भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८८६ भावप्रकाशनिघण्टुः घृताक्तसमिता पुष्टरोटिका रचिता ततः । तस्यान्तःपूरणं तस्य कुर्यान्मुद्रां दृढां सुधीः ।। १९४ ।। सर्पिषि प्रचुरे तान्तु सुपचेन्निपुणो जनः । प्रकारज्ञैः प्रकारोऽयं सम्पाव इति कीर्त्तितः ।। १९५ ।। मण्ठकेन समो ज्ञेयः सम्पावोऽपि गुणैर्जनैः ।। १९६ ।। गुजिया बनाने की विधि-घी का मोयन देकर मैदा की पतली-पतली रोटी बेल कर उसे घी में खर्खरी तल करके पश्चात् कूट कर चलनी से चाल ले और उसमें अन्दाज से बूरा मिला कर खूब मर्दन करे । पुनः इलाएची, लौंग, मरिच, नारियल की मींगी का बुरादा (बारीक-बारीक टुकड़े), कपूर, चिरौंजी आदि द्रव्यों चूर्ण मिलाकर घी का मोयन देकर माँडे हुये मैदे की मोटी रोटी बेल कर उसके अन्दर (पूर्वोक्त चूर्ण किये हुये द्रव्यों को) भरकर उसका मुख दृढ़ता से युक्तिपूर्वक बन्द कर दे, तत्पश्चात्, अधिक घी कढ़ाई में डाल कर उसमें अच्छी तरह से पकावे । पकवान बनाने की विधियों के जानने वाले लोगों ने इस प्रकार से बने हुये पदार्थ को "सम्पाव" अर्थात् गुजिया कहा है । गुजिया-गुणों में मठरी के समान ही होती है ऐसा पाकशास्त्रज्ञों का मत है । अथ कर्पूरनालिका । तस्याः साधनं गुणाँश्चाह घृताढ्यया समिततया लम्बं कृत्वा पुटं ततः । लवङ्गोषणकर्पूरयुतया सितयाऽन्वितम् ।। १९७ ।। पचेदाज्येन सिद्धैषा ज्ञेया कर्पूरनालिका । सम्पावसदृशा ज्ञेया गुणैः कर्पूरनालिका ।। १९८ ।। कर्पूरनालिका बनाने की विधि-घी का मोयन देकर मड़े हुये मैदा की लोई बेलकर लम्बा सम्पुट बनाकर उसके अन्दर लौंग, मरिच तथा कपूर का चूर्ण और बूरा (दानेदार चीनी) भरकर उसका मुख दृढ़ता से बन्द करके घी में पकावे, सिद्ध होने पर इसी को "कर्पूरनालिका" कहते हैं । कर्पूरनालिका-गुणों में गुजिया के समान ही होती है । [१९७-१९८] अथ फेनिका (फेनी) । तस्याः साधनं गुणाँश्चाह समिताया घृताढ्याया वर्त्तीर्दीर्घाः समाचरेत् । तास्तु सन्निहिता दीर्घाः पीठस्योपरि धारयेत् ।। १९९ ।। वेल्लयेद्वेल्लनेनैता यथैका पर्पटी भवेत् । ततश्छुरिकया तान्तु संलग्नामेव कर्त्तयेत् ।। १२० ।। ततस्तु वेल्लयेद्भूयः सट्टकेन च लेपयेत् । शालिचूर्णं घृतं तोयं मिश्रितं सट्टकं बदेत् ।। १२१ ।। ततः संवृत्य तल्लोप्त्रीं विदधीत पृथक्पृथक् । पुनस्तां वेल्लयेल्लोप्त्रीं यथा स्यान्मण्डलाकृतिः ।। १२२ ।। ततस्तां सुपचेदाज्ये भवेयुश्च स्फुटाः स्फुटाः । सुगन्धया शर्करया तद्धूलनमाचरेत् ।। १२३ ।। सिद्धैषा फेनिकानाम्नी मण्ठकेन समा गुणैः । ततः किञ्चिल्लघुरियं विशेषोऽयमुदाहृतः ।। १२४ ।। फेनी बनाने की विधि-घी का मोयन देकर मड़े हुये मैदा की लम्बी-लम्बी बत्ती बना कर उसे चकला पर पास- पास सटाकर रखकर लम्बाई की तरफ से बेलन से ऐसा बेले कि जिसमें एक रोटी की तरह हो जाय, उसके बाद छूरी से एक दूसरे से लगी हुई को काट-काट कर, उसको पुनः अलग-अलग बेले और उन पर चावल का चूर्ण, घी और जल को खूब मिलाने से जो सट्टक तैयार होता है, उसका लेप करे । फिर उन सबों को अलग-अलग समेट कर लोई बनाकर ऐसा बेले कि जिसमें चक्राकार रोटी बन जाय । तत्पश्चात् घी में उन सबको अच्छी तरह से पकावे, तैयार होने पर उसमें फुटका-फुटका सा पड़ जायगा । पुनः सुगन्धित शक्कर में उन सबों को सान दे अथवा चाशनी से डुबोकर निकाल ले । इस प्रकार से तैयार हुई पकवान को फेनी कहते हैं । फेनी-गुणों में मठरी के समान होती है, किन्तु विशेषकर उसकी अपेक्षा किञ्चित् लघु होती है । [११९-१२४] ❖ वेल्लयेत् = प्रसारयेत् । वेल्लनः = 'बेलन' इति लोके । पर्पटी = रोटी । लोप्त्री 'लोई' इति लोके ।। ११९-१२४ ।।