भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

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पृष्ठ 942, कुल 1167 में से

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कृतान्नवर्गः ८९१ यहाँ पर यह और भी समझ लेना चाहिये कि—काञ्जी बनाने की विधि पूर्व में वटक बनाने की विधि में कह आये हैं अतः पुनः उल्लेख नहीं किया गया। [१५८-१५९] अथ जालिः । तस्य साधनं गुणाँश्चाह आममाम्र फलं पिष्टं राजिकालवणान्वितम्। भृष्टहिङ्गुयुतं पूतं घोलितं जालिरुच्यते ।।१६०।। जालिर्हरति जिह्वायाः कुण्ठत्वं कण्ठशोधिनी। मन्दं मन्दन्तु पीता सा रोचनी वह्निबोधिनी ।।१६१।। जाली बनाने की विधि—आम के कच्चे फल को पीसकर उसमें मात्रानुसार राई तथा सेंधा नमक मिलाकर घोल ले, पश्चात् छान कर उसमें भुने हुए हींग का चूर्ण मिला दे। इसी को जाली कहते हैं। सहजाली—जीभ की जड़ता को दूर करने वाली तथा कण्ठ को शुद्ध करने वाली होती है। एवम् यदि इसे धीरे- धीरे पिया जाय तो यह रोचक तथा अग्नि को बढ़ाने वाली होती है। [१६०-१६१] अथ तक्रम् (छाछ)। तस्य साधनं गुणाँश्चाह तुर्यांशेन जलेन संयुतमतिस्थूलं सदम्लं दधि प्रायोमाहिषमम्बरेण विमले मृद्भाजने गालयेत्। भृष्टं हिङ्गुच जीरकञ्चलवणं राजीञ्च किञ्चिन्मितां पिष्टां तत्र विमिश्रयेद्भवति तत्तक्रं न कस्य प्रियम् ।।१६२।। तक्रं रुचिकरं वह्निदीपनं पाचनं परम्। उदरे ये गदास्तेषां नाशनं तृप्तिकारकम् ।।१६३।। छाछ बनाने की विधि—प्रायः करके अत्यन्त गाढ़ा तथा खट्टा भैंस का दही लेकर उसमें चतुर्थांश जल मिला कर मथ डाले, तत्पश्चात् वस्त्र से स्वच्छ मिट्टी के पात्र में छान ले और उसमें मात्रानुसार भुनी हुई हींग, भुना हुआ जीरा, सेंधा नमक, इन सबका चूर्ण तथा थोड़ी मात्रा में राई पीसकर मिला देने से छाछ तैयार हो जाता है, जो किसको प्रिय नहीं लगता है अर्थात् सभी लोग इसे रुचि से पीते हैं। छाछ—रुचिकारक, अग्निदीपक, अत्यन्त पाचक एवम् उदरसम्बन्धी जितने रोग हैं सभी को नष्ट करने वाला तथा तृप्ति देने वाला होता है। [१६३] अथ दुग्धम् (दूध) । तस्य भोजनान्ते पानगुणानाह विदाहीन्यन्नपानानि यानि भुङ्क्ते हि मानवः। तद्विदाहप्रशान्त्यर्थं भोजनान्ते पयः पिबेत् ।।१६४।। भोजन के अन्त में दूध पीने के गुण—यदि मनुष्य भोजन में विदाही (दाहकारक) अन्न पानादि का प्रयोग करे तो उसे उचित है कि उससे उत्पन्न होने वाले दाह की शान्ति के लिये भोजन के अन्त में दुग्धपान अवश्य करे। [१६४] दुग्धस्यापरे गुणा उक्ता एव दुग्धवर्गे ।।१६४।। यहाँ पर यह भी समझना चाहिये कि इसके अतिरिक्त दुग्ध के अन्य जो गुण हैं, वे आगे दुग्धवर्ग में कहे जायेंगे। अतः यहाँ उनका उल्लेख नहीं किया गया। [१६४] अथ सक्तवः (सत्तू) । तस्य साधनविधिमाह धान्यानि भ्राष्ट्रभृष्टानि यन्त्रपिष्टानि सक्तवः ।।१६५।। सत्तू बनाने की विधि—भाड़ में भूजे हुये चावल जौ आदि धान्यों को यदि चक्की में पीस दिया जाय तो वे सत्तू कहलाते हैं। [१६५] CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

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