भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८८४ भावप्रकाशनिघण्टुः अथ तलितमांसम् (तला हुआ मांस) । तस्य साधनं गुणाँश्चाह शुद्धमांसविधानेन मांसं सम्यक्प्रसाधितम् । पुनस्तदाज्ये सम्मृष्टं तलितं प्रोच्यते बुधैः ॥९४॥ तलितं बलमेधाऽग्निमांसौजःशुक्रवृद्धिकृत् । तर्पणं लघु सुस्निग्धं रोचनं दृढताकरम् ॥९५॥ तलित मांस (तला हुआ मांस) बनाने की विधि—पूर्वोक्त शुद्ध मांस बनाने की विधि के अनुसार भली भाँति सिद्ध किये हुए मांस को पुनः घी में डाल कर जो अच्छी तरह से भूना जाता है, उसे पण्डित लोग तलित मांस अर्थात् तला हुआ मांस कहते हैं। तलित मांस (तला हुआ मांस)—बल, मेधाशक्ति, अग्नि, मांस, ओज तथा शुक्र की वृद्धि करने वाला, तृप्तिकारक, लघु, अत्यन्त स्निग्ध, रोचक तथा शरीर को दृढ़ करने वाला होता है। [९४-९५] अथ शूल्यपलम् (कबाब) । तस्य साधनं गुणाँश्चाह कालखण्डादिमांसानि ग्रथितानि शलाकया । घृतं सलवणं दत्त्वा निर्धूमे दहने पचेत् ॥९६॥ तत्त शूल्यमिति प्रोक्तं पाककर्मविचक्षणैः ॥९७॥ शूल्यं पलं सुधातुुल्यं रुच्यं वह्निकरं लघु । कफवातहरं बल्यं किञ्चित्पित्तकरं हि तत् ॥९८॥ शूल्य पल (कबाब) बनाने की विधि—कलेजे आदि अंगों के मांस को कूट कर उसमें घी तथा नमक मिला कर लोहे की सलाई पर लपेट कर या उसी में गूँथ कर निर्धूम (बिना धूयें की) अग्नि पर कुछ ऊँचाई से रख कर धीरे- धीरे पकावे, इसी को पाक करने में निपुण लोग शूल्य पल (कबाब) कहते हैं। कबाब—अमृत के तुल्य स्वादिष्ट, रुचिकारक, अग्नि को प्रदीप्त करने वाला, लघु, कफ तथा वातनाशक, बलकारक, एवम्—किञ्चित् पित्तकारक होता है [९६-९८] अथ मांसशृङ्गाटकम् (मांस का सिंघाड़ा) । तस्य साधनं गुणाँश्चाह शुद्धमांसं तनूकृत्य कर्त्तितं स्वेदितं जले। लवङ्गहिङ्गलवणमरिचार्द्रकसंयुतम् ॥९९॥ एलाजीरकधान्याकनिम्बूरससमन्वितम् । घृते सुगन्ध्ये तद् भृष्टं पूरणं प्रोच्यते बुधैः ॥१००॥ शृङ्गाटकं समितया कृतं पूरणपूरितम्। पुनः सर्पिषि सभृष्टं मांसशृङ्गाटकं वदेत् ॥१०१॥ मांसशृङ्गाटकं रुच्यं बृंहणं बलकृद् गुरु। वातपित्तहरं वृष्यं कफघ्नं वीर्यवर्धनम् ॥१०२॥ मांस का सिंघाड़ा बनाने की विधि—शुद्ध मांस के पतले-पतले तथा छोटे-छोटे टुकड़े करके उसे जल में उबाले। पश्चात् उसमें—लौंग, हींग, सेन्धा नमक, मरिच, अदरख, छोटी इलायची, जीरा, धनिया इन सबों का यथायोग्य चूर्ण और नींबू का रस डाल करके सुगन्धित घी में भून डाले, इसी को पण्डित लोग पूरण (मैदा के सिंघाड़ा के अन्दर भरे जाने वाला द्रव्य) कहते हैं। इसके उपरान्त मैदा को जल में सान कर उसकी लोई के अन्दर उक्त पूरण संज्ञक द्रव्यों को भर कर सिंघाड़ा के आकार का बना ले और उसे घी में भून ले, इसी को मांस का सिंघाड़ा कहते हैं। मांस का सिंघाड़ा—रुचिकारक, बृंहण (रस-रक्तादिवर्धक), बलकारक, गुरु, वात तथा पित्तनाशक, वृष्य, कफनाशक तथा अत्यन्त वीर्यवर्धक होता है। [९९-१०२] अथ सिद्धमांसरसः (सुरुवा) । तस्य गुणानाह सिद्धमांसरसो रुच्यः श्रमश्वासक्षयापहः । प्रीणनो वातपित्तघ्नः क्षीणानामल्परेतसाम् ॥ विश्लिष्टभग्नसन्धीनां शुद्धानां शुद्धिकाङ्क्षिणाम् ॥१०३॥ स्मृत्योजोबलहीनानां ज्वरक्षीणक्षतोरसाम् । शस्यते स्वरहीनानां दृष्ट्यायःश्रवणार्थिनाम् ॥१०४॥ प्रकाराः कथिताः सन्ति बहवो मांससम्भवाः । ग्रन्थविस्तरभीतेश्ते मया नात्र प्रकीर्त्तिताः ॥१०५॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA