भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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८७८ भावप्रकाशनिघण्टुः भिन्नमूत्रमला स्तन्यमेदःपित्तकफप्रदा। गुदकीलार्दितश्वासपक्तिशूलानि नाशयेत् ॥४३॥ बेढ़ई बनाने की विधि-गेहूँ के आटे को गूँथकर उसके लोई के अन्दर उरद की पीठी भर कर जो रोटी बनाई जाती है उसी को पण्डित लोग संस्कृत में 'बेढमिका' कहते हैं। बेढ़ई-बलदायक, वीर्यवर्धक, रुचिकारक, वातनाशक, उष्ण, सन्तर्पण कारक, गुरु, बृंहण (रस-रक्तादिवर्धक), अत्यन्त शुक्रजनक, मूत्र तथा मल का भेदन करने वाली, दुग्धवर्धक, मेद, पित्त तथा कफ कारक एवम् गुदकील, अर्दित वात (मुंह का लकवा), श्वास तथा परिणामशूल को नष्ट करने वाली है। [४१-४३] अथ पर्पटः (पापड)। तत्र माषोद्भवस्य तस्य साधनं गुणाँश्चाह धूमसीरचिता हिङ्गुहरिद्रालवणैर्युताः। जीरकस्वर्जिकाभ्याञ्च तनूकृत्य च वेल्लिताः ॥४४॥ पर्पटास्ते सदाऽङ्गारभृष्टाः परमरोचकाः। दीपनाः पाचनाः रूक्षा गुरवः किञ्चिदीरिताः ॥४५॥ पापड़ बनाने की विधि-धुआँस को जल के साथ भली-भाँति गूथकर उसमें मात्राऽनुसार हींग, हरदी, सेंधा नमक, जीरा और सज्जीखार डाल कर लोई बनावे और उसे बेलन से पतला बेल कर रोटी के समान बना ले, इसी को पर्पट (पापड़) कहते हैं। उक्त पापड़-सदा आग पर भूँज कर खाने से अत्यन्त रोचक, अग्निदीपक, पाचक, रूक्ष तथा किंचित् गुरु होते हैं। [४४-४५] अथ मुद्ग-चणकोद्भव-स्नेहभृष्टानां पर्पटानां गुणानाह मौद्गाश्च तद्गुणाः प्रोक्ता विशेषाल्लघवो हिताः ॥४६॥ चणकस्य गुणैर्युक्ताः पर्पटाश्चणकोद्भवाः। स्नेहभृष्टास्तु ते सर्वे भवेयुर्मध्यमा गुणैः ॥४७॥ मूँग के पापड़-यद्यपि गुणों से उड़द के पापड़ के समान होते हैं तथापि विशेष कर यह लघु तथा हितकर होते हैं। चने के बने हुए पापड़-गुणों में चने के समान ही होते हैं। स्नेह (तैल आदि) में भुने हुए सभी पापड़-पूर्वोक्त अपने-अपने गुणों की अपेक्षा मध्यम गुण वाले होते हैं। अर्थात् जो उरद-मूँग आदि के पापड़ों के गुण कहे हुये हैं उनकी अपेक्षा इसमें न्यून गुण होते हैं। [४६-४७] अथ पूरिका तैलपक्का घृतपक्वा च (तेल व घी में पकी हुई कचौरी)। तयोः साधनं गुणाँश्चाह माषाणां पिष्टिकां पूर्व्वाल्लवणार्द्रकहिङ्गुभिः। तया पिष्टिकया पूर्णा समिता कृतपोलिका ॥४८॥ ततस्तैलेन पक्वा सा पूरिका कथिता बुधैः। रुच्या स्वादी गुरुः स्निग्धा बल्या पित्तास्रदूषिका ॥४९॥ चक्षुस्तेजोहरी चोष्णा पाके वातविनाशिनी। तथैव घृतपक्वाऽपि चक्षुष्या रक्तपित्तहृत् ॥५०॥ तेल की पूरी बनाने की विधि-उरद की पीठी में मात्रानुसार सेंधा नमक, अदरक तथा हींग डालकर उसे मैदा की लोई के अन्दर रख कर उस को बेलकर बारीक रोटी बना ले, उसके बाद उसे तेल में पका डाले, सिद्ध होने पर उसी को पण्डित लोग संस्कृत में पूरिका कहते हैं। तेल की कचौरी-रुचिकारक, स्वादिष्ट, गुरु, स्निग्ध, बलकारक, पित्त तथा रक्त को दूषित करने वाली, नेत्रों के तेज को हरण करने वाली, पाक में उष्ण एवम् वातनाशक होती है। घी की कचौरी-यह भी गुणों में उक्त कचौरी के समान ही होती है किन्तु विशेषकर नेत्रों के लिये हितकर तथा रक्तपित्तनाशक होती है। [४८-५०]

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