भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

पृष्ठ 944, कुल 1167 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 944

कृतान्नवर्गः ८९३ बहुरी बनाने की विधि-जौ को कूट कर तथा भूसी अलग कर जो भाँड़ में भूना जाता है उसे "बहुरी" कहते हैं। इसे संस्कृत में "धाना" कहते हैं। धाना शब्द स्त्रीलिङ्ग में होता है। बहुरी-देर में हजम होने वाली, रूक्ष, प्यास लगाने वाली, गुरु एवम्-प्रमेह, कफ तथा वमन को नष्ट करने वाली होती है। [१७३] अथ लाजाः (खील)। तेषां साधनं गुणाँश्चाह येषां स्युस्तण्डुलास्तानि धान्यानि सतुषाणि च। भृष्टानि स्फुटितान्याहुर्लाजा इति मनीषिणः ।।१७४।। लाजाः स्युर्मधुराः शीता लघवो दीपनाश्च ते। स्वल्पमूत्रमला रूक्षा बल्याः पित्तकफच्छिदः ।। छर्द्यतीसारदाहास्रप्रमेहेमदस्तृषाऽपहाः ।।१७५।। खील बनाने की विधि-जिन धान्यों के चावल होते हैं वे धान्य भूसी (छिलके) के साथ ही अर्थात् बिना कूटे ही यदि भून दिये जायँ तो खिल जाते हैं। उन्हीं को पण्डित लोग संस्कृत में "लाजाः" कहते हैं। (इसका प्रयोग नित्य पुंल्लिङ्ग बहुवचन में ही होता है) और हिन्दी में "खील" कहते हैं। खील-मधुर रस युक्त, शीतल, लघु, अग्निदीपक, स्वल्प मूत्र तथा मल को लाने वाले, रूक्ष, बलकारक, एवम्- पित्त, कफ, वमन, अतिसार, दाह, रक्तविकार, प्रमेह, मेद तथा तृषा को दूर करने वाले होते हैं। [१७४-१७५] अथ चिपिटाः (चिउडा)। तेषां साधनं नामानि गुणाँश्चाह शालयः सतुषा आर्द्रा भृष्टा अस्फुटितास्ततः। कुट्टिताश्चिपिटाःप्रोक्तास्ते स्मृताः पृथुका अपि ।।१७६।। पृथुका गुरवो वातनाशनाः श्लेष्मला अपि। सक्षीरा बृंहणा वृष्या बल्या भिन्नमलाश्च ते ।।१७७।। चिउड़ा बनाने की विधि-शालि (जड़हन) धान्य भूसी के सहित ही भिगो कर गीले ही यदि भून दिये जायँ और खिलने न पावे तो उसे उखल में कूट कर पश्चात् भूसी अलग कर देने से वे ही संस्कृत में 'चिपिट' और हिन्दी में "चिउड़ा" कहे जाते हैं और "पृथुक" भी संस्कृत नाम इन्हीं का है। चिउड़ा-गुरु, वातनाशक, कफकारक, क्षारयुक्त, बृंहण (रस रक्तादिवर्धक), वीर्यवर्धक, बलकारक तथा मल भेदन करने वाला होता है। [१७६-१७७] अथ होलकः (होरहा)। तस्य साधनं गुणाँश्चाह अर्द्धपक्ववैः शमीधान्यैस्तृणभृष्टैश्च होलकः। होलकोऽल्पानिलो मेदःकफदोषत्रयापहः ।। भवेद् यो होलको यस्य स च तत्तद्गुणो भवेत् ।।१७८।। होरहा बनाने की विधि-अधपके, शमी धान्य चना आदि को तृण की अग्नि में भून देने से वे होरहा कहलाते हैं। संस्कृत में इसी को "होलक" कहते हैं। होरहा-किञ्चित् वातकारक तथा मेद, कफ और त्रिदोष को नष्ट करने वाला होता है और शेष गुण होरहा जिस अन्न का बनाया जाय उसी के समान होते हैं। [१७८] अथ ऊची (ऊंबी)। तस्या साधनं गुणाँश्चाह मञ्जरी त्वर्द्धपक्वा या यवगोधूमयोर्भवेत्। तृणानलेन संभृष्टा बुधैरूचीति सा स्मृता ।। ऊची कफप्रदा बल्या लघ्वी पित्तानिलापहा ।।१७९।। ऊंबी बनाने की विधि-जव या गेहूँ की अधपकी जो मञ्जरी होती है, वह यदि तृण की अग्नि में भून दी जाय तो उसे पंडित लोग संस्कृत में ऊची कहते हैं। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA