भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
पृष्ठ 940, कुल 1167 में से
संदर्भ में पढ़ेंकृतान्नवर्गः ८८९ अथ पश्चात् परिवेष्याणि । तत्र रसाला (श्रीखण्ड) । तस्याः साधनं सेवनार्हजनान् गुणांश्चाह आदौ माहिषमम्लमम्बुरहितं दध्याढकं शर्करां शुभ्रां प्रस्थयुगोन्मितां शुचिपटे किञ्चिच्च किञ्चित्क्षिपेत् । दुग्धेनार्द्धघटेन मृण्मयनवस्थाल्यां दृढं स्त्रावयेदेलाबीजलवङ्गचन्द्रमरिचैर्योर्ग्यैश्च तद्योजयेत् ।। १४३ ।। भीमेन प्रियभोजनेन रचिता नाम्ना रसाला स्वयं श्रीकृष्णेन पुरा पुनः पुनरियं प्रीत्या समास्वादिता । एषा येन वसन्तवर्जितदिने संसेव्यते नित्यशस्तस्य स्यादतिवीर्यवृद्धिरनिशं सर्वेन्द्रियाणां बलम् ।। १४४ ।। ग्रीष्मे तथाशरदि ये रविशोषिताङ्गा ये च प्रमत्तवनितासुरतातिखिन्नाः । ये चापि मार्गपरिसर्पणशीर्णगात्रास्तेषामियं वपुषि पोषणमाशु कुर्यात् ।। १४५ ।। रसाला शुक्ला बल्या रोचनी वातपित्तजित् ।। १४६ ।। दीपनी बृंहणी स्निग्धा मधुरा शिशिरा सरा । रक्तपित्तं तृषां दाहं प्रतिश्यायं विनाशयेत् ।। १४७ ।। भोजन के पश्चात् परोसने योग्य पदार्थों में प्रथम श्रीखण्ड बनाने की विधि कहते हैं- प्रथम भैंस का जल रहित खट्टा दही १ आढक (३ सेर ३ छटाक १ भर), सफेद शक्कर का बूरा २ प्रस्थ (१ सेर ९ छटाक ३ भर) और आधा घट (२ आढक अर्थात् ५ सेर २ भर) दूध लेकर इन सबको एक साफ कपड़े पर धीरे-धीरे डाल कर खूब मसल कर के नीचे एक मिट्टी के पात्र में छान ले, पश्चात् उसमें छोटी इलायची के बीज, लौंग, कपूर, मरिच इत्यादि द्रव्यों का चूर्ण आवश्यकतानुसार डाल दे । इसी को श्रीखण्ड कहते हैं । इसे सर्वप्रथम उत्तम भोजन करने तथा बनाने वाले कुन्ती पुत्र भीम ने बनाया था और इसे स्वयं भगवान् श्रीकृष्ण ने अत्यन्त स्वादिष्ट होने से बारम्बार लेकर प्रीतिपूर्वक खाया था तथा इसे जो कोई वसन्त ऋतु के अतिरिक्त अन्य ऋतुओं में प्रतिदिन खाता है, उसके वीर्य की अत्यन्त वृद्धि और सम्पूर्ण इन्द्रियों में बल की वृद्धि होती है । एवम् ग्रीष्म तथा शरद् ऋतु में सूर्य की किरणों से जिनके शरीर सूख गये हैं, जो काम मद से मतवाली स्त्रियों के साथ रमण करने से अत्यन्त खिन्न हो गये हैं तथा अत्यन्त मार्ग चलने से जिनके शरीर शिथिल हो गये हैं, उन लोगों के लिये यह श्रीखण्ड तत्काल शरीर की पुष्टि करने वाला होता है। श्रीखण्ड-शुक्रजनन, बलकारक, रोचक, वात तथा पित्तनाशक, अग्निदीपक, बृंहण, स्निग्ध, मधुर, शीतल, सारक एवम् रक्तपित्त, तृषा, दाह और जुकाम को दूर करने वाला होता है । [१४३-१४७] अथ शर्करोदकम् (सरबत) । तस्य साधनं गुणांश्चाह जलेन शीतलेनैव घोलिता शुभ्रशर्करा । एलालवङ्गकर्पूरमरिचैश्च समन्विता ।। १४८ ।। शर्करोदकनाम्ना तत्प्रसिद्धं विदुषां मुखैः । शर्करोदकमाख्यातं शुक्लं शिशिरं सरम् ।। १४९ ।। बल्यं रुच्यं लघु स्वादु वातपित्तप्रणाशनम् । मूर्च्छाच्छर्दितृषादाहज्वरशान्तिकरं परम् ।। १५० ।। शर्बत बनाने की विधि-सफेद चीनी को शीतल जल में घोलकर उसमें इलायची, लौंग, कपूर तथा मरिच पीस कर डाल दे, पश्चात् छान कर पीवे, इसी को पण्डित लोग शर्बत कहते हैं । शर्बत-शुक्रजनक, शीतल, सारक, बलकारक, रोचक, लघु, स्वादिष्ट, वात तथा पित्तनाशक एवम्-मूर्च्छा, वमन, प्यास, दाह तथा ज्वर को अत्यन्त शान्त करने वाला होता है । [१४८-१५०] अथ प्रपाणकानि (सरबत) । तत्रास्रफलप्रपाणकम् । तस्य साधनं गुणांश्चाह आम्राममं जले स्विन्नं मर्दितं दृढपाणिना । सिताशीताम्बुसंयुक्तं कर्पूरमरिचान्वितम् ।। १५१ ।। प्रपाणकमिदं श्रेष्ठं भीमसेनेन निर्मितम् । सद्यो रुचिकरं बल्यं शीघ्रमिन्द्रियतर्पणम् ।। १५२ ।।