भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८९४ भावप्रकाशनिघण्टुः ऊंबी-कफकारक, बलदायक, लघु एवम् पित्त तथा वायु को नष्ट करने वाली होती है । [१७९] ❖ ऊची = "उम्बी, उमिया" इति लोके ।।१७९।। ऊची को लोक में "उम्बी या उमिया" कहते हैं । [१७९] अथ कुल्माषाः (घुघुरी) । तेषां साधनं गुणाँश्चाह अर्धस्विन्नास्तु गोधूमा अन्येऽपि चणकादयः ।।१८०।। कुल्माषा इति कथ्यन्ते शब्दशास्त्रेषु पण्डितैः । कुल्माषागुरवो रूक्षा वातला भिन्नवर्चसः ।।१८१।। घुघुरी बनाने की विधि—गेहूं, इसके अतिरिक्त चना आदि जो अन्न हैं वे यदि आधे सीजा कर दिये जायं तो शब्दशास्त्र के विद्वान् लोग उसे संस्कृत में "कुल्माष" कहते हैं । घुघुरी-गुरु, रूक्ष, वात-कारक तथा मल का भेदन करने वाली होती है । [१८०-१८१] अथ पललम् (तिलकुट) । तस्य नामानि साधनं गुणाँश्चाह पललन्तु समाख्यातं सैक्षवं तिलपिष्टकम् । पललं मलकृद् वृष्यं वातघ्नं कफपित्तकृत् ।। बृंहणं च गुरु स्निग्धं मूत्राधिक्यनिवर्तकम् ।।१८२।। तिलकुट बनाने की विधि—यदि तिलों को कूट कर उसमें गुड़ या शक्कर मिला दिया जाय तो उसे संस्कृत में "पलल" कहते हैं । तिलकुट-मलकारक, वीर्यवर्धक, वातनाशक, कफ तथा पित्त-कारक, बृंहण (रस-रक्तादि वर्धक), गुरु, स्निग्ध, एवम् मूत्र की यदि अधिक प्रवृत्ति होती हो तो उसे रोकने वाला होता है । [१८२] अथ पिण्याकः (तिलकी खली) । तस्य नामानि गुणाँश्चाह तिलकिट्टन्तु पिण्याकस्तथा तिलखलिः स्मृता । पिण्याको लेखनो रूक्षो विष्टम्भी दृष्टिदूषणः ।।१८३।। तिल की खली के संस्कृत नाम—तिलकिट्ट, पिण्याक तथा तिलखलि ये सब हैं । तिल की खली-लेखन गुण युक्त, रूक्ष, विष्टम्भकारक, एवम् दृष्टि को दूषित करने वाली होती है । [१८३] अथ तण्डुलः (चावल) । तस्य गुणानाह तण्डुलो मेहजन्तुघ्नः स नवस्त्वतिदुर्जरः ।।१८४।। चावल—प्रमेह तथा जन्तुओं का नाशक होता है । परन्तु यदि वही नवीन हो तो अत्यन्त दुर्जर (देर में हजम होने वाला) होता है । [१८४] इति श्रीमिश्रलटंकनतनय श्रीमिश्रभावविरचिते भावप्रकाशे वर्गप्रकरणे कृतान्नवर्गः समाप्तः ।