भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथ वारिवर्गः तत्र पानीयस्य नामानि गुणाँश्चाह पानीयं सलिलं नीरं कीलालं जलमम्बु च । आपो वार्वारि कं तोयं पयः पाथस्तथोदकम् ।। जीवनं वनमम्भोऽर्णोऽमृतं घनरसोऽपि च ।।१।। पानीयं श्रमनाशनं क्लमहरं मूर्च्छापिपासापहंतन्द्राच्छर्दिविबन्धहृद्बलकरं निद्राहरं तर्पणम् । हृद्यं गुप्तरसं ह्यजीर्णशमकं नित्यं हितं शीतलंलघ्वच्छं रसकारणं निगदितं पीयूषवज्जीवनम् ।।२।। जल के संस्कृत नाम—पानीय, सलिल, नीर, कीलाल, जल, अम्बु, आपः (अप् यह नित्य बहुवचनान्त है) वार्, वारि, क, तोय, पयः (पयस्), पायः (पायस्), उदक, जीवन, वन, अम्भः (अम्भस्), अर्णः (अर्णस्), अमृत तथा घनरस ये सब हैं। जल—श्रम को दूर करने वाला, क्लान्तिनाशक, मूर्च्छा तथा प्यास को नष्ट करने वाला एवम् तन्द्रा, वमन और विबन्ध को हटाने वाला, बलकारक, निद्रा को दूर करने वाला, तृप्तिदायक, हृदय के लिये हितकर, अव्यक्त रस वाला, अजीर्ण का शमन करने वाला, सदा हितकारक, शीतल, लघु, स्वच्छ, सम्पूर्ण मधुरादि रसों का कारण एवम् अमृत के समान जीवनदाता शास्त्रों में कहा हुआ है । [१-२] अथ पानीयस्य भेदानाह पानीयं मुनिभिः प्रोक्तं दिव्यं भौममिति द्विधा । दिव्यं चतुर्विधं प्रोक्तं धाराजं करकाभवम् ।।३।। तौषारञ्च तथा हैमं तेषु धारं गुणाधिकम् ।।४।। जल के भेद—मुनियों ने दिव्य तथा भौम इन भेदों से जल दो प्रकार का कहा है। इसमें दिव्य जल—(१) धाराज, (२) करकाभव, (३) तौषार, (४) हैम इन भेदों से चार प्रकार का कहा हुआ है। इनमें धार अर्थात् धाराज जो जल है वह अन्य की अपेक्षा अधिक गुणकारी होता है । [३-४] अथ धाराजलस्य लक्षणानि गुणाँश्चाह धाराभिः पतितं तोयं गृहीतं स्फीतवाससा । शिलायां वसुधायां वा धौतायां पतितञ्च तत् ।।५।। सौवर्णे राजते ताम्रे स्फाटिके काचनिर्मिते । भाजने मृण्मये वाऽपि स्थापितं धारमुच्यते ।।६।। धारं नीरं त्रिदोषघ्नमनिर्देश्यरसं लघु । सौम्यं रसायनं बल्यं तर्पणं ह्लादि जीवनम् ।।७।। पाचनं मतिकृन्मूर्च्छातन्द्रादाहश्रमक्लमान् । तृष्णां हरति तत् पथ्यं विशेषात्प्रावृषि स्मृतम् ।।८।। धार जल के लक्षण—धारा रूप से आकाश से गिरा हुआ जल यदि धुली हुई स्वच्छ शिला या पृथ्वी पर गिरा हो तो उसे लेकर स्वच्छ मोटे वस्त्र से छान कर सोना, चाँदी, ताँबा, स्फटिक, काँच अथवा मिट्टी इनमें से चाहे जिस किसी के बने हुये बर्त्तन में रख दे, इसी को धारसंज्ञक जल कहते हैं। धारजल—त्रिदोषनाशक तथा अनिर्देश्यरस वाला है (इसमें कौन सा रस है इसका जिह्वा के द्वारा ठीक-ठीक निर्णय नहीं हो सकता अतः इसे अनिर्देश्यरस वाला कहते हैं), लघु, सौम्य (सोमगुण युक्त), रसायन, बलकारक, तृप्तिदायक, आह्लाद उत्पन्न करने वाला, जीवन स्वरूप, पाचक, बुद्धिवर्द्धक, एवम्—मूर्च्छा, तन्द्रा, दाह, श्रम, क्लान्ति, प्यास इन सबों को दूर करने वाला तथा वर्षा ऋतु का विशेषतः पथ्य होता है । [५-८] CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA