भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
पृष्ठ 936, कुल 1167 में से
संदर्भ में पढ़ेंकृतान्नवर्गः ८८५ सिद्धमांसरस (सुरुवा)—रुचिकारक, श्रम, श्वास तथा क्षय को दूर करने वाला, तृप्तिदायक, वात तथा पित्तनाशक होता है; एवम् क्षीण, अल्पवीर्य या जिनकी सन्धियाँ उखड़ गई हैं या टूट गई हैं, या जो वमन विरेचनादि से शुद्ध हुये हैं अथवा वमन विरेचनादि से शोधन करना चाहते हैं, किंवा स्मरणशक्ति ओज तथा बल से हीन हैं, या ज्वर से क्षीण अथवा उरःक्षत रोग से पीड़ित हैं या जिनका स्वर हीन हो गया है अथवा दृष्टिशक्ति आयु तथा श्रवणशक्ति की वृद्धि चाहने वाले जो लोग हैं उनके लिये उत्तम होता है। इस प्रकार से बहुत से मांस बनाने के प्रकार अन्यत्र कहे हुये हैं किन्तु ग्रन्थ के बढ़ जाने के भय से यहाँ पर उन सबका वर्णन नहीं किया जा रहा है। [१०३-१०५] अथ शाकपाकविधिः । तामाह हिङ्ग्जीरयुते तैले क्षिपेच्छाकं सुखण्डितम् ।।१०६।। लवणं चात्र चूर्णादि सिद्धे हिङ्गूद्कं क्षिपेत् । इत्येवं सर्वशाकानां साधनेऽभिहितो विधिः ।।१०७।। शाक बनाने की विधि—शाक को पहले टुकड़े-टुकड़े करके और धो करके पीछे तेल में हींग तथा जीरा का तड़का दे करके उसी में डाल दे, जब गल जाय तब उसमें सेंधा नमक, खटाई का चूर्ण तथा हींग घोला हुआ जल छोड़ कर पक जाने पर उतार ले। हर एक शांकों को बनाने के लिये प्रायः करके यही विधि काम में ली जाती है। [१०६- १०७] अथ पच्यान्नसाधनविधिमाह । तत्र मण्ठकः (“मठरी” इति लोके) । तस्य साधनविधिमाह समितां मर्दयेदाज्यैर्जलैनापि च सन्नयेत् । तस्यास्तु वटिकां कृत्वा पचेत्सर्पिषि नीरसम् ।। एलालवङ्गकर्पूरमरिचाद्यैरलङ्कृते ।।१०८।। मज्जयित्वा सितापाके ततस्तञ्च समुद्धरेत् । अयं प्रकारः संसिद्धौ मण्ठ इत्यभिधीयते ।।१०९।। पकवान बनाने की विधियों में प्रथम मण्ठक (लोकप्रसिद्ध मठरी) बनाने की विधि कहते हैं—प्रथम मैदा को घी तथा जल से खूब मर्दन करे, पश्चात् उसको टिकिया बनाकर घी में खूब तल ले, फिर चीनी की चाशनी बना कर उसमें छोटी इलायची, लौंग, कपूर, मरिच आदि डालकर उसी में उक्त टिकियों को डुबो दे, जब खूब भींग जाय तब निकाल कर काम में ले, इस प्रकार से तैयार हुये पकवान को मण्ठ अर्थात् मठरी कहते हैं। [१०८-१०९] ❖ सन्नयेद् = मर्दयेत् ।।१०८-१०९।। यहाँ पर मूल में “सन्नयेत्” पद का “खूब मर्दन करे” यह अर्थ समझना चाहिए। अथ मण्ठस्य गुणानाह मण्ठस्तु बृंहणो वृष्यो बल्यः सुमधुरो गुरुः । पित्तानिलहरो रुच्यो दीप्ताग्निनां सुपूजितः ।।११०।। समिताशर्करासर्पिर्निर्मिता अपरेऽपि ये । प्रकारा अमुना तुल्यास्तेऽपि चेत्तद्गुणाः स्मृताः ।।१११।। मठरी—बृंहण (रस-रक्तादिवर्धक), वृष्य, बलकारक, अत्यन्त मधुर, गुरु, पित्त तथा वायु को दूर करने वाली, रुचिकारक तथा प्रदीप्त अग्नि वालों के लिये अत्युत्तम होती है। इसी के समान मैदा, शक्कर तथा घी के योग से बने हुये अन्य प्रकार के भी जो पकवान बालू-साही आदि हैं, उसके भी ये ही सब गुण होते हैं। [११०-१११] अथ सम्पावः (गुजियां) । तस्य साधनं गुणाँश्चाह पर्पट्यः साज्यसमितानिर्र्मिता घृतभर्जिताः । कुट्टिताश्चालिताः शुद्धशर्कराभिर्विमर्दिताः ।।११२।। तत्र चूर्ण क्षिपेदेलालवङ्गमरिचानि च । नारिकेरं सकर्पूरं चारबीजान्यनेकधा ।।११३।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA