भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

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८९२ भावप्रकाशनिघण्टुः तत्र यवसक्तवः । तेषां गुणानाह यवजाः सक्तवः शीता दीपना लघवः सराः । कफपित्तहरा रूक्षा लेखनाश्च प्रकीर्त्तिताः ।।१६६।। ते पीता बलदा वृष्या बृंहणा भेदनास्तथा । तर्पणा मधुरा रुच्याः परिणामे बलावहाः ।।१६७।। कफपित्तश्रमक्षुत्तृड्व्रणनेत्रामयापहाः । प्रशस्ता घर्मदाहाध्वव्यायामार्त्तशरीरिणाम् ।।१६८।। जौ का सत्तू—शीतल, अग्निदीपक, लघु, सारक, कफ तथा पित्त नाशक, रूक्ष तथा लेखन गुण युक्त होता है। यदि सत्तू को जल में घोल कर पीया जाय तो वह बलदायक, वीर्यवर्धक, बृंहण, मल का भेदन करने वाला, तृप्तिकारक, मधुर, रुचनेवाला, परिणाम में (पचने पर) बल देने वाला एवम् कफ, पित्त, श्रम, भूख, प्यास, व्रण तथा नेत्ररोग को दूर करने वाला होता है। और धूप, दाह, चलने की थकावट, व्यायाम इनसे पीड़ित लोगों के लिये हितकर है। [१६६- १६८] अथ चणकयवसक्तवः । तेषां साधनं गुणाँश्चाह निस्तुषैश्चणकैर्भृष्टैस्तुर्यांशैश्च यवैः कृताः । सक्तवः शर्करासर्पिर्युक्ता ग्रीष्मेऽतिपूजिताः ।।१६९।। जौ मिले हुए चनों का सत्तू बनाने की विधि—चने को भून कर उसके छिलके को अलग करके उसमें भुने जौ को चने की अपेक्षा चतुर्थांश मिला कर पीस कर तैयार करने से जो सत्तू होता है उसे यव मिश्रित चने का सत्तू कहते हैं। यवमिश्रित चने का सत्तू—यदि शक्कर तथा घी मिला कर ग्रीष्म ऋतु में खाया जाय तो अत्युत्तम होता है। [१६९] अथ शालिसक्तवः । तेषां गुणानाह सक्तवः शालिसम्भूता वह्निदा लघवो हिमाः । मधुरा ग्राहिणो रुच्याः पथ्याश्च बलशुक्रदाः ।।१७०।। चावल का सत्तू—अग्निकारक, लघु, शीतल, मधुर रसयुक्त, ग्राही, स्वयं रुचिकर, पथ्य, एवम् बल तथा शुक्र को उत्पन्न करने वाला होता है। [१७०] अथ सक्तुविषये सामान्यपरिभाषामाह न भुक्त्वा न रदैश्छित्त्वा न निशायां न वा बहून् । नजलान्तरितानद्भिः सक्तूनद्यान्न केवलान् ।।१७१।। पृथक्पानं पुनर्दानं सामिषं पयसा निशि । दन्तच्छेदन मुष्णाञ्च सप्त सक्तुषु वर्जयेत् ।।१७२।। सत्तू के विषय में सामान्य परिभाषायें—भोजन करने के उपरान्त या दाँतों से काट-काट कर या रात्रि में, अथवा अधिक मात्रा में, किंवा सत्तू खाने के बीच में बार-बार जल पी-पी कर या जल के साथ केवल सत्तू को कभी नहीं खाना चाहिये। सत्तू के सम्बन्ध में त्याग करने योग्य ७ बातें—(१) सत्तू खाने के समय पृथक् जल पान करना, (२) एक बार सत्तू जिसने खा लिया पुनः उसी समय दुबारा उसे सत्तू देना, (३) मांस के साथ सत्तू खाना, (४) केवल जल के साथ सत्तू खाना, (५) रात्रि में सत्तू भोजन करना, (६) दाँतों से काट-काट कर खाना, (७) गरम करके खाना, ये ७ बातें सत्तू के विषय में त्याग करने योग्य हैं। [१७१-१७२] अथ धानाः (बहुरी) तासां साधनं गुणाँश्चाह यवास्तु निस्तुषा भृष्टाः स्मृता धाना इति स्त्रियाम् । धानाः स्युर्दुर्जरा रूक्षास्तृट्प्रदा गुरवश्च ताः । तथा मेहकफच्छर्दिनाशिन्यः सम्प्रकीर्त्तिताः ।।१७३।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA