भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८९० भावप्रकाशनिघण्टुः प्रपाणक अर्थात् सरबत अथवा पना में प्रथम आम का पना बनाने की विधि-कच्चा आम जल में उबाल कर हाथ से मसलकर उसका रस निकाल ले और उसमें सफेद चीनी, शीतल जल मात्रानुसार डाल कर पुनः कपूर तथा मरिच का चूर्ण मिला दे। इसी को आम का पना कहते हैं, यह उत्तम होता है। इसे भीमसेन ने सर्वप्रथम बनाया था। यह पीने से तत्काल ही रुचि को बढ़ाने वाला, बलकारक तथा शीघ्र इन्द्रियों को तृप्त करने वाला होता है। [१५१-१५२] अथाम्लिकाफलपानकम्। तस्य साधनं गुणाँश्चाह अम्लिकायाः फलं पक्वं मर्दितं वारिणा दृढम्। शर्करामरिचैर्मिश्रं लवङ्गेन्दुसुवासितम् ।।१५३।। · अम्लिकाफलसम्भूतं पानकं वातनाशनम्। पित्तश्लेष्मकरं किञ्चित्सुरुच्यं वह्निबोधनम् ।।१५४।। इमली का पना बनाने की विधि-इमली के पके फलों को प्रथम जल में भिगो दे, तत्पश्चात् हाथ से खूब मसल कर छानकर उसमें साफ शक्कर, मरिच, लवङ्ग तथा कपूर का चूर्ण मिला दे। इमली का पना-वातनाशक एवम् किञ्चित् पित्त तथा कफकारक, अत्यन्त रोचक और जठराग्नि को उद्दीप्त करने वाला होता है। [१५३-१५४] अथ निम्बुकफलपानकम्। तस्य साधनं गुणाँश्चाह भागैकं निम्बुजं तोयं षड्भागं शर्करोदकम्। लवङ्गमरिचैर्मिश्रं पानं पानकमुत्तमम् ।।१५५।। निम्बूकफलभवं पानमत्यम्लं वातनाशनम्। वह्निदीप्तिकरं रुच्यं समस्ताहार पाचकम् ।।१५६।। नीम्बू का पानक बनाने की विधि-निम्बू का रस १ भाग, चीनी का शर्बत ६ भाग, इन दोनों को एकत्र कर उसमें लवङ्ग तथा मरिच मात्रानुसार मिला देने से पीने योग्य उत्तम पानक तैयार होता है। निम्बू का पानक-अत्यन्त अम्ल रसयुक्त, वातनाशक, अग्नि को प्रदीप्त करने पाला, रोचक तथा सभी प्रकार के आहार को पचाने वाला होता है। [१५५- १५६] अथ धान्याकपानकम्। तस्य साधनं गुणाँश्चाह शिलायां साधु सम्पिष्टं धान्याकं वस्त्रगालितम्। शर्करोदकसंयुक्तं कर्पूरादिसुसंस्कृतम्। नूतने मृण्मये पात्रे स्थितं पित्तहरं परम् ।।१५७।। धनियें का पानक बनाने की विधि तथा गुण-धनिये को प्रथम सिल पर भली भाँति पीस कर वस्त्र से छान ले, पश्चात् उसमें मात्रानुसार चीनी का शर्बत मिलाकर तथा कपूर आदि सुगन्धित द्रव्यों से सुगन्धित करके नवीन मिट्टी के पात्र में रख दे, पश्चात् इच्छानुसार पीने से यह पित्त को अत्यन्त नष्ट करता है। [१५७] अथ काञ्जी तस्यागुणानाह काञ्जिकं रोचनं रुच्यं पाचनं वह्निदीपनम् ।।१५८।। शूलाजीर्णविबन्धघ्नं कोष्ठशुद्धिकरं परम्। न भवेत्काञ्जिकं यत्र तत्र जालिः प्रदीयते ।।१५९।। काञ्जी-रोचक तथा स्वयं रुचने वाली, पाचक, अग्निदीपक एवम् शूल, अजीर्ण तथा विबन्ध (मलबन्ध) को नष्ट करने वाली एवम् कोष्ठ को अत्यन्त शुद्ध रखने वाली होती है। यदि काञ्जी न मिले तो उसके अभाव में निम्नलिखित जाली का प्रयोग करना चाहिये। ❖ काञ्जीविधिर्वटकावसरे लिखितः ।।१५८-१५९।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA