भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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कृतान्नवर्गः ८८७ यहाँ पर मूल में “बेल्लयेत्” का “बेले”, “बेल्लन” पद का लोक प्रसिद्ध “बेलन”, “पर्पटी” का “रोटी” और “लोजी” का “लोई” अर्थ समझना चाहिये । [११९-१२४] अथ शष्कुली (खस्तापूरी) । तस्याः साधनं गुणाँश्चाह समिताया घृताक्ताया लोप्त्रीं कृत्वा च वेल्लयेत् । आज्ये तां भर्जयेत्सिद्धा शष्कुली फेनिकागुणा ।। १२५ ।। खस्ता पूरी बनाने की विधि—घी का मोयन देकर मैदा माड़ कर उसकी लोई बना डाले, पश्चात् उन सबों को बेल कर घी में पका डाले, सिद्ध होने पर इसी को संस्कृत में—“शष्कुली” कहते हैं। खस्ता पूरी—गुणों में फेनी के समान होती है। [१२५] अथ सेविकामोदकाः (सेव के लड्डू) । तेषां साधनं गुणाँश्चाह घृताढ्यया समितया कृत्वा सूत्राणि तानि तु । निपूणो भर्जये दाज्ये खण्डपाकेन योजयेत् ।। युक्तेन मोदकान् कुर्यात्ते गुर्णैर्मण्ठका यथा ।। १२६ ।। सेव के लड्डू बनाने की विधि—घी का मोयन देकर मैदा माड़ कर उसके सूत्र अर्थात् सेव बना ले और उसे घी में भून ले, जब सिक जाय तब उत्तान कर शक्कर की चाशनी में डुबो कर उसका लड्डू बाँध ले, उसी को सेव का लड्डू कहते हैं। यह—गुण में मठरी के समान ही होता है। [१२६] अथ मुक्तामोदका मुद्गमोदका वा (बूँदी के लड्डू) । तेषां साधनं गुणाँश्चाह मुद्गानां धूमसीं सम्यग्घोलयेन्निर्मलाऽम्बुना ।। १२७ ।। कटाहस्य घृतस्योर्ध्वं झर्झरं स्थापयेत्ततः । घूमसीन्तु द्रवीभूतां प्रक्षिपेज्झर्झरोपरि ।। १२८ ।। पतन्ति विन्दवस्तस्मात्तान्सुपक्वान्समुद्धरेत् । सितापाकेन संयोज्य कुर्याद्बिस्तेन मोदकान् ।। १२९ ।। लघुर्ग्राही त्रिदोषघ्नः स्वादुः शीतो रुचिप्रदः । चक्षुष्यो ज्वरहृद्बल्यस्तर्पणो मुद्गमोदकः ।। १३० ।। बूँदी के लड्डू बनाने की विधि—मूँग की धुंवास को साफ जल में गाढ़ा-गाढ़ा घोल कर खूब फेंट डाले, फिर कढ़ाई में ज्यादा घी रखकर उसे आग पर चढ़ा दे और कढ़ाई के ऊपर झरनी रखकर उस पर पूर्वोक्त घोले हुये धुआंस को धीरे-धीरे डाले तो जो बूँद के समान कढ़ाई में गिरे उन सबों को सिक जाने पर निकाल-निकाल कर चीनी की चासनी में भिगोता जाय, बाद को सबों को चासनी में से निकाल कर हाथ से लड्डू बना ले। इसी को बूँदी के लड्डू कहते हैं। बूँदी के लड्डू—लघु, ग्राही, त्रिदोषनाशक, स्वादिष्ट, शीतल, रुचिकारक, नेत्रों के लिये हितकर, ज्वरनाशक, बलकारक तथा तृप्तिदायक होते हैं। [१२७-१३०] ❖ “झर्झरं झर्झरा” वेति लोके ।। १२७-१२० ।। यहाँ पर मूल में झझर या झर्झरा से लोकप्रसिद्ध झरनी का बोध करना चाहिये । [१२७-१३०] अथ्र वेसनमोदकाः (मोतीचूर के लड्डू) । तेषां साधनं गुणाँश्चाह एवमेव प्रकारेण कार्या वेसनमोदकाः ।। १३१ ।। ते बल्या लघवः शीताः किञ्चिद्वातकरास्तथा । विष्टम्भिनो ज्वरघ्नाश्च पित्तरक्तकफापहाः ।।