भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकृतान्नवर्गः ८८९ यहाँ पर “खण्ड्य” पद का—“टुकड़े-टुकड़े कर डाले” यह अर्थ समझना चाहिये । [६६-६७] अलीकमत्स्य उक्तोऽयं प्रकारः पाकपण्डितैः । तं वृन्ताकभटित्रेण वांस्तूकेन च भक्षयेत् ।।६८।। अलीक मत्स्य बनाने का यही पूर्वोक्त प्रकार पाकविद्या के विद्वानों ने बतलाया है । इसे बैंगन के कबाब (लोहे के सींक में खोंस कर आग पर भूने हुये बैंगन) के साथ या बैंगन के भर्ते के साथ अथवा बथुवा के साथ खावे । [६८] अथ क्वथिता (कढी) । तस्याः साधनं गुणाँश्चाह स्थाल्यां घृते वा तैले वा हरिद्रां हिङ्गु भर्जयेत् । अवलेहनसंयुक्तं तक्रं तत्रैव निक्षिपेत् । एषा सिद्धा समरिचा क्वथिता कथिता बुधैः ।।६९।। कढ़ी बनाने की विधि—कढ़ाई या बटुलोई में घी अथवा तेल डालकर उसमें हींग तथा हरदी डाल कर प्रथम भून डाले तत्पश्चात् उसमें अरिहन अर्थात् जल में घोला हुआ बेसन और उसी के साथ तक्र (मट्ठा) भी मिलाकर डालकर पकावे और काली मिर्च तथा मात्रानुसार सेंधा नमक भी डाल दे, जब यह सिद्ध हो जाय तो उतार ले, इसी को विद्वान् लोग कढ़ी कहते हैं । [६९] ❖ अवलेहनम् “अरिहन” इति लोके ।।६९।। यहाँ पर 'अवलेहनम्' पद से लोक प्रसिद्ध “अरिहन” लेना चाहिये । [६९] क्वथिता पाचनी रुच्या लघ्वी वह्निप्रदीपनी । कफानिलाविबन्धघ्नी किञ्चित्पित्तप्रकोषणी ।।७०।। कढ़ी—पाचक, रुचिकारक, लघु, अग्निदीपक, किञ्चित् पित्त को प्रकुपित करने वाली एवम्-कफ, वायु तथा विबन्ध को दूर करने वाली होती है । [७०] अलीकमत्स्यस्य गुणानाह अलीकमत्स्याः शुष्का वा किं वा क्वथितया पुनः । बृंहणा रोचना वृष्या बल्या वातगदापहः ।।७१।। कोष्ठशुद्धिकराः शुष्काः किञ्चित्पित्तप्रकोपणाः । अर्दिते सहनुस्तम्भे विशेषेण हिताः स्मृताः ।।७२।। अलीक मत्स्य—अलीक मत्स्य चाहे सूखे हों या कढ़ी में भिगोये हुये हों दोनों ही बृंहण (रसा-रक्तादिवर्धक), रोचक, वीर्यवर्धक, बलकारक, वातरोग-नाशक तथा कोष्ठ की शुद्धि करने वाले होते हैं । सूखे अलीक मत्स्य—विशेष करके किञ्चित् पित्त को प्रकुपित करने वाले और अर्दितवात (मुँह का लकवा) तथा हनुस्तम्भ रोग में विशेष हितकर होते हैं। [७१-७२] अथ मुद्गार्द्रवटकाः (अदरक बड़ा) । तेषां साधनं गुणाँश्चाह मुद्गपिष्टीविरचितान् वटकांस्तैलपाचितान् । हस्तेन चूर्णयेत्सम्यक् तस्मिंश्चूर्णं विनिक्षिपेत् ।।७३।। भृष्टं हिङ्ग्वार्द्रकं सूक्ष्मं मरिचं जीरकं तथा । निम्बूरसं यवानी च युक्त्वा सर्वं विमिश्रयेत् ।।७४।। मुद्गपिष्टि पचेत्सम्यक् स्थाल्यामास्तारकोपरि । तस्यास्तु गोलकं कुर्यात्तन्मध्ये पूरणं क्षिपेत् ।।७५।। तैले तानगोलकान्पक्त्वा क्वथितायां निमज्जयेत् । गोलकाः पाचकैः प्रोक्तास्ते त्वार्द्रकवटा अपि ।।७६।। मुद्गार्द्रकवटा रुच्या लघ्वो बलकारकाः । दीपखास्तर्पणाः पथ्यास्त्रिषु दोषेषु पूजिताः ।।७७।। अदरक का बड़ा बनाने की विधि—प्रथम मूँग की पीठी के बरे बनाकर तेल में पका डाले, पश्चात् उसे हाथ से मसल कर चूर्ण कर डाले । पुनः उसमें—भुना हुआ हींग, अदरख के पतले-पतले छोटे-छोटे टुकड़े, मरिच, जीरा, नींबू के रस, अजवाइन इन सबों को युक्तिपूर्वक यथायोग्य चूर्ण करके मिला दे । और मूँग की पीठी को बटुलोई में जल ५९ भाव.I CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA