भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
पृष्ठ 928, कुल 1167 में से
संदर्भ में पढ़ेंकृतान्नवर्गः ८७७ अथ यवरोटिका । तस्या गुणानाह यवजा रोटिका रुच्या मधुरा विशदा लघुः । मलशुकानिलकरी बल्या हन्ति कफामयान् ।। ३५ ।। जौ की रोटी—रुचिकारक, मधुररसयुक्त, विशद गुण वाली, लघु, मल, शुक्र, वायु तथा बल को करने वाली एवम् कफ सम्बन्धी रोगों को दूर करने वाली होती है । [३५] अथ बलभद्रिका (चमसीरोटिका) (छिल्केदार उरद की रोटी) । तस्याः साधनं गुणाँश्चाह चूर्णं यच्छुष्कमाषाणां चमसी साऽभिधीयते । चमसीरचिता रोटी कथ्यते बलभद्रिका । रूक्षोष्णा वातला बल्या दीप्ताग्नीनां सुपूजिता ।। ३६ ।। चमसी बनाने की विधि—सूखे उरद को पीस कर जो पूर्ण (आटा) तैयार होता है उसे चमसी कहते हैं । चमसी की बनी हुई रोटी का संस्कृत नाम—बलभद्रिका है । चमसी की रोटी—रूक्ष, उष्ण, वायु को उत्पन्न करने वाली, बलकारक, एवम् प्रदीप्त अग्नि वालों के लिये अत्यन्त उत्तम होती है । [३६] अथ धूमसी (धुआँस) । तस्याः साधनविधिमाह माषाणां दालयस्तोये स्थापितास्त्यक्तकञ्चुकः । आतपे शोषिता यन्त्रे पिष्टास्ता धूमसी स्मृता ।। ३७ ।। धुआँस बनाने की विधि—उरद की दाल को प्रथम जल में भिंगो दे, पश्चात् उसके छिलके को निकाल कर उसे धूप में डाल दे, जब सूख जाय तब चक्की में पीस कर आँटा तैयार कर ले, इसी को धुआँस कहते हैं । [३७] अथ झर्झरी । तस्याः साधनं गुणाँश्चाह धूमसीरचिता चैव प्रोक्ता झर्झरिका बुधैः । झर्झरी कफपित्तघ्नी किञ्चिद्वातकरी स्मृता ।। ३८ ।। झर्झरी (धुआँस की रोटी) बनाने की विधि—धुआँस को गूँथ कर जो रोटी बनायी जाती है उसे संस्कृत में “झर्झरी” कहते हैं । झर्झरी—कफ तथा पित्त नाशक एवम् किंचित् वातकारक होती है । [३८] अथ चणकरोटिका (चने की रोटी) । तस्या गुणानाह चणक्या रोटिका रूक्षा श्लेष्मपित्तास्रनुद्गुरुः । विष्टम्भिनी न चक्षुष्या तद्गुणा चापि शष्कुली ।। ३९ ।। चने की रोटी—चने के आटे की जो रोटी बनाई जाती है, वह—रूक्ष, गुरु, विष्टम्भ करने वाली, नेत्रों के लिये हित न करने वाली, एवम्—कफ पित्त तथा रक्तविकार को दूर करने वाली होती है । चने की पूड़ी—यह भी गुणों में चने की रोटी के समान ही होती है । [३९] अथ पिष्टिका (पीठी) । तस्या निर्माणप्रकारमाह दालिः संस्थापिता तोये ततोऽपहतकञ्चुका । शिलायं साधु सम्पिष्टा पिष्टिका कथिता बुधैः ।।४०।। पीठी बनाने की विधि—हर एक प्रकार के दाल को जल में भिगोने के बाद उसके छिलके को अलग कर के सिल पर अच्छी तरह से पीस देने से पीठी तैयार होती है । इसी को संस्कृत में पण्डित लोग “पिष्टिका” कहते हैं । [४०] अथ बेढमिका (बेढई) । तस्याः साधनं गुणाँश्चाह माषपिष्टिकया पूर्णगर्भा गोधूमचूर्णतः । रचिता रोटिका सैव प्रोक्ता बेढमिका बुधैः ।।४१।। भवेद्वेढमिका बल्या वृष्या रुच्याऽनिलापहा । उष्णा सन्तर्पणी गुर्वी बृंहणी शुक्रला परम् ।।४२।।