भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
पृष्ठ 930, कुल 1167 में से
संदर्भ में पढ़ेंकृतान्नवर्गः ८७९ अथ वटकः शुष्कः सरसश्च (सूखा व रसदार बरा) । तयोः साधनं गुणांश्चाह माषाणां पिष्टिकां युक्तां लवणाईकहिङ्गुभिः । कृत्वा विदध्याद्वटकांस्तांस्तैलेषु पचेच्छनैः ।।५१।। विशुष्का वटका बल्या बृंहणा वीर्य्यवर्द्धनाः । वातामयहरा रुच्या विशेषादर्दिलापहाः ।।५२।। विबन्धभेदिनः श्लेष्मकारिणोऽत्यग्निपूजिताः । संचूर्य्यनिक्षिपेत्तक्रे भृष्टं जीरकहिङ्गु च ।।५३।। लवणं तत्र वटकान्सकलानपि मज्जयेत् । शुक्लस्तत्र वटको बलकृद्रोचनो गुरुः ।।५४।। विबन्धहृद्विदाही च श्लेष्मलः पवनापहः । राज्यक्तयाऽतिरोचन्या पाचनया तांस्तु भक्षयेत् ।।५५।। उरद का सूखा बरा बनाने की विधि-उरद की पीठी में मात्रानुसार सेंधा नमक, अदरुक तथा हींग डालकर खूब फेंटकर उसकी बड़ी-बड़ी गोली बनाले, पश्चात् तेल में डालकर धीरे-धीरे मन्द आँच से पकावे, जब सिद्ध हो जाय तब उतार ले, यही सूखा बरा कहलाता है । उरद का सूखा बरा-बलकारक, बृंहण, वीर्यवर्धक, वात सम्बन्धी रोगों को दूर करने वाला, रुचिकारक, विशेष करके अर्दितवात (मुँह के लकवे) को दूर करने वाला, विबन्धनाशक, कफकारक एवम् अत्यन्त दीप्त अग्नि वालों के लिये उत्तम होता है । रसदार बरा-शुक्रजनक, बलकारक, रोचक, गुरु, विबन्ध को दूर करने वाला, विदाही, कफकारक तथा वातनाशक होता है । यदि इसे रायता में डालकर भक्षण करे तो अत्यन्त रोचक और पाचक होता है । [५१-५५] ❖ राज्यक्ता (राइता) इति लोके ।।५१-५५।। यहाँ पर मूल में "राज्यक्ता" से राइता का ग्रहण करना चाहिये । [५१-५५] अथ काञ्जिकावटकः (काञ्जी बरा) । तस्य साधनं गुणांश्चाह मन्थनी नूतना धार्या कटुतैलेन लेपिता । निर्मलेनाम्बुनाऽऽपूर्वं तस्यां चूर्णं विनिक्षिपेत् ।। राजिकाजीरकलवणाहिङ्गुशुण्ठीनिशाकृतम् ।।५६।। निक्षिपेद्वटकांस्तत्र भाण्डस्यास्याञ्च मुद्रयेत् । ततो दिनत्रयादूर्ध्वमम्लाः स्युर्वटका ध्रुवम् ।।५७।। काञ्जिकावटको रुच्यो वातघ्नः श्लेष्मकारकः । शूलघ्नोऽजीर्णदाहनुद् नेत्ररोगे तु नो हितः ।।५८।। काञ्जी बरा बनाने की विधि-एक नवीन मिट्टी का मजबूत पात्र (हाँड़ी) लेकर उसके अन्दर कडुवा तैल चुपड़ कर उसमें स्वच्छ जल भर दे, तत् पश्चात् मात्रानुसार राई, जीरा, सेंधा नमक, हींग, सोंठ और हलदी का चूर्ण जब तीन दिन बीत जाय तब चौथे दिन बरे सब खट्टे हो जायेंगे तब पात्र का मुख खोल दे । यही बरे काञ्जी के बरे कहलाते हैं। काञ्जी के बरे-रुचिकारक, वातनाशक, कफकारक, शूलनाशक, एवम्-अजीर्ण तथा दाह को दूर करनेवाले और नेत्ररोग में अहितकर होते हैं । [५६-५८] अथाम्लिकावटकाः (इमली के बरे) । तेषां साधनं गुणांश्चाह अम्लिकां स्वेदयित्वा तु जलेन सह मर्दयेत् । तन्नीरे कृतसंस्कारे वटकान्मज्जयेज्जनः ।।५९।। अम्लिकावटकास्ते तु रुच्या वह्निप्रदीपनाः । वटकस्य गुणैः पूर्वैरेतैऽपि च समन्विताः ।।६०।। इमली के बरे बनाने की विधि-इमली को उबालकर जल के साथ मलकर के उसका रस तैयार करले, पुनः उसका संस्कार करके अर्थात् सरसों, हींग, जीरा, सेंधा नमक, सोंठ, हरदी आदि मसाला डाल करके पीछे से उरद के