भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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८८० भावप्रकाशनिघण्टुः सूखे बरों को उसी में भिगो दे, जब भींग जायँ तब उन्हें कार्य में ले, ये ही इमली के बरे कहलाते हैं। इमली के बरे- रुचिकारक, अग्नि को प्रदीप्त करने वाले एवम् पूर्वोक्त उड़द के सूखे बरों के गुणों से युक्त होते हैं। [५९-६०] अथ मुद्गवटकाः (मूँग के बरे)। तक्रमज्जितानां च तेषां गुणानाह मुद्गानां वटकास्तक्रे मज्जिता लघवो हिमाः। संस्कारजप्रभावेण त्रिदोषशमना हिताः ।।६१।। मूँग के बरे बनाने की विधि-उरद के बरों की भाँति मूँग के भी बरे बनाकर तक्र (मट्ठे) में भिगो दे और पूर्वोक्त भुना जीरा तथा हींग और सेंधा नमक का चूर्ण उसमें डाल दे, भीगने पर ये ही मूँग के बरे कहलाते हैं। मूँग के बरे- लघु, शीतल एवम् संस्कार के प्रभाव से अर्थात् मसाला आदि डालने से त्रिदोष को शमन करने वाले तथा हितकर होते हैं। [६१] अथ माषवटिकाः (उरद की बरी)। तेषां साधनं गुणाँश्चाह माषाणां पिष्ठिका हिङ्गुलवणाद्रकसंस्कृता। तया विरचिता वस्त्रे वटिकाः साधु शोषिताः ।।६२।। भर्जितास्तप्ततैलेस्ता अथवाऽम्बुप्रयोगतः। वटकस्य गुणैर्युक्ता ज्ञातव्या रोचना भृशम् ।।६३।। उरद की बरी बनाने की विधि-उरद की पीठी को पीस कर उसमें मात्राऽनुसार हींग, सेंधा नमक तथा अदरक आदि डालकर खूब फेंटे पश्चात् उसकी छोटी-छोटी बरी बना कर कपड़े पर रखकर धूप में खूब सुखा डाले और सूख जाने पर उसे तेल में भून कर अथवा पानी में उबालकर सिद्ध करके, इसी को उरद की बरी कहते हैं। उरद की बरी- गुणों में पूर्वोक्त उरद के बरों के समान होती है और अत्यन्त रुचिकर होती है। [६२-६३] अथ कूष्माण्डकवटी (पेठे की बरी)। तस्या गुणानाह कूष्माण्डकवटी ज्ञेया पूर्वोक्तवटिकागुणा। विशेषात्पित्तरक्तघ्नी लघ्वी च कथिता बुधैः ।।६४।। पेठे की बरी (कोहड़ौरी) बनाने की विधि-पूर्वोक्त उरद की बरी बनाने के समय पीठी में पेठे के छोटे-छोटे बारीक टुकड़े कद्दूकश से तैयार करके डाले और पूर्वोक्त मसाला डालकर कपड़े पर सुखाले। यही पेठे की बरी कहलाती हैं। पेठे की बरी-गुणों में उरद की बरी के समान होती है किन्तु विशेष करके यह पित्त तथा रक्तविकार को दूर करने वाली एवम् लघु होती ऐसा विद्वानों का मत है। [६४] . अथ मुद्गवटी (मूँग की बरी)। तस्या गुणानाह मुद्गानां वटिका तद्वद्रचिता साधिता तथा। पथ्या रुच्या तथा लघ्वी मुद्गसूपगुणा स्मृता ।।६५।। मूँग की बरी बनाने की विधि-मूँग की बरी, उरद की बरी के समान ही बनाई तथा पकाई जाती है। मूँग की बरी-पथ्य, रुचिकारक तथा लघु होती है एवम् मूँग के दाल के जो गुण पूर्व में कह आये हैं वे सभी इसमें रहते हैं। [६५] आथालीकमत्स्यः। तस्य साधनप्रकारमाह माषपिष्टिकया लिप्तं नागवल्लीदलं महत् ।।६६।। तत्तु संस्वेदयेद्युक्त्या स्थालीयामास्तारकोपरि। ततो निष्कास्य तं खण्ड्यं ततस्तैलेन भर्जयेत् ।।६७।। अलीकमत्स्य (यह खाने में मछली के समान होता है) बनाने की विधि-बड़े-बड़े २ पान के पत्तों को लेकर उनके ऊपर उरद की पीठी लपेट दे और एक बटुलोई में जल भरकर उनके मुख पर वस्त्र बाँधकर उसी के ऊपर उन सबों को रख कर आँच पर रख दे और युक्ति से इस तरह भाप से उबाले कि वे सब सिद्ध हो जायँ, पुनः उतारकर उनके टुकड़े-टुकड़े कर डाले, तत्पश्चात् तेल में पका डाले। [६६-६७] ❖ खण्ड्यं = खण्डन योग्यमिति यावत् ।।६६-६७।।