणान्तरमपेक्षते । कदन्नं गुरु सर्पिश्च तद्युक्तं सुपचं भवेत् ॥३॥ अब इस कृतान्न वर्ग में अन्नों को सिद्ध करने का प्रकार तथा सिद्ध हुये अन्नों का गुण कहते हैं। उसमें प्रथम परिभाषायें कहते हैं— परिभाषा—समवायिकरण (अन्नादि द्रव्यों) में जो गुण मुनियों ने गिनाये हैं वे सभी गुण, कार्य अन्नादि द्रव्यों से बने हुये पदार्थ भात आदि में भी होते हैं ऐसा समझना चाहिये। यह परिभाषा सामान्य रूप से मुनियों ने कही है। किन्तु कहीं-कहीं संस्कार भेद से गुण में भी भेद हो जाता है अर्थात् समवायिकारण का गुण कार्य में पूर्ण रूप से नहीं आता है। जैसे कि—पुराने शालि (जड़हन) चावल का भात हलका होता है किन्तु उसी (जड़हन) का चिउड़ा गुरु होता है। यहाँ पर संस्कार भेद से गुण में भेद हुआ है। और कहीं-कहीं संयोग के प्रभाव से भी गुणों में अन्तर पड़ जाता है। जैसे- पृथक्-पृथक् स्वयं कदन्न (खराब अन्न) तथा घी दोनों ही गुरु होते हैं किन्तु यदि इन दोनों का संयोग हो जाय तो जल्दी हजम होने वाले हो जाते हैं। यहाँ पर परस्पर संयोग के प्रभाव से गुण में अन्तर हुआ है। [१-३]

अथ भक्तम् (भात)। तस्य नामानि साधनं गुणांश्चाह

भक्तमन्नं तथाऽन्धश्च क्वचित्कूरं च कीर्तितम् । ओदनोऽस्त्री स्त्रियां भित्सा दीदिविः पुंसि भाषितः ॥४॥ सूधौतांस्तण्डुलान् स्फीतांस्तोये पञ्चगुणे पचेत् । तद्भक्तं प्रस्रुतं चोष्णं विशदं गुणवन्मतम् ॥५॥ भक्तं वह्निकरं पथ्यं तर्पणं रोचनं लघु । अधौतमस्रुतं शीतं गुर्वरुच्यं कफप्रदम् ॥६॥ भात के संस्कृत नाम—भक्त, अन्न, अन्ध (अन्धस्), कूर (कहीं-कहीं यह भात का नाम कहा है), ओदन (यह स्त्रीलिङ्ग को छोड़ कर शेष लिंगों में होता है), भित्सा (यह केवल स्त्रीलिङ्ग में होता है) और दीदिवि (यह केवल पुंलिङ्ग में होता है) ये सब हैं। निर्माणविधि—प्रथम चावलों को उत्तम रीति से धो डाले, पश्चात् कुछ क्षण के बाद जब वह कुछ फूल जाय तब उसे पाँच गुने जल में पकावे। सिद्ध होने पर उतार कर उसमें से माँड़ निकाल लेवे, यह माड़ निकाला हुआ गरम भात विशद गुणयुक्त अत्यन्त गुणकारी होता है। भात—अग्निकारक, पथ्य, संतर्पण करने वाला, रोचक तथा लघु होता है। यदि यही भात बिना धोये तथा मांड निकाले ही सिद्ध किया हुआ हो एवं शीतल हो तो गुरु, अरुचि उत्पन्न करने वाला तथा कफकारक होता है। [४-६]

अथ दाली (दाल)। तस्या नामानि साधनगुणांश्चाह

दलितन्तु शमीधान्यं दालिर्दाली स्त्रियामुभे । दाली तु सलिले सिद्धा लवणार्द्रकहिङ्गुभिः ॥७॥ संयुक्ता सूपनाम्नी स्यात्कथ्यन्ते तद्गुणा अथ । सूपो विष्टम्भको रूक्षः शीतस्तु स विशेषतः । निस्तुषो भृष्टसंसिद्धो लाघवं सुतरां व्रजेत् ॥८॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA