भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८७६ भावप्रकाशनिघण्टुः मण्डा—बृंहण (रस रक्तादि वर्धक), वीर्यवर्धक, बलकारक, अत्यन्त रोचक, विपाक, में मधुर रस युक्त, ग्राही, लघु एवम् त्रिदोषनाशक होता है। [२४-२५] अथ पोलिका (मैदे की रोटी) । तस्याः साधनं गुणाँश्चाह कुर्यात्समितयाऽतीव तन्वी पर्पटिका ततः ।।२६।। स्वेदयेत्तप्तके तां तु पोलिकां जगदुर्बुधाः । तां खादेल्लप्सिकायुक्तां तस्या मण्डकवद् गुणाः ।।२७।। पोलिका (रोटी) के बनाने की विधि—मैदा को गूँथ कर उसकी अत्यन्त पतली पापड़ के समान रोटी बना ले, पश्चात् उसे तवे पर रख कर सेंक डाले, सिद्ध हो जाने पर इसे पण्डित लोग पोलिका कहते हैं। अनुपान—इसे लप्सी के साथ खाना चाहिये। पोलिका—इसके गुण पूर्वोक्त मण्डा के समान होते हैं। [२६-२७] अथ लप्सिका (लप्सी) । तस्याः साधनं गुणाँश्चाह समितां सर्पिषा भृष्टां शर्करां पयसि क्षिपेत् । तस्मिन्धनीकृते न्यस्येल्लवङ्गं मरिचादिकम् । सिद्धैषा लप्सिका ख्याता गुणानस्या वदाम्यहम् ।।२८।। लप्सिका बृंहणी वृष्या बल्या पित्तानिलापहा । स्निग्धा श्लेष्मकरी गुर्वी रोचनी तर्पणी परम् ।।२९।। लप्सी बनाने की विधि—प्रथम मैदा को लेकर घी में भून डाले पश्चात् मात्रानुसार शक्कर के साथ पानी में डालकर पकायें, जब गाढ़ा हो जाय तब उसमें लौंग, मरिच आदि डाल कर अत्यन्त तृप्तिकारक एवम् पित्त तथा वायुनाशक होती है। [२८-२९] अथ रोटिका (रोटी) । तस्याः साधनं गुणाँश्चाह शुष्कगोधूमचूर्णेन किञ्चित्पुष्टाञ्च पोलिकाम् ।।३०।। तप्तके स्वेदयेत्कृत्वा भूर्यङ्गारेऽपि तां पचेत् । सिद्धैषारोटिका प्रोक्ता गुणानस्याः प्रचक्ष्महे ।।३१।। रोटिका बलकृद्रुच्या बृंहणी धातुवर्द्धनी । वातघ्नी कफकृद् गुर्वी दीप्ताग्नीनां प्रपूजिता ।।३२।। रोटी बनाने की विधि—सूखे गेहूँ के आटे को जल से खूब गूँथकर उस सूखे आटा का पलोयन लगा-लगा कर पूर्वोक्त पूरी से कुछ मोटी रोटी बेलकर बनाले पश्चात् उसे तवा पर रख कर मामूली तरह से सेंक कर पुनः बहुत से अँगारों पर रखकर पका ले, जब वह सिद्ध हो जाय तब उसे रोटी कहते हैं। रोटी—बलकारक, रुचिजनक, बृंहण, धातुवर्धक, वातनाशक, कफकारक तथा गुरु होती है। यह प्रदीप्त अग्निवालों के लिये उत्तम होती है। [३०-३२] ❖ तप्तकं = "तावा" इति लोके ।।३०-३२।। यहाँ पर मूल में "तप्तक" से "तावा" का बोध करना चाहिये। [३०-३२] अथाङ्गारकर्कटी (बाटी) । तस्याः साधनं गुणांश्चाह शुष्कगोधूमचूर्णन्तु साम्बु गाढं विमर्दयेत् । विधाय वटकाकारं निर्धूमेऽग्नौ शनैः पचेत् ।।३३।। अङ्गारकर्कटी ह्येषा बृंहणी शुक्रला लघुः । दीपनी कफकृद्वल्या पीनसश्वासकासजित् ।।३४।। बाटी बनाने की विधि—सूखे गेहूँ के आटे में जल डाल कर खूब कड़ा माँड़ कर उसकी गोलाकार कुछ चिपटी लोई बना ले पश्चात् उसे निर्धूम आग पर धीरे-धीरे खूब सेंक लें, यही तैयार हो जाने पर बाटी कहलाती है। बाटी— बृंहण (रस—रक्तादिवर्धक), शुक्रजनन, लघु, अग्निदीपक, कफकारक, बलदायक एवम्-पीनस, श्वास तथा खाँसी को दूर करने वाली होती है। [३३-३४] CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA