भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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८८८ भावप्रकाशनिघण्टुः मोतीचूर के लड्डू बनाने की विधि—इसी प्रकार से अर्थात् उपर्युक्त बूँदी के समान बेसन के भी लड्डू बनाने चाहिये। बेसन के लड्डू—बलकारक, लघु, शीतल, किञ्चिद् वायु उत्पन्न करने वाले, विष्टम्भकारक, ज्वरनाशक तथा पित्त, रक्तविकार और कफ को दूर करने वाले होते हैं। [१३१] अथ दुग्धकूपिका। तस्याः साधनं गुणाँश्चाह तण्डुलचूर्णविमिश्रितनटक्षीरेण सान्द्रपिष्टेन। दृढकूपिकां विदध्यात्ताञ्च पचेत्सर्पिषासम्यक् ।।१३२।। अथ तां कोरितमध्यां घनपयसा पूर्णगर्भाञ्च। सट्टकमुद्रितवदनां तप्तघृते सुपक्ववदनाञ्च ।।१३३।। अथ पाण्डुखण्डपाके स्नपयेत्कर्पूरवासिते कुशलः। अथ दुग्धकूपिका सा बल्या पित्तानिलापहाचैव ।।१३४।। वृष्या शीता गुर्वी शुक्रकरी च तर्पणी रुच्या। विदधाति कायपुष्टिं दृष्टिं दूरप्रसारिणीं सुचिरम् ।।१३५।। दुग्धकूपिका बनाने की विधि—चावलों के चूर्ण में छेना (दूध को खटाई आदि डाल कर फाड़ देने से जो घन भाग अलग हो जाता है उसे छेना कहते हैं) मिलाकर खूब मर्दन करे, तत्पश्चात् उसकी मजबूत कुप्पी बना ले और उसे घी में पका ले, उसके बाद कूपी के मध्य भाग में छेद करके गाढे दूध से उसे भर दे, पश्चात् पूर्वोक्त सट्टक से उसका मुख दृढ़ता से बन्द कर दे, पश्चात् पुनः घी में पका दे, जब उसका मुख सिक जाय तब कर्पूर से सुवासित सफेद चीनी की चाशनी में उसे भिंगो दे। इसी को पाकशास्त्र में कुशल लोग—दुग्धकूपिका कहते हैं। दुग्धकूपिका—बलकारक, पित्त तथा वायु को नष्ट करनेवाली, वृष्य, शीतल, गुरु, शुक्रजनक, तृप्तिकारक, रुचिजनक एवम्—शरीर की पुष्टि तथा चिरकाल तक दूर तक देखने की शक्ति को करने वाली होती है। [१३३-१३६] अथ कुण्डलिनी ("जलेबी" इति लोके)। तस्याः साधनं गुणाँश्चाह नूतनं घटमानीय तस्यान्तः कुशलो जनः। प्रस्थार्द्धपरिमाणेन दध्नाऽम्लेन प्रलेपयेत् ।। १३७।। द्विअस्थां समितां तत्र दध्यम्ल प्रस्थसम्मितम्। घृतमर्द्धशरावञ्च घोलयित्वा घटे क्षिपेत् ।। १३८ ।। आतपे स्थापयेत्तावद् यावद्याति तदम्लताम्। ततस्तत्प्रक्षिपेत्पात्रे सच्छिद्रे भाजने तु तत् ।। १३९।। परिभ्राम्य परिभ्राम्य सुसन्तप्ते घृते क्षिपेत्। पुनःपुनःस्तदावृत्त्या विदध्यान्मण्डलाकृतिम् ।। १४० ।। तां सुपक्वां घृतान्नीत्वा सितापाके तनुद्रवे। कर्पूरादिसुगन्ध्ये च स्नापयित्वोद्धरेत्ततः ।। १४१ ।। एषा कुण्डलिनी नाम्ना पुष्टिकान्तिबलप्रदा। धातुवृद्धिकरी वृष्या रुच्या चेन्द्रियतर्पणी ।। १४२ ।। जलेबी बनाने की विधि—पाकविद्या में जो निपुण हो, वह एक नवीन घड़ा लेकर उसके अन्दर आधा प्रस्थ (३२ रुपये भर) खट्टा दही लेकर उससे चारों तरफ लेप कर दे, उसके बाद २ प्रस्थ (१२८ रुपये भर अर्थात् १ सेर ९ छटाक ३ भर) मैदा, १ प्रस्थ (६ छटाक २) भर खट्टा दही, आधा शराव (३ छटाक १ भर) घी, इन सबों को खूब घोल कर उक्त घड़े में रख कर धूप में जब तक उक्त पदार्थ खट्टे न हो जायँ तब तक रहने दे। खट्टे हो जाने के बाद घड़े में से निकाल कर उक्त पदार्थों को जिसमें एक छिद्र कनिष्ठिका अंगुली जाने लायक से कुछ छोटा हो, उस पात्र में रखकर खौलते हुए घी की कढ़ाई में पात्र को घुमा-घुमा कर मण्डलाकार एक मण्डल के भीतर दूसरा मण्डल इस भांति से जैसा छोटा या बड़ा बनाना हो, वैसा मण्डल बना ले और जब वह पक जाय तब निकाल कर पतली चीनी की चाशनी में डुबो दे और ऊपर से कपूर आदि सुगन्धित पदार्थों का चूर्ण बुरका दे, तत्पश्चात् धीरे से निकाल कर अलग पात्र में रख दे, इसी को जलेबी कहते हैं ।। जलेबी—पुष्टि, कान्ति तथा बल को देने वाली, धातुवर्धक, वीर्यवर्धक, रुचिकारक तथा इन्द्रिय अर्थात् रसनेन्द्रिय को तृप्त करने वाली होती है। [१३७-१४२] CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA