भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकृतान्नवर्गः ८८३ अथ शुद्धमांसस्य गुणानाह अनेन विधिना सिद्धं शुद्धमांसमिति स्मृतम् ।।८४।। शुद्धमांसं परं वृष्यं बल्यं रुच्यञ्च बृंहणम् । त्रिदोषशमनं श्रेष्ठं दीपनं धातुवर्द्धनम् ।।८५।। शुद्ध मांस-इस पूर्वोक्त विधि से सिद्ध किया हुआ मांस "शुद्ध-मांस" कहलाता है। यह अत्यन्त वीर्यवर्धक, बलकारक, रोचक, बृंहण (रस-रक्तादि वर्धक), त्रिदोष को शमन करने वाला, अत्यन्त अग्निदीपक तथा धातुवर्धक होता है। [८४-८५] अथ सहद्रकम् ("सेहण्डुक, सहर्वांसु" इति लोके) । तस्य साधनं गुणाँश्चाह छागादेर्मांसमूर्वादिः कुट्टितं खण्डितं पुनः । शुद्धमांसविधानेन पचेदेतत्सहद्रकम् । सहद्रकं गुणैर्ग्रन्थे शुद्धमांसगुणं स्मृतम् ।।८६।। सहद्रक (इसे लोक में-सेहुण्डक या सहर्वासु-कहते हैं) बनाने की विधि-बकरे आदि के ऊरु आदि स्थानों के मांस को कूट-कूट कर खूब टुकड़े करके पूर्वोक्त शुद्ध मांस बनाने की विधि के अनुसार पका डाले, इसको सहद्रक कहते हैं । सहद्रक-द्रव्य-गुण-ग्रन्थों में इसके गुण शुद्ध मांस के समान ही कहे हुए हैं। [८६] अथ तक्रमांसम् (अखनी) । तस्य साधनं गुणाँश्चाह पाकपात्रे घृतं दत्त्वा हरिद्रां हिङ्गु भर्जयेत् । छागादेः सकलस्यापि खण्डान्यपि च भर्जयेत् ।।८७।। सिद्धयोग्यं जलं दत्त्वा पचेन्मृदुतरं तथा । जीरकादियुते तक्रे मांसखण्डानि भावयेत् ।।८८।। तक्रमांसन्तु वातघ्नं लघु रुच्यं बलप्रदम् । कफघ्नं पित्तलं किञ्चित्सर्वाहारस्य पाचनम् ।।८९।। अखनी बनाने की विधि-पाक बनाने के बर्तन में घी डाल कर उसमें हल्दी तथा हींग को प्रथम भून डाले, तत्पश्चात् उसी में बकरे आदि के सम्पूर्ण अंगों के मांस के टुकड़ों को भून डाले, तत्पश्चात् उसमें सिद्ध होने योग्य जल डाल कर पुनः मन्द-मन्द अग्नि से पकावे । पश्चात् जीरा आदि पड़े हुये तक्र (मट्ठा) में उन मांस के टुकड़े को डाले । यही 'अखनी' कहलाती है। अखनी-वातनाशक, लघु, रुचिकारक, बलकारक, कफनाशक, किञ्चित् पित्तजनक तथा सम्पूर्ण खाये हुए पदार्थों को पचाने वाली होती हैं। [८७-८९] अथ हरीसा (आसा) । तस्य साधनं गुणाँश्चाह पाकपात्रे तु बृहति मांसखण्डानि निक्षिपेत् । पानीयं प्रचुरं सर्पिः प्रभूतं हिङ्गु जीरकम् ।।९०।। हरिद्रामार्द्रकं शुण्ठीं लवणं मरिचानि च । तण्डुलांश्चापि गोधूमाञ्जम्बीराणां रसान् बहून् ।।९१।। यथा सर्वाणि वस्तूनि सुपक्वानि भवन्ति हि । तथा पचेत्तु निपुणो बहुमण्डस्थितिर्यथा ।।९२।। एषा हरीसा बलकृद्वातपित्तापहा गुरुः । शीतोष्णा शुक्रदा स्निग्धा सरा सन्धानकारिणी ।।९३।। हरीसा (आस) बनाने की विधि-एक बहुत बड़े पात्र में मांस के टुकड़ों को डाल कर उसी में अधिक मात्रा में जल तथा घी और हींग, जीरा, हल्दी, अदरख, सोंठ, सेंधा नमक, मरिच, चावल, गेहूँ और जमीरी नींबू का रस इन सबों को डाले तथा इस भाँति चतुरता से पकावे कि उपर्युक्त सब वस्तुयें भली भाँति पक भी जायें और अधिक मात्रा में मांड (रस) भी रह जाय । इसी को-हरीसा कहते हैं। हरीसा-बलकारक, वात तथा पित्तनाशक गुरु, शीतोष्ण, शुक्रजनक, स्निग्ध, सारक (मल को निकालने वाला) तथा सन्धान-कारक (टूटी हुई हड्डियों को जोड़ने वाला) होता है। [९०-९३]