भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
अथ वारिवर्गः तत्र पानीयस्य नामानि गुणाँश्चाह पानीयं सलिलं नीरं कीलालं जलमम्बु च । आपो वार्वारि कं तोयं पयः पाथस्तथोदकम् ।। जीवनं वनमम्भोऽर्णोऽमृतं घनरसोऽपि च ।।१।। पानीयं श्रमनाशनं क्लमहरं मूर्च्छापिपासापहंतन्द्राच्छर्दिविबन्धहृद्बलकरं निद्राहरं तर्पणम् । हृद्यं गुप्तरसं ह्यजीर्णशमकं नित्यं हितं शीतलंलघ्वच्छं रसकारणं निगदितं पीयूषवज्जीवनम् ।।२।। जल के संस्कृत नाम—पानीय, सलिल, नीर, कीलाल, जल, अम्बु, आपः (अप् यह नित्य बहुवचनान्त है) वार्, वारि, क, तोय, पयः (पयस्), पायः (पायस्), उदक, जीवन, वन, अम्भः (अम्भस्), अर्णः (अर्णस्), अमृत तथा घनरस ये सब हैं। जल—श्रम को दूर करने वाला, क्लान्तिनाशक, मूर्च्छा तथा प्यास को नष्ट करने वाला एवम् तन्द्रा, वमन और विबन्ध को हटाने वाला, बलकारक, निद्रा को दूर करने वाला, तृप्तिदायक, हृदय के लिये हितकर, अव्यक्त रस वाला, अजीर्ण का शमन करने वाला, सदा हितकारक, शीतल, लघु, स्वच्छ, सम्पूर्ण मधुरादि रसों का कारण एवम् अमृत के समान जीवनदाता शास्त्रों में कहा हुआ है । [१-२] अथ पानीयस्य भेदानाह पानीयं मुनिभिः प्रोक्तं दिव्यं भौममिति द्विधा । दिव्यं चतुर्विधं प्रोक्तं धाराजं करकाभवम् ।।३।। तौषारञ्च तथा हैमं तेषु धारं गुणाधिकम् ।।४।। जल के भेद—मुनियों ने दिव्य तथा भौम इन भेदों से जल दो प्रकार का कहा है। इसमें दिव्य जल—(१) धाराज, (२) करकाभव, (३) तौषार, (४) हैम इन भेदों से चार प्रकार का कहा हुआ है। इनमें धार अर्थात् धाराज जो जल है वह अन्य की अपेक्षा अधिक गुणकारी होता है । [३-४] अथ धाराजलस्य लक्षणानि गुणाँश्चाह धाराभिः पतितं तोयं गृहीतं स्फीतवाससा । शिलायां वसुधायां वा धौतायां पतितञ्च तत् ।।५।। सौवर्णे राजते ताम्रे स्फाटिके काचनिर्मिते । भाजने मृण्मये वाऽपि स्थापितं धारमुच्यते ।।६।। धारं नीरं त्रिदोषघ्नमनिर्देश्यरसं लघु । सौम्यं रसायनं बल्यं तर्पणं ह्लादि जीवनम् ।।७।। पाचनं मतिकृन्मूर्च्छातन्द्रादाहश्रमक्लमान् । तृष्णां हरति तत् पथ्यं विशेषात्प्रावृषि स्मृतम् ।।८।। धार जल के लक्षण—धारा रूप से आकाश से गिरा हुआ जल यदि धुली हुई स्वच्छ शिला या पृथ्वी पर गिरा हो तो उसे लेकर स्वच्छ मोटे वस्त्र से छान कर सोना, चाँदी, ताँबा, स्फटिक, काँच अथवा मिट्टी इनमें से चाहे जिस किसी के बने हुये बर्त्तन में रख दे, इसी को धारसंज्ञक जल कहते हैं। धारजल—त्रिदोषनाशक तथा अनिर्देश्यरस वाला है (इसमें कौन सा रस है इसका जिह्वा के द्वारा ठीक-ठीक निर्णय नहीं हो सकता अतः इसे अनिर्देश्यरस वाला कहते हैं), लघु, सौम्य (सोमगुण युक्त), रसायन, बलकारक, तृप्तिदायक, आह्लाद उत्पन्न करने वाला, जीवन स्वरूप, पाचक, बुद्धिवर्द्धक, एवम्—मूर्च्छा, तन्द्रा, दाह, श्रम, क्लान्ति, प्यास इन सबों को दूर करने वाला तथा वर्षा ऋतु का विशेषतः पथ्य होता है । [५-८] CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
८१६ भावप्रकाशनिघण्टुः अथ धाराजलस्य भेदानाह धाराजलं च द्विविधं गाङ्गसामुद्रभेदतः ॥९॥ धाराजल के भेद—गाङ्ग तथा सामुद्र इन भेदों से धाराजल दो प्रकार का होता है । [९] अथ गाङ्गसामुद्रयोर्जलयोर्लक्षणं गुणाँश्चाह आकाशगङ्गासम्बन्धिजलमादाय दिग्गजाः । मेघैरन्तरिता वृष्टिं कुर्वन्तीति वचः सताम् ॥१०॥ गाङ्गमाश्वयुजे मासि प्रायो वर्षति वारिदः । सर्वथा तज्जलं ज्ञेयं तथव चरके वचः ॥११॥ स्थापिते हेमजे पात्रे राजते मृण्मयेऽपि वा । शाल्यन्नं येन संसिक्तं भवेदक्लेदि वर्णवत् ॥१२॥ तद्गाङ्गं सर्वदोषघ्नं ज्ञेयं सामुद्रमन्यथा । तत्तु सक्षारलवणं शुक्रदृष्टिवलापहम् ॥१३॥ विस्रञ्च दोषलं तीक्ष्णं सर्वकर्मसु नो हितम् । सामुद्रं त्वाश्विने मासि गुणैर्गाङ्गवदादिशेत् ॥१४॥ गाङ्गजल के लक्षण—सत्पुरुषों का यह कथन है कि—दिग्गज लोग आकाश गङ्गा का जल लेकर मेघों के द्वारा छिपे हुये होकर बरसाते हैं । प्रायः करके मेघ आश्विन (क्वार) मास में जो जल बरसाता है उसे सर्वथा (निश्चित रूप से) उक्त गाङ्गाजल ही समझना चाहिये । चरक में भी इसके विषय में वचन मिलता है कि—सोना-चाँदी अथवा मिट्टी के बर्तन में रखते हुए जिस धारा जल में भिगोया हुआ शालि धान्य का चावल क्लिन्न तथा विवर्ण न हो जाय अर्थात् जैसा का तैसा बना रह जाय तो उसे सम्पूर्ण दोषों को नष्ट करने वाला गाङ्गसंज्ञक धाराजल समझना चाहिये । सामुद्रसंज्ञक धाराजल के लक्षण—यदि उक्त क्रम से भिगोया हुआ चावल अन्यथा अर्थात् क्लिन्न तथा विवर्ण हो जाय (फूल जाने से रंग बदल जाय) तो उसे सामुद्र (धाराजल) समझना चाहिये । सामुद्र संज्ञक धाराजल—क्षार तथा लवण रस युक्त, शुक्र तथा दृष्टिशक्ति (या दृष्टि शक्ति और बल) नाशक, विस्र (दुर्गन्ध युक्त), दोषकारक तथा तीक्ष्ण होता है । एवम् यह सम्पूर्ण कार्यों में अहितकर होता है अर्थात् किसी भी कार्य में हितकर नहीं होता है । किन्तु यदि यही सामुद्रसंज्ञक धाराजल आश्विन मास का बरसा हुआ संगृहीत हो तो गुणों में गाङ्गाजल के तुल्य ही हितकर होता है ऐसा समझना चाहिये । [१०-१४] अथ शरदि वर्षासु च जलस्य निर्विषत्वे च हेतुमाह यतोऽगस्त्यस्य दिव्यर्षेरुदयात्सकलं जलम् । निर्मलं निर्विषं स्वादु शुक्रलं स्याददोषलम् ॥१५॥ शरत् तथा वर्षा ऋतु में क्रम से जल के निर्विष तथा सविष होने का कारण यह है कि—उस समय (आश्विन मास शरद् ऋतु में) आकाश में अगस्त्य नामक तारा के उदय होने से सम्पूर्ण जल निर्मल, निर्विष, स्वादिष्ट तथा शुक्रजनक होता है, एवम् दोषजनक भी नहीं होता है । [१५] अत एवाह फूत्कारविषवातेन नागानां व्योमचारिणाम् । वर्षासु सविषं तोयं दिव्यमप्याश्विनं विना ॥१६॥ अतएव शास्त्र में कहा है कि—वर्षा ऋतु में आकाशचारी नागों (दिव्य-सर्पों) के फूत्कार (फुफकार) सम्बन्धी विषयुक्त वायु से दूषित हो जाने से दिव्य (आकाश-सम्बन्धी) जल विषयुक्त हो जाता है । किन्तु वही (दिव्यजल) आश्विन में विषयुक्त नहीं होता है । अतः आश्विन का जल सर्वोत्तम तथा ग्राह्य होता है । [१६] अथानार्त्तवजलस्य लक्षणं गुणानाह अनार्त्तवं प्रमुञ्चन्ति वारि वारिधरास्तु यत् । तत्रिदोषाय सर्वेषां देहिनां परिकीर्त्तितम् ॥१७॥
वारिवर्गः ८९७ अनार्तवसंज्ञक धाराजल-मेघ जो अनार्तव (बिना ऋतु के) जल बरसाते हैं वह सभी प्राणियों के लिये त्रिदोषकारक होता है। अनार्त्तवं पौषादिमासचतुष्टयविषयम् ॥ १७ ॥ यहाँ पर मूल में "अनार्त्तव" शब्द से बिना ऋतु के अर्थात् पूस आदि (पूस, माघ, फागुन, चैत) चार मासों में" यह अर्थ समझना चाहिये । [१७] अथ करकाजलस्य लक्षणं गुणाँश्चाह दिव्यवाय्वग्निसंयोगात् संहताः खात् पतन्ति याः । पाषाणखण्डवच्चापस्ताः कारक्योऽमृतोपमाः ॥ १८ ॥ करकाजं जलं रूक्षं विशदं गुरु च स्थिरम् । दारुणं शीतलं सान्द्रं पित्तहृत्कफवातकृत् ॥ १९ ॥ करकाजल के लक्षण-आकाशस्थ वायु तथा अग्नि के संयोग से घन होकर जो पत्थर के टुकड़े की भाँति जल (ओला) गिरता है वह करका या कारकी अर्थात् करका (ओला) सम्बन्धी जल कहलाता है तथा वह अमृत के समान स्वादिष्ट होता है। करका जल-रूक्ष, विशद, गुरु, स्थिर, शीतल तथा सान्द्र इन गुणों से युक्त, कठिन, पित्तनाशक तथा कफ और वात को उत्पन्न करने वाला होता है । [१८-१९] अथ तौषारजलस्य लक्षणं गुणाँश्चाह अपि नद्याः समुद्रान्ते वह्निरापस्तदुद्भवाः । धूमावयवनिर्मुक्तास्तुषाराख्यास्तु ताः स्मृताः ॥ २० ॥ तौषार (तुषार सम्बन्धी) जल के लक्षण-नदी से लेकर समुद्र पर्यन्त तक के जल में जो अग्नि रहता है, उससे अर्थात् अग्नि से उत्पन्न होने वाले धूम के अंश से रहित जो जल है वह तुषार संज्ञक कहलाता है । [२०] ❖ अपि नद्याः समुद्रान्ते वह्निः = नदीमारभ्य समुद्रपर्यन्ते वह्निरास्ते । तदुद्भवाः-वह्निभवाः, धूमावयवनिर्मुक्ताः = धूमांशरहिताः, आपः = तुषाराख्याः । "तुष" इति लोके "तुषार" इति च ॥ २० ॥ यहाँ पर मूल में— "अपि नद्याः समुद्रान्ते वह्निः" इन पदों का "नदी से लेकर समुद्र पर्यन्त तक के जल में जो अग्नि रहती है" "तदुद्भवाः" पद का- "उससे अर्थात् अग्नि से उत्पन्न होने वाले"; "धूमावयवनिर्मुक्ताः" पद का "धूम के अंश से रहित" यह अर्थ समझना चाहिए । तथा लोक में "तुष-" तथा "तुषार" ये दो नाम तुषार के प्रसिद्ध हैं यह भी समझना चाहिये । अपथ्याः प्राणिनां प्रायो भूरुहाणान्तु ता हिताः । तुषाराम्बु हिमं रूक्षं स्याद्वातलमपित्तलम् । कफोरुस्तम्भकण्ठाग्निमेहगण्डादिरोगनुत् ॥ २१ ॥ उक्त तुषार सम्बन्धी जल प्राणि मात्र के लिये अपथ्य है किन्तु केवल वृक्षों के लिये हितकर होता है । तुषार सम्बन्धी जल-शीतल, रूक्ष, वातजनक, किञ्चित् पित्तकारक एवम्-कफ, ऊरुस्तम्भ, कण्ठ तथा अग्नि सम्बन्धी रोग, प्रमेह तथा गलगण्डादि रोग को दूर करने वाला होता है । [२१] अथ हैमजलस्य लक्षणं गुणाँश्चाह हिमवच्छिखरादिभ्यो द्रवीभूयाभिवर्षति । यत्तदेव हिमं हैमं जलमाहु र्नीषिणः । हिमाम्बु शीतं पित्तघ्नं गुरु वातविवर्द्धनम् ॥ २२ ॥ ६० भाव.I CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
८९८ भावप्रकाशनिघण्टुः हैम (हिम सम्बन्धी) जल के लक्षण—हिमालय के शिखर आदि स्थानों से द्रवीभूत होकर (पिघल कर) जो हिम (बर्फ) बरसता है अर्थात् आकाश से वायु द्वारा उड़-उड़ कर इधर-उधर गिरता है उसी को हिम कहते हैं और उसके सम्बन्धी जल को पण्डित लोग संस्कृत में “हैमजल” कहते हैं। हिम सम्बन्धी जल—शीतल, पित्तनाशक, गुरु एवम् वायु को बढ़ाने वाला होता है। [२२] हैमं जलम् = कुहेसजलम् ।।२२।। यहाँ पर “हैम जल” से लोक प्रसिद्ध “कुहेसा का जल” यह अर्थ समझना चाहिये। [२२] अन्ये तु और्वानलधूमेरितमम्बु समुद्रस्य यद्धनीभूतम् । पवनानीतमुदीच्यां तद्धिममिति कथ्यते सद्भिः ।।२३।। अन्य आचार्य लोग तो यह कहते है कि—वडवानल के धूयें से प्रेरित होकर जो समुद्र का जल वायु द्वारा उत्तर दिशा में पहुँचाये जाने पर घनभाव को प्राप्त हो जाता है उसे पण्डित लोग हिम कहते हैं। [२३] ❖ हिमं = “कुहेसा” इति लोके ।।२३।। यहाँ पर मूल में “हिम” पद का लोक प्रसिद्ध “कुहेसा” अर्थ समझना चाहिये। [२३] हिमन्तु शीतलं रूक्षं दारुणं सूक्ष्ममित्यपि । न तद् दूषयते वातं न च पित्तं न वा कफम् ।।२४।। हिम—शीतल तथा रूक्ष होता है एवम् दारुण (कठिन) तथा सूक्ष्म भी होता है और यह न तो पित्त न वात और न कफ किसी को भी दूषित करता है। [२४] अथ भौमजलस्य भेदानाह भौममम्भो निगदितं प्रथमं त्रिविधं बुधैः । जाङ्गलं परमानूपं ततः साधारणं क्रमात् ।।२५।। भौम (भूमि सम्बन्धी) जल के भेद—विद्वानों ने भौम जल को प्रथम-जाङ्गल, आनूप और साधारण इन भेदों से तीन प्रकार का माना है। इनके लक्षण तथा गुण क्रम से आगे कहते हैं। [२५] अथ भौमभेदस्य जाङ्गलादिजलत्रयस्य लक्षणं गुणाँश्चाह अल्पोदकोऽल्पवृक्षश्च पित्तरक्तामयान्वितः । ज्ञातव्यो जाङ्गलो देशस्तत्रत्यं जाङ्गलं जलम् ।।२६।। वह्वम्बुर्बहुवृक्षश्च वातश्लेष्मामयान्वितः । देशोऽनूप इति ख्यात आनूपं तद्भवं जलम् ।।२७।। मिश्रचिह्नस्तु यो देशः सहि साधारणः स्मृतः । तस्मिन्देशे यदुदकं तत्तु साधारणं स्मृतम् ।।२८।। जाङ्गलं सलिलं रूक्षं लवणं लघु पित्तनुत् । वह्निकृत्कफहत्पथ्यं विकारान्हर्ते बहून ।।२९।। आनूपं वार्यभिष्यन्दि स्वादु स्निग्धं घनं गुरु । वह्निहृत्कफकृद्दह्यं विकारान्कुरुते बहून ।।३०।। साधारणं तु मधुरं दीपनं शीतलं लघु । तर्पणं रोचनं तृष्णादाहदोषत्रयप्रणुत् ।।३१।। भौम जल के भेदों में जो जाङ्गल आदि जल के तीन भेद हैं उनके क्रम से प्रथम केवल लक्षण तत्पश्चात् क्रम से गुण ये हैं—जाङ्गल जल के लक्षण—जहाँ पर थोड़े जल तथा थोड़े वृक्ष होते हों और पित्त तथा रक्त सम्बन्धी विकार अधिक उत्पन्न होते हों उसे जाङ्गल देश तथा वहाँ के जल को जाङ्गल जल समझना चाहिये। आनूप जल के लक्षण—जहाँ पर अधिक रूप से जल तथा वृक्ष होते हों और वात तथा कफ सम्बन्धी रोग भी अधिक रूप से होते हों उसे अनूप देश तथा वहाँ के जल को आनूप जल समझना चाहिये । साधारण जल के लक्षण—जहाँ पर जांगल तथा अनूप दोनों देशों के चिह्न मिले हुये मिलते हों तो उसे साधारण देश तथा वहाँ के जल को साधारण जल समझना चाहिये।
वारिवर्गः ८९९ जांगल जल-रूक्ष, लवणरसयुक्त, लघु, पित्तनाशक, अग्निवर्धक, कफनाशक, पथ्य एवम् अनेक प्रकार के विकारों को नष्ट करने वाला होता है। आनूप जल-रूक्ष, लवणरसयुक्त, लघु, पित्तनाशक, अग्निवर्धक, कफनाशक, पथ्य एवम् अनेक प्रकार के विकारों को नष्ट करने वाला होता है। साधारण जल-मधुररसयुक्त, अग्निदीपक, शीतल, लघु, तृप्तिकारक, रोचक एवम् प्यास, दाह तथा त्रिदोष को दूर करने वाला होता है। [२६-३१] अथ भौमानामेव नादेयादीनां लक्षणानि गुणांश्च। तत्र नादेयस्य लक्षणं गुणाँश्चाह नद्या नदस्य वा नीरं नादेयमिति कीर्त्तितम् ।।३२।। नादेयमुदकं रूक्षं वातलं लघु दीपनम्। अनभिष्यन्दि विशदं कटुकं कफपित्तनुत् ।।३३।। भौम जल के अन्य प्रकार से नादेयादि भेदों के लक्षण तथा गुण क्रम से ये हैं। नादेय के लक्षण-नदी या नद के जल को "नादेय" कहते हैं। नादेय जल-रूक्ष, वातजनक, लघु, अग्निदीपक, ईषत् अभिष्यन्दी, विशद गुण युक्त, कटु रस युक्त एवम्-कफ तथा पित्त को दूर करने वाला होता है। [३२-३३] अथ शीघ्रवहत्वादिविभेदेन च नादेयजलानां गुणभेदानाह नद्यः शीघ्रवहा लघ्व्यः सर्वा याश्चामलोदकाः । गुर्व्यः शैवलसंछन्ना मन्दगाः कलुषाश्च याः ।।३४।। हिमवत्प्रभवाः पथ्या नद्योऽश्माहतपाथसः । गङ्गाशतद्रूसरयूयमुनाऽऽद्या गुणोत्तमाः ।।३५।। सह्यशैलभवा नद्यो वेणागोदावरीमुखाः । कुर्वन्ति प्रायशः कुष्ठमीषद्वातकफावहाः ।।३६।। शीघ्र तथा मन्द गति से बहने के भेद से एवम्-देश भेद से नदियों के जलों में जो गुणभेद होते हैं वे ये हैं- शीघ्रगति से बहने वाली-ऐसी जितनी नदियाँ होती हैं उन सबों का जल लघु तथा स्वच्छ होता है। मन्द गति से बहने वाली या सेवार से ढके हुए जल वाली किंवा मलिन जल वाली-ऐसी जो नदियाँ हैं उन सबों का जल गुरू होता है। हिमालय से निकल कर बहने वाली या पत्थरों से टक्कर खानेवाली-ऐसी जो गङ्गा, शतद्रू (सतलज), सरयू तथा यमुना आदि नदियाँ हैं उनका जल पथ्य एवम् गुणों में उत्तम होता है। सह्यपर्वत से निकल कर बहने वाली-ऐसी जो वेणा तथा गोदावरी आदि नदियाँ हैं उन सबों का जल प्रायः करके कुष्ठ रोग उत्पन्न करने वाला एवम् किञ्चित् वात तथा कफ कारक होता है। [३४-३६] परिभाषा नदीसरस्तडागस्थे कूपप्रस्रवणादिजे । उदके देशभेदेन गुणान्दोषांश्च लक्षयेत् ।।३७।। परिभाषा-नदी, सरोवर, तालाब, कुआँ तथा झरना आदि ये सब जैसे जांगल आदि देशों में स्थित हों उनके अनुसार इनके जलों के गुण तथा दोष समझने चाहिये। [३७] अथौद्भिदजलस्य लक्षणं गुणाँश्चाह विदार्य भूमिं निम्नां यन्महत्या धारया स्रावेत् । तत्तोयमौद्भिदं नाम वदन्तीति महर्षयः ।।३८।। औद्भिदं वारि पित्तघ्नमविदाह्यतिशीतलम् । प्रीणनं मधुरं बल्यमीषद्वातकरं लघु ।।३९।। औद्भिद जल के लक्षण-नीची जमीन को फोड़कर जो बड़ी धारा से निकल कर बहे उस जल को महर्षि लोग औद्भिदसंज्ञक कहते हैं। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
१०० भावप्रकाशनिघण्टुः औद्भिद जल-पित्तनाशक, अविदाही, अतिशीतल, तृप्तिकारक, मधुररसयुक्त, बलकारक, एवम् किञ्चित् वातकारक तथा लघु होता है। [३८-३९] अथ नैर्झरजलस्य लक्षणं गुणाँश्चाह शैलसानुस्रवद्वारिप्रवाहो निर्झरो झरः। स तु प्रस्रवणश्चापि तत्रत्यं नैर्झरं जलम् ।।४०।। नैर्झरं रुचिकृत्तीव्रं कफघ्नं दीपनं लघु। मधुरं कटुपाकं च वातलं स्यादपित्तलम् ।।४१।। नैर्झर जल के लक्षण-पर्वत के शिखर से गिरते हुये जल के प्रवाह को संस्कृत में निर्झर, झर तथा प्रस्रवण (हिन्दी में झरना) कहते हैं। एवम् उसी के जल को नैर्झर जल (झरने का जल) कहते हैं। नैर्झर जल-रुचिकारक, कफनाशक, अग्निदीपक, लघु, मधुर रसयुक्त, विपाक में कटुरसयुक्त, वातकारक तथा ईषत् पित्तकारक (पाठान्तर में पित्तकारक) होता है। [४०-४१] अथ सारसजलस्य लक्षणं गुणाँश्चाह नद्याः शैलादिरुद्धाया यत्र संस्रुत्य तिष्ठति। तत्सरो जलजच्छन्नं तदम्भः सारसं स्मृतम् ।।४२।। सारसं सलिलं बल्यं तृष्णाघ्नं मधुरं लघु। रोचनं तुवरं रूक्षं बद्धमूत्रमलं स्मृतम् ।।४३।। सारस जल के लक्षण-नदी का जल जहाँ पर पर्वत आदि से रोके जाने पर झर-झर के संचित होता जाता है और कमल के पत्तों से जहाँ पर ढका रहता है उस संचित जल युक्त प्रदेश को सर कहते हैं तथा उसके जल को सारस जल कहते हैं। सारस जल-बलकारक, प्यास को शान्त करने वाला, मधुर तथा कषाय रस युक्त, लघु, रोचक, रूक्ष, मूत्र तथा मल का विबन्ध करने वाला होता है। [४२-४३] अथ ताडागजलस्य लक्षणं गुणाँश्चाह प्रशस्तभूमिभागस्थो बहुसंवत्सरोषितः। जलाशयस्तडागः स्यात्ताडागं तज्जलं स्मृतम् ।।४४।। ताडागमुदकं स्वादु कषायं कटुपाकि च। वातलं बद्धविण्मूत्रमसृक्पित्तकफापहम् ।।४५।। ताडाग जल के लक्षण-प्रशस्त (उत्तम) भूमि का जो भाग है उस पर स्थित अनेक वर्षों का पुराना जो जलाशय है उसे "तड़ाग" कहते हैं। और तत्सम्बन्धी जल को "ताडाग जल" कहते हैं। ताडाग जल (तालाब का जल)-स्वादिष्ट, कषाय रसयुक्त, विपाक में कटुरसयुक्त, वात-जनक, मल मूत्र का विबन्ध करने वाला एवम् रक्तपित्त तथा कफ को दूर करने वाला होता है। [४४-४५] अथ वाप्य जलस्य लक्षणं क्षारमिष्टयोस्तयोर्गुणाँश्चाह पाषाणैरिष्टकाभिर्वा बद्धः कूपो बृहत्तरः। ससोपानो भवेद्वापी तज्जलं वाप्यमुच्यते ।।४६।। वाप्यं वारि यदि क्षारं पित्तकृत्कफवातहृत्। तदेव मिष्टं कफकृद्वातपित्तहरं भवेत् ।।४७।। वाप्य जल के लक्षण-जो कूआँ पत्थर तथा ईंटों से बँधा हुआ हो तथा बहुत बड़ा हो और जिसमें उतरने के लिए सीढ़ियाँ भी बनी हों तो उसे वापी (बावड़ी) कहते हैं और उसके जल को "वाप्य जल" कहते हैं। वाप्य जल (बावड़ी का जल)-यदि खारा हो तो पित्तकारक एवम् कफ तथा वात को दूर करने वाला होता है और यदि वही (जल) मीठा हो तो कफकारक एवम् वात तथा पित्त नाशक होता है। [४६-४७] अथ कौपजलस्य लक्षणं स्वादुक्षारयोस्तयोर्गुणाँश्चाह भूमौ खातोऽल्पविस्तारो गम्भीरो मण्डलाकृतिः। बद्धोऽबद्धः सकूपः स्यात्तदम्भः कौपमुच्यते ।।४८।। कौपं पयो यदि स्वादु त्रिदोषघ्नं हितं लघु। तत्क्षारं कफवातघ्नं दीपनं पित्तकृत्परम् ।।४९।।
वारिवर्गः ९०१ कौप जल के लक्षण—जो गड्डा थोड़े विस्तार का अर्थात् कम चौड़ा मण्डलाकार (गोलाकार मुँह वाला), गहरा होता है एवम् वह चाहे ईंटे आदि से बँधा हो या न बँधा हो तो उसे कूप अर्थात् कूआँ कहते हैं। और उसी के जल को “कौप जल” कहते हैं। कौपजल (कूयें का जल)—यदि स्वादिष्ट हो तो त्रिदोषनाशक, हितकारी तथा लघु होता है और यदि खारा हो तो कफ तथा वात नाशक, अग्निदीपक और अत्यन्त पित्तकारक होता है। [४८-४९] अथ चौञ्ज्यजलस्य लक्षणं गुणाँश्चाह शिलाकीर्णं स्वयं श्वभ्रं नीलाञ्जनसमोदकम्। लतावितानसंच्छन्नं चौञ्ज्यमित्यभिधीयते ।।५०।। अश्मादिभिरबद्धं यत्तच्चौञ्ज्यमिति वा परे। यत्रत्यमुदकं चौञ्ज्यं मुनिभिस्तदुदाहृतम् ।।५१।। चौञ्ज्यं वह्निकरं नीरं रूक्षं कफहरं लघु। मधुरं पित्तनुद्रुच्यं पाचनं विशदं स्मृतम् ।।५२।। चौञ्ज्य जल के लक्षण—जो गड्डा अपने आप हो गया हो और जिसमें पत्थर के टुकड़े हों एवं जल नीले अञ्जन के समान हो तथा लताओं के विस्तार से ढका हो तो उसे संस्कृत में चौञ्ज्य (चोंड़ा) कहते हैं। अन्य आचार्यों का मत है कि जो गड्डा पत्थर आदि से न बाँधा हुआ हो उसे चौञ्ज्य कहते हैं। और इसके जल को मुनि लोग “चौञ्ज्य जल” कहते हैं। चौञ्ज्यजल—अग्निकारक, रूक्ष, कफनाशक, लघु, मधुर रस युक्त, पित्तनाशक, रोचक, पाचक तथा विशद गुण युक्त होता है। [५०-५२] अथ पाल्वलजलस्य लक्षणं गुणाँश्चाह अल्पं सरः पल्वलं स्याद्यत्र चन्द्रर्क्षगे रवौ ।।५३।। न तिष्ठति जलं किञ्चित्तत्रत्यं वारि पाल्वलम्। पाल्वलं वार्यभिष्यन्दि गुरु स्वादु त्रिदोषकृत् ।।५४।। पाल्वलं जल के लक्षण—सूर्य जब चन्द्रमा के नक्षत्र पर हों तब जिसमें कुछ भी जल न रहता हो ऐसे छोटे- छोटे तलैया को पल्वल कहते हैं और इसके जल को पाल्वल जल कहते हैं। पाल्वल जल—अभिष्यन्दी, गुरु, स्वादिष्ट तथा त्रिदोषकारक होता है। [५३-५४] ❖ रवौ = सूर्ये, चन्द्रर्क्षगे = कर्कटराशिस्थे, श्रावणे मासीति यावत्। अत्र चन्द्रर्क्षं मृगशिरस्तत्रग इति मुख्यार्थः ।।५३-५४।। यहाँ पर “रवि” से सूर्य, तथा “चन्द्रर्क्षग” पद से—“चन्द्र की राशि कर्क में स्थित अर्थात् श्रावण मास में—” यह अर्थ समझना चाहिये, किन्तु वस्तुतः यह अर्थ नहीं हो सकता क्योंकि श्रावण वर्षा ऋतु में सर्वत्र वर्षा का जल रहता ही है। अतः उक्त पद का चन्द्र नक्षत्र मृगशिर पर स्थित अर्थात् वृष राशि पर स्थित अर्थ समझना चाहिये जो ज्येष्ठ मास में पड़ता है—उस समय जिसमें जल न ठहरता हो यह अर्थ युक्तियुक्त है। [५३-५४] अथ विकिरजलस्य लक्षणं गुणाँश्चाह नद्यादिनिकटे भूमियां भवेद्वालुकामयी। उद्भाव्यते ततो यत्तु तज्जलं विकिरं विदुः ।।५५।। विकिरं शीतलं स्वच्छं निर्दोषं लघु च स्मृतम्। तुवरं स्वादु पित्तघ्नं क्षारं तत्पित्तलं मनाक् ।।५६।। विकिर जल के लक्षण—नदी आदि के निकट जो बालुकामय भूमि हो वहाँ पर जो जल खन कर निकाला जाता है उसे विकिर-जल कहते हैं। विकिर जल—शीतल, स्वच्छ, निर्दोष, लघु, कषाय तथा मधुररसयुक्त एवम् पित्तनाशक होता है। यदि वही जल खारा हो तो किञ्चित् पित्तकारक होता है। [५५-५६] CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammnu. Digitized by S3 Foundation USA
९०२ भावप्रकाशनिघण्टुः अथ कैदारजलस्य लक्षणं गुणाँश्चाह केदारः क्षेत्रमुद्दिष्टं कैदारं तज्जलं स्मृतम्। कैदारं वार्यभिष्यन्दि मधुरं गुरु दोषकृत् ।।५७।। कैदार जल के लक्षण-केदार-यह शब्द क्षेत्र (खेत) का पर्यायवाची है, अतः इसके जल को कैदार जल कहते हैं। कैदार जल-अभिष्यन्दी, मधुर रस युक्त, गुरु तथा वातादिदोष कारक होता है। [५७] अथ वृष्टिजलस्य लक्षणं गुणाँश्चाह वार्षिकं तदहर्वृष्टं भूमिस्थमहितं जलम्। त्रिरात्रमुषितं तत्तु प्रसन्नममृतोपमम् ।।५८।। वृष्टि जल (वर्षा के जल) के लक्षण-तत्काल वर्षा होकर जो जल पृथ्वी पर जमा रहता है उसे वार्षिक जल (वृष्टि का जल) कहते हैं, यह अहितकारक होता है। किन्तु यही ३ रात्रि के बाद मिट्टी बैठ जाने से यदि स्वच्छ हो तो अमृत के समान गुणकारी होता है। [५८] अथ हेमन्तादिकालविशेषे विहितं जलविशेषमाह हेमन्ते सारसं तोयं ताडागं वा हितं स्मृतम्। हेमन्ते विहितं तोयं शिशिरेऽपि प्रशस्यते ।।५९।। वसन्तग्रीष्मयोः कौपं वाप्यं वा नैर्झरं जलम्। नादेयं वारि नादेयं वसन्तग्रीष्मयोर्बुधैः ।।६०।। विषवद्गङ्गनवृक्षाणां पत्राद्यैर्दूषितं यतः। औद्भिदं वाऽऽन्तरिक्षं वा कौपं वा प्रावृषि स्मृतम्। शस्तं शरदि नादेयं नीरमंशूदकं परम् ।।६१।। हेमन्तादि काल विशेष में जलविशेष का विधान-हेमन्त (अगहन-पूस) ऋतु में सरोवर या तालाब का जल विशेष हितकर होता है और जो जल हेमन्त में हितकर कहा गया है वही (सरोवर या तालाब का जल) शिशिर (माघ- फाल्गुन) में भी उत्तम होता है। वसन्त (चैत-वैशाख) तथा ग्रीष्म (जेठ-आषाढ़) ऋतु में कूँआँ, बावड़ी या झरना का जल उत्तम होता है। वसन्त तथा ग्रीष्म ऋतु में नदी का जल पीने के लिये बुद्धिमान् व्यक्ति को कभी नहीं लेना चाहिये, क्योंकि उस समय वह (नदी का जल) जंगली वृक्षों के पत्ते के पड़ने से दूषित होकर विषैला हो जाता है। औद्भिद, आकाश से उत्तम भूमि पर गिरा हुआ या कूँएँ का जल वर्षा ऋतु में उत्तम होता है। शरद (क्वार-कार्तिक) ऋतु में नदी का अथवा अंशूदक संज्ञक जल अति हितकर होता है। [५९-६१] अथांशूदकजलस्य लक्षणं गुणाँश्चाह दिवा रविकरैर्जुष्टं निशि शीतकरांशुभिः। ज्ञेयमंशूदकं नाम स्निग्धं दोषत्रयापहम् ।।६२।। अनभिष्यन्दि निर्दोषमान्तरिक्षजलोपमम्। बल्यं रसायनं मेध्यं शीतं लघु सुधासमम् ।।६३।। अंशूदक जल के लक्षण-जिस जल के ऊपर दिन में सूर्य की किरणें और रात में चन्द्रमा की किरणें पड़ी हों उसे "अंशूदक" कहते हैं। अंशूदक-स्निग्ध गुणयुक्त, त्रिदोषनाशक, अनभिष्यन्दी (अभिष्यन्दी नहीं), निर्दोष, आंतरिक्ष जल के समान, बलकारक, रसायन, मेधा के लिये हितकर, शीतल, लघु तथा अमृत के समान होता है। [६२-६३] ❖ रविकरैर्जुष्टमित्युक्ते दिवापदं समस्तदिवसप्राप्त्यर्थं, शीतकरांशुभिर्जुष्टमित्युक्ते निशीतिपदं समस्तरात्रिप्राप्त्यर्थम् ।।६२।। यहां पर "रविकरैर्जुष्टम्" ऐसा कहने पर पुनः "दिवा" पद का उल्लेख करने से "सारा दिन सूर्य की किरणें पड़ी हों" तथा "शीतकरांशुभिर्जुष्टम्" ऐसा कहने पर पुनः "निशा" पद का उल्लेख करने से "सारी रात चन्द्रमा की किरणें पड़ी हों" ऐसा अर्थ समझना चाहिए। [६२-६३] CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA
वारिवर्गः १०३ अन्यच्च शरदि स्वच्छमुदयादगस्त्याखिलं हितम् ।।६४।। इसके अतिरिक्त अन्य वचन—शरद ऋतु में अगस्त्य तारा के उदय होने से सभी प्रकार के जल स्वच्छ हो जाते हैं अतः वे भी सभी हितकारी होते हैं । [६४] वृद्धसुश्रुतस्तु पौषे वारि सरोजातं माघे तत्तु तडागजम् । फाल्गुने कूपसम्भूतं चैत्रे चौज्यं हितम् मतम् ।।६५।। वैशाखे नैर्झरं नीरं ज्येष्ठे शस्तं तथौद्भिदम् । आषाढे शस्यते कौपं श्रावणे दिव्यमेव च ।।६६।। भाद्रे कौपं पयः शस्तमाश्विने चौज्यमेव च । कार्तिके मार्गशीर्षे च जलमात्रं प्रशस्यते ।।६७।। वृद्ध सुश्रुत के तो इस विषय में ये वचन हैं कि—पूस मास में—सरोवर का जल, माघ मास में—तालाब का जल, फागुन मास में—कूंएँ का जल, चैत मास में—चौज्य (चौड़े का) जल, वैशाख मास में—झरने का जल, जेठ मास में औद्भिद जल, आषाढ़ मास में—कूंयें का जल, श्रावण मास में—आकाश (वर्षा) का जल, भादो मास में— कूंयें का जल, क्वार मास में—चौज्य (चौड़े का) जल, कार्त्तिक तथा अगहन मास में—सम्पूर्ण जल प्रशस्त होता है । [६५-६७] अथ जलग्रहणस्य समयमाह भौमानामम्भसां प्रायो ग्रहणं प्रातरिष्यते । शीतत्वं निर्मलत्वञ्च यतस्तेषां मतो गुणः ।।६८।। जल ग्रहण करने का समय—सभी प्रकार के भौम (भूमि सम्बन्धी) जलों के ग्रहण करने का समय प्रायः करके प्रातःकाल उत्तम होता है क्योंकि उस समय वे निर्मल तथा शीतल रहते हैं । अतएव और समयों की अपेक्षा अधिक गुणकारी होते हैं । [६८] अथ जलस्य पानविधिमाह अत्यम्बुपानान्न विपच्यतेऽन्नं निरम्बुपानाच्च स एव दोषः । तस्मान्नरो वह्निविवर्द्धनाय मुहुर्मुहुर्वारि पिबेदभूरि ।।६९।। जल पीने की विधि—भोजन के समय अधिक जल पीने से अन्न नहीं पचता है और एकदम कुछ भी जल न पीने से भी उक्त दोष होता है अर्थात् अन्न नहीं पचता है । अतएव मनुष्य को चाहिये कि उक्त समय में अग्नि बढ़ाने के लिए थोड़ा-थोड़ा करके बारम्बार जल पीवे । [६९] अथ शीतलजलपानस्य विषयानाह मूर्च्छापित्तोष्णदाहेषु विषे रक्ते मदात्यये । श्रमे भ्रमे विदग्धेऽन्ने तमके वमथौ तथा । ऊर्ध्वगे रक्तपित्ते च शीतमम्भः प्रशस्यते ।।७०।। शीतल जलपान के विषय (योग्य लोग)—मूर्च्छा, पित्त सम्बन्धी रोग, गरमी, दाह, विष, रक्तविकार, मदात्यय, श्रम, भ्रमरोग, तमक श्वास, वमन, ऊर्ध्वगामी रक्तपित्त इन सब रोगवालों के लिये तथा जिनका अन्न न पचा हुआ हो ऐसे लोगों के लिये शीतल जल पीना हितकर होता है । [७०] अथ शीतलजलपानस्य निषेधविषयानाह पार्श्वशूले प्रतिश्याये वातरोगे गलग्रहे । आध्माने स्तिमिते कोष्ठे सद्यःशुद्धौ नवज्वरे ।।७१।। अरुचिग्रहणीगुल्मश्वासकासेषु विद्रधौ । हिक्कायां स्नेहपाने च शीताम्बु परिवर्जयेत् ।।७२।।
९०४ भावप्रकाशनिघण्टुः शीतल जलपान के निषेध के विषय—अर्थात् शीतल जल पीना जिन रोगों में निषिद्ध है उनका निर्देश— पार्श्वशूल (पसली का दर्द), जुकाम, वातरोग, गलग्रह, अफारा, बद्धकोष्ठ तथा वमन विरेचनादि द्वारा शोधन कर्म करने के तत्काल बाद में एवम् नवीन ज्वर, अरुचि, ग्रहणी, गुल्म, श्वास, खाँसी, विद्रधि, हिचकी तथा स्नेहपान (तैल आदि पीने पर) इन सबों में शीतल जल पीना त्याग कर देना चाहिये। [७१-७२] अथाल्पजलपानस्य विषयानाह अरोचके प्रतिश्याये मन्देऽग्नौ श्वयथौ क्षये । मुखप्रसेके जठरे कुष्ठे नेत्राामये ज्वरे । व्रणे च मधुमेहे च पिबेत्पानीयमल्पकम् ।।७३।। थोड़े जलपान के विषय अर्थात् जिनमें थोड़ा जल पीना उचित है उन रोगों का निर्देश—अरुचि, जुकाम, मन्दाग्नि, शोथ, क्षय, मुखप्रसेक (मुख में जल भर आना), उदररोग, कुष्ठ, नेत्रविकार, ज्वर, व्रण और मधुमेह इन रोगों में रोगी को थोड़ा जल पीना उचित है। [७३] अथ जलपानस्यावश्यकतामाह जीवनं जीविनां जीवो जगत् सर्वन्तु तन्मयम् । नातोऽत्यन्तनिषेधेन कदाचिद्वारि वार्यते ।।७४।। जलपान की आवश्यकता—जीवन (जल) प्राणियों का जीवन स्वरूप है और सम्पूर्ण जगत् जलमय है। अतः जल का अत्यन्त निषेध के साथ कभी नहीं निवारण करे अर्थात् एकदम से जल पीने का निषेध कभी नहीं करना चाहिये किन्तु अति स्वल्पमात्रा में देना ही चाहिये। [७४] हारीतश्च तृष्णा गरीयसी घोरा सद्यःप्राणविनाशिनी । तस्माद् देयं तृषाऽर्त्ताय पानीयं प्राणधारणम् ।।७५।। तृषितो मोहमायाति मोहात्प्राणान्विमुञ्चति । अतः सर्वास्ववस्थासु न क्वचिद्वारि वारयेत् ।।७६।। इस विषय में "हारीत" भी कहते हैं कि—अत्यन्त प्यास बड़ी भयंकर होती है क्योंकि उससे सद्यः प्राण निकल जाता है, इसलिये जो अत्यन्त प्यास से पीड़ित हो उसे प्राण धारण करने का प्रधान साधन जल अवश्य पीने के लिये देना चाहिये। और जो प्यासा होता है उसे अन्त में मूर्च्छा हो जाती है और मूर्च्छा होने से अन्त में वह प्राणों को छोड़ देता है, अतः सभी अवस्थाओं में कभी भी जल पीने का निषेध नहीं करना चाहिये। [७५-७६] अथ गुणवतस्तोयस्य लक्षणान्याह अगन्धमव्यक्तरसं सुशीतं सर्पनाशनम् । स्वच्छं लघु च हृद्यञ्च तोयं गुणवदुच्यते ।।७७।। गुणकारी जल के लक्षण—जो जल गन्धरहित हो तथा जिसका रस पूर्ण रूप से न मालूम पड़ता हो एवं जो अति शीतल, पीने से शीघ्र प्यास को शान्त करने वाला, स्वच्छ, लघु तथा हृदय के लिये हितकर या हृदय को प्रिय हो तो उसे प्रशस्त गुणवाला अर्थात् उत्तम जल समझना चाहिये। [७७] अथावगुणकारिजलस्य लक्षणानि दुर्गुणाँश्चाह पिच्छिलं कृमिलं क्लिन्नं पर्णशैवालकर्दमैः । विवर्णं विरसं सान्द्रं दुर्गन्धं न हितं जलम् ।।७८।। कलुषं छन्नमम्भोजपर्णनीलीतृणादिभिः । दुःस्पर्शनमसंस्पृष्टं सौरचान्द्रमरीचिभिः ।।७९।। अनार्त्तवं वार्षिकं तु प्रथमं तच्च भूमिगम् । व्यापन्नं परिहर्त्तव्यं सर्वदोषप्रकोपणम् ।।८०।। तत् कुर्यात्स्नानपानाभ्यां तृष्णाऽऽध्मानचिरज्वरान्। कासाग्निमान्द्याभिष्यन्दकण्डूगण्डादिकं तथा ।।८१।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmụ. Digitized by S3 Foundation USA
यहाँ प्रस्तुत पृष्ठ का सम्पूर्ण पाठ देवनागरी लिपि में पंक्ति-दर-पंक्ति दिया गया है:
वारिवर्गः ९०५ अवगुण करने वाले जल के लक्षण-जो जल-पिच्छिल, कृमियुक्त और पत्ते, सेवार तथा कीचड़ से खराब हो गया हो, एवम् विकृत वर्ण का, विरस, गाढ़ा तथा दुर्गन्ध युक्त हो गया हो वह हितकारी नहीं होता है। और जो जल- गंदला तथा कमल के पत्ते, सेवार तथा तृण आदि से ढका हुआ एवं जिसके स्पर्श से खुजली होने लगे और जिस पर सूर्य तथा चन्द्रमा की किरणें कभी न पड़ती हों, और जो अनार्त्तव (पूस, माघ, फागुन, चैत इन चार मांसों में वर्षा का) और प्रथम वर्षा का भूमि पर स्थित जल हो तथा दूषित हो तो ऐसा जल पीने के लिये सर्वथा त्याग करने योग्य होता है क्योंकि वह सब दोषों को प्रकुपित करने वाला होता है। और उक्त जल को जो कोई पीने तथा नहाने के कार्य में लेता है तो उसे तृषा, अफारा, जीर्णज्वर, खाँसी, अग्नि की मन्दता, अभिष्यन्द, खुजली तथा गलगण्ड आदि रोग उत्पन्न हो जाते हैं। [७८-८१] अथ दूषितजलस्य निर्दोषीकरणोपायमाह निन्दितं चापि पानीयं क्वथितं सूर्यतापितम्। सुवर्णं रजतं लौहं पाषाणं सिकतामपि ।।८२।। भृशं सन्ताप्य निर्वाप्य सप्तधा साधितं तथा। कर्पूरजातिपुन्नागपाटलादिसुवासितम् ।।८३।। शुचिसान्द्रपटस्रावि क्षुद्रजन्तुविवर्जितम्। स्वच्छं कनकममुक्ताऽऽद्यैः शुद्धं स्याद्दोषवर्जितम् ।।८४।। पर्णमूलविसग्रन्थिमुक्ताकनकशैवलैः । गोमेदेन च वस्त्रेण कुर्यादम्बुप्रसादनम् ।।८५।। दूषित जल को निर्दोष (शुद्ध) करने का उपाय-जो जल उक्त प्रकार से निन्दित हो उसे काढ़े की भाँति पकावे, या सूर्य की किरणों से गरम कर दे अर्थात् धूप में रख दे, वा सोना, चाँदी, लोहा, पत्थर, बालू को खूब गरम कर-कर के सात बार उक्त जल में बुझा दे, तदुपरांत कपूर, चमेली का पुष्प, सुलतानचम्पा का पुष्प, पाढ़ल पुष्प आदि से सुवासित कर दे और स्वच्छ तथा गाढ़े वस्त्र से छान दे जिससे छोटे-छोटे कृमि दूर हो जायें, इस प्रकार से स्वंच्छ किया हुआ अथवा सोना या मोती आदि के द्वारा शुद्ध किया हुआ जल स्वच्छ तथा दोष रहित हो जाता है। पत्ते, मूल, बिसग्रन्थि (कमल का मूल), मोती, सोना, सेवार, गोमेदमणि तथा वस्त्र इन सबों से जल को स्वच्छ करना चाहिये। [८२-८५] अथ पीतजलस्य परिपाककालानाह पीतं जलं जीर्य्यति यामयुग्माद्यामैकमात्राम्च्छृतशीतलञ्च । तदर्धमात्रेण शृतं कदुष्णं पयःप्रपाके त्रय एव कालाः ।।८६।। पीये हुये जल के पचने में समय का परिमाण-पीया हुआ साधारण जल दो प्रहर (६ घण्टे) में पच जाता है। औटा कर ठंडा किया हुआ जल पीने से वह १ प्रहर (३ घण्टा) में पचता है। और औटा कर किंचित् गरम जल पीने से आधे प्रहर (१।। घण्टे) में पच जाता है। इस भाँति से जल के पचने में ३ प्रकार के समय के परिमाण हैं। [८६] इति श्रीमिश्रलटकनतनय श्रीमिश्रभावविरचिते भावप्रकाशे वर्गप्रकरणे वारिवर्गः समाप्तः। ❧§❧
अथ दुग्धवर्गः अथ दुग्धस्य नामानि गुणाँश्चाह दुग्धं क्षीरं पयः स्तन्यं बालजीवनमित्यपि । दुग्धं सुमधुरं स्निग्धं वातपित्तहरं सरम् ॥१॥ सद्यःशुक्रकरं शीतं सात्म्यं सर्वशरीरिणाम्। जीवनं बृंहणं बल्यं मेध्यं वाजीकरं परम् ।। वयःस्थापनमायुष्यं सन्धिकारि रसायनम् ।।२।। दूध के संस्कृत नाम-दुग्ध, क्षीर, पयः (पयस्), स्तन्य तथा बालजीवन ये सब हैं। दूध-मधुररसयुक्त, स्निग्ध, वात तथा पित्त को दूर करने वाला, सारक, तत्काल शुक्र को उत्पन्न करने वाला, शीतल, सम्पूर्ण प्राणियों के लिये सात्म्य (अनुकूल), जीवनी शक्ति को देने वाला, बृंहण (रस-रक्तादि वर्धक), बलकारक, मेधा शक्ति के लिये हितकर, अत्यन्त वाजीकरण, अवस्था को स्थिर रखने वाला, आयु को बढ़ाने वाला, सन्धानकारक तथा रसायन है। [१-२] अथ दुग्धपानार्हजनानाह विरेकवान्तिवस्तीनां सेव्यमोजोविवर्द्धनम् ।।३।। जीर्णज्वरे मनोरोगे शोषमूर्च्छाभ्रमेषु च। ग्रहण्यां पाण्डुरोगे च दाहे तृषि हृदामये ।।४।। शूलोदावर्त्तगुल्मेषु वस्तिरोगे गुदाङ्कुरे। रक्तपित्तेऽतिसारे च योनिरोगे श्रमे क्लमे ।।५।। गर्भस्रावे च सततं हितं मुनिवरैः स्मृतम् । बालवृद्धक्षतक्षीणाः क्षुद्व्यवायकृशाश्च ये ।। तेभ्यः सदाऽतिशयितं हितमेतदुदाहृतम् ।।६।। दूध पीने के योग्य लोग-जिन्होंने विरेचन, वमन तथा वस्ति का प्रयोग किया है, ऐसे लोगों के लिये दूध सेवन करने के योग्य और ओजोवर्धक है। तथा जीर्णज्वर, मानसिकरोग, शोष, मूर्च्छा, भ्रम, ग्रहणी, पाण्डुरोग, दाह, तृषा, हृद्रोग, शूल, उदावर्त्त, गुल्म, वस्तिरोग, अर्श, रक्तपित्त, अतिसार, योनिरोग, श्रम, क्लान्ति, गर्भस्राव, इन सब रोगों में दूध पीना सर्वदा हितकर होता है, ऐसा मुनियों का मत है और जो बालक, वृद्ध तथा क्षतक्षीण हैं या भूख और मैथुन से कृश हो गये हैं ऐसे लोगों के लिये यह (दूध) सदा अत्यन्त हितकर कहा हुआ है। [३-६] अथ गोदुग्धस्य गुणानाह गव्यं दुग्धं विशेषेण मधुरं रसपाकयोः। दोषधातुमलस्रोतः किञ्चित्क्लेदकरं गुरु ।।७।। शीतलं स्तन्यकृत्स्निग्धं वातपित्तास्रनाशनम्। जरासमस्तरोगणां शान्तिकृत् सेविनां सदा ।।८।। गाय के दूध के गुण-गाय का दूध विशेष कर स्वाद तथा विपाक में मधुर रसयुक्त, शीतल, दुग्धवर्धक, स्निग्ध, वात-पित्त तथा रक्तविकार को नष्ट करने वाला, दोष-धातुमल तथा नाड़ियों में किञ्चित् क्लेद (आर्द्रता) उत्पन्न करने वाला, गुरु एवम् निरन्तर सेवन करने वालों की वृद्धावस्था तथा समस्तरोगों को शमन करने वाला होता है। [७-८] अथ कृष्णाऽऽदीनां गवां दुग्धस्य गुणानाह कृष्णाया गोर्भवेद् दुग्धं वातहारि गुणाधिकम् ।।९।। पीताया हरते पित्तं तथा वातहरं भवेत्। श्लेष्मलं गुरु शुक्लाया रक्ता चित्रा च वातहृत् ।।१०।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
"? No. Why would it be "जाङ्गलानूपशैलेषु"? In Sanskrit, the text is: "जाङ्गलानूपशैलेषु चरन्तीनां यथोत्तरम् । पयो गुरुतरं ज्ञेयं स्नेहो वाऽऽहारतो भवेत् ॥" (or स्नेहो यथाऽऽहारं प्रवर्त्तते). The word is unambiguously "जाङ्गलानूपशैलेषु" (जाङ्गल + आनूप + शैलेषु). Wait, look at the image: does the typesetter have an extra 'ा' or is it just "जाङ्गलानूपशैलेषु"? Wait, look at the Hindi translation in line 14: "देश विशेष से गाय का दूध-जांगल देश, आनूप देश तथा पर्वतों पर..." Notice the Hindi says "जांगल देश, आनूप देश"! In line 13, look at "जाङ्गला...": Wait, look at the first 'ा' after 'ल': Wait, is the first bump 'ल'? Wait! Look at the letter before 'नू': It's 'ला'! Wait, what is before 'ला'? 'ङ्ग'! Wait, between 'ङ्ग' and 'ला', is there an 'ा'? No! Ah! I see what happened: 'ङ्ग' has no vertical line. Then comes 'ल'. 'ल' has two arches, then a vertical stem. Then the 'ा' danda. Wait, look at
९०८ भावप्रकाशनिघण्टुः विभिन्न दुग्ध एवं मट्ठा आदि का पोषणात्मक संगठन
| पदार्थ | प्रतिशत % | कॅलरीमान | प्रति १०० ग्राम जीवतिक्ति (Vitamin) | |||||||||
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| प्रभूजिन | स्नेहांश | कार्बोज | कॅल्सियम् | फॉस्फोरस | लौह | ए <br> अ. इ. | बी₁ <br> माइ. ग्रा. | निकोटिनिक एसिड <br> मि. ग्रा. | रिबोफ्लीविन <br> माइ. ग्रा. | सी <br> मि. ग्रा. | ||
| दुग्ध मातृ | १.० | ३.९ | ७.० | ०.०२ | ०.०१ | ०.२ | ६७ | २.८ | - | - | ३० | - |
| ,, गाय | ३.३ | ३.६ | ४.८ | ०.१२ | ०.०९ | ०.२ | ६५ | १८० | ५१ | ०.१ | २०० | २ |
| ,, भैंस | ४.३ | ८.८ | ५.१ | ०.२१ | ०.१३ | ०.२ | ११७ | १६२ | - | ०.१ | - | - |
| ,, बकरी | ३.७ | ५.६ | ४.७ | ०.१७ | ०.१२ | ०.३ | ८४ | १८२ | - | - | ४० | - |
| ,, गर्दभी | १.६-२.० | १.३-१.५ | ६.२७-६.८ | - | - | - | - | - | - | - | - | - |
| ,, घोड़ी | २.१-२.५ | १.६-१.८ | ६.०-८.५ | - | - | - | - | - | - | - | - | - |
| ,, भेड़ | १.५० | २ | १.४१ | - | - | - | ३० | + | + | + | + | + |
| ,, मक्खन निकाला | २.५ | ०.१ | ४.६ | ०.१२ | ०.०९ | ०.२ | २९ | - | - | ०.१ | - | २ |
| मट्ठा | ०.८ | १.१ | ०.०५ | ०.०३ | ०.०३ | ०.८ | १५ | लेश | - | - | - | - |
| दही | २.९ | २.९ | ३.३ | ०.१२ | ०.०९ | ०.३ | ५१ | १३० | - | - | ६० | - |
| मक्खन | १.१५ | ८१.५ | - | - | - | - | ७६२ | - | - | - | - | - |
| घी | - | १०० | - | - | - | - | ९०० | - | - | - | - | - |
| मलाई | २.५ | ३० | ४.५ | - | - | - | ५७५ | - | - | - | - | - |
दुग्धवर्गः ९०९ बकरी का दूध-कषाय तथा मधुर रसयुक्त, शीतल, ग्राही, लघु, एवम्-रक्तपित्त, अतिसार, क्षय, खाँसी तथा ज्वर को दूर करने वाला होता है। बकरियाँ शरीर से छोटी होती हैं और कटु तथा तिक्तरसयुक्त पत्ते आदि खाती हैं, थोड़ा जल पीती हैं एवम् व्यायाम (चलना, फिरना) अधिक करती हैं अतः उनका दूध सर्वरोगनाशक होता है। [१६-१७] अथ मृग्यादिदुग्धस्य गुणानाह मृगीणां जाङ्गलोत्थानामजाक्षीरगुणं पयः ।।१८।। जांगल देश की हरिणियों का दूध-बकरी के दूध के समान गुणों से युक्त होता है। [१८] तत्राविकदुग्धस्य गुणानाह आविकं लवणं स्वादु स्निग्धोष्णं चाश्मरीप्रणुत्। अहृद्यं तर्पणं केश्यं¹ शुक्रपित्तकफप्रदम् ।। गुरु कासानिलोद्भूते केवले चानिले वरम् ।।१९।। भेंडी का दूध-लवण तथा मधुर रसयुक्त, स्निग्ध, उष्ण, अश्मरीनाशक, हृदय के लिये अहितकर, तृप्तिकारक, केशों के लिये हितकर, शुक्र-पित्त तथा कफ को उत्पन्न करनेवाला तथा गुरु होता है। एवम् वात से उत्पन्न होनेवाली खाँसी तथा केवल वातरोग में हितकर होता है। [१९] अथ घोटकीदुग्धस्य गुणानाह रूक्षोष्णं वडवाक्षीरं बल्यं शोषानिलापहम्। अम्लं पटु लघु स्वादु सर्वमेकशफं तथा ।।२०।। घोड़ी का दूध-रूक्ष, उष्ण, बलकारक, शोष तथा वायु को नष्ट करने वाला, अम्ल तथा लवण रसयुक्त, लघु और स्वादिष्ट होता है। एवम् घोड़े की भाँति जितने एक शफ अर्थात् अखण्डित खुर वाले हैं उनके भी दूध पूर्वोक्त गुणवाले होते हैं। [२०] अथौष्ट्रदुग्धस्य गुणानाह औष्ट्रं दुग्धं लघु स्वादु लवणं दीपनं तथा। कृमिकुष्ठकफानाहशोथोदरहरं सरम् ।।२१।। ऊँटिनी का दूध-लघु, मधुर तथा लवण रसयुक्त, अग्निदीपक, सारक एवम्-कृमि, कुष्ठ, कफ, अफरा, शोथ तथा उदर विकार को दूर करने वाला होता है। [२१] अथ हस्तिनीदुग्धस्य बृंहणं हस्तिनीदुग्धं मधुरं तुवरं गुरु। वृष्यं बल्यं हिमं स्निग्धं चक्षुष्यं स्थिरताकरम् ।।२२।। हथिनि का दूध-मधुर तथा कषाय रसयुक्त, बृंहण (रस-रक्तादिवर्धक), गुरु, वीर्यवर्धक, बलकारक, शीतल, स्निग्ध, नेत्रों के लिये हितकर तथा शरीर को दृढ़ करने वाला होता है। [२१] अथ नारीदुग्धस्य गुणानाह नार्या लघु पयः शीतं दीपनं वातपित्तजित्। चक्षुःशूलाभिघातघ्नं नस्याश्च्योतनयोर्वरम् ।।२३।। स्त्री का दूध-लघु, शीतल, अग्निदीपक एवम् वात, पित्त, नेत्रों का शूल तथा अभिघात को दूर करने वाला होता है एवम् नस्य तथा आश्च्योतन कर्म के लिये उत्तम होता है। [२३] १. वृष्य इति पाठा० ।
९१० भावप्रकाशनिघण्टुः अथ धारोष्णादिदुग्धस्य गुणानाह धारोष्णं गोपयो बल्यं लघु शीतं सुधासमम् । दीपनञ्च त्रिदोषघ्नं तद्धाराशिशिरं त्यजेत् ।। २४ ।। धारोष्णं शस्यते गव्यं धाराशीतन्तु माहिषम् । शृतोष्णमाविकं पथ्यं शृतशीतमजापयः ।। २५ ।। आमं क्षीरमभिष्यन्दि गुरु श्लेष्माभिवर्द्धनम् । ज्ञेयं सर्वमपथ्यं तु गव्यमाहिषवर्जितम् ।। २६ ।। नारीक्षीरं त्वाममेव हितं न तु शृतं हितम् । शृतोष्णं कफवातघ्नं शृतशीतन्तु पित्तनुत् ।। २७ ।। अर्द्धोदकं क्षीरशिष्टमामाल्लघुतरं पयः । जलेन रहितं दुग्धमतिपक्वं यथा यथा । तथा तथा गुरु स्निग्धं वृष्यं बलविवर्धनम् ।। २८ ।। गाय का धारोष्ण दूध—बलकारक, लघु, शीतल, अमृत के समान, अग्निदीपक तथा त्रिदोषनाशक होता है। किन्तु यदि वह (गाय का दूध) धाराशीतल अर्थात् दुहने के बाद देर तक रखने से शीतल हो गया हो तो उसे छोड़ देना चाहिये अर्थात् धारोष्ण का पूर्वोक्त गुण न होने से नहीं पीना चाहिये, यदि पीना हो तो गरम करके पीवे। धरोष्ण (दुहने के समय जो उष्णता रहती है उससे युक्त) दूध—गाय का उत्तम होता है। धाराशीत (दुहने के समय जो उष्णता रहती है उसके निकल जाने के बाद शीतल हुआ) दूध—भैंस का उत्तम होता है। उबाला हुआ गरम-गरम दूध—भेंड़ का पथ्य होता है। उबाल कर शीतल किया हुआ दूध—बकरी का पथ्य होता है। गाय तथा भैंस के दूध को छोड़ कर शेष सभी के कच्चे दूध को अभिष्यन्दी, गुरु, कफ तथा आम को बढ़ाने वाला तथा अपथ्य समझना चाहिये किन्तु स्त्री का दूध तो कच्चा ही हितकर होता है। यदि वही औंटाया हुआ हो तो हितकर नहीं होता है। साधारण रूप से औंटाया हुआ गरम दूध—कफ तथा वातनाशक होता है और औंटाकर शीतल किया हुआ— पित्तनाशक होता है। दूध में यदि आधा भाग जल मिलाकर औंटाया जाय और जब पानी जल कर केवल दूध का भाग शेष रह जाय तब उतार ले—यह दूध कच्चे की अपेक्षा अधिक लघु होता है। बिना जल छोड़े दूध को जितना ही अधिक औंटाया जायगा उतना ही अधिक उत्तरोत्तर गुरु, स्निग्ध, वीर्य तथा बल को बढ़ाने वाला होता जायगा। [२४-२८] अथ पीयूष-किलाट-क्षीरशाक-तक्रपिण्ड-मोरटानां- लक्षणानि गुणांश्चाह क्षीरं तत्कालसूताया घनं पीयूषमुच्यते । नष्टदुग्धस्य पक्वस्य पिण्डः प्रोक्तः किलाटकः ।। २९ ।। पीयूष, किलाट, क्षीरशाक, तक्रपिण्ड तथा मोरट के लक्षण और गुण—पीयूष के लक्षण—तत्काल की ब्याई हुई गाय, भैंस आदि के गाढ़े दूध को "पीयूष" कहते हैं। किलाटक के लक्षण—बिगड़े हुये दूध को यदि औंटाते-औंटाते गाढ़ा करके पिण्डाकार बना लिया जाय तो उसे किलाटक कहते हैं। [२९] पीयूषं "पेवस" इति लोके । किलाटकः "खरेटा" "गिजिरी" वा इति लोके ।। २९ ।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA
दुग्धवर्गः ९११ यहाँ पर मूल में— "पीयूष" से लोकप्रसिद्ध "पेवस" का तथा "किलाटक" से लोकप्रसिद्ध "खरेटा-या-गिजिरी" का बोध करना चाहिये। [२९] अपक्वमेव यन्नष्टं क्षीरशाकं हि तत्पयः ।। ३०।। क्षीरशाक के लक्षण—जो दूध बिना औटाये ही (कच्चा ही) फट गया हो उसे क्षीरशाक कहते हैं। [३०] ❖ क्षीरशाकं 'तुषिभरा' वा 'खिरिसा' इति लोके ।। ३०।। यहाँ पर "क्षीरशाक" से लोकप्रसिद्ध "तुषिभरा—या-खिरिसा" का बोध करना चाहिये। [३०] दध्ना तक्रेण वा नष्टं दुग्धं बद्धं सुवाससा। द्रवभावेन सहितं तक्रपिण्डः स उच्यते ।। ३१ ।। नष्टदुग्धभवं नीरं मोरटं जेज्जटोऽब्रवीत्। पीयूषञ्च किलाटश्च क्षीरशाकं तथैव च ।। ३२।। तक्रपिण्ड इमे वृष्या बृंहणा बलवर्द्धनाः। गुरवः श्लेष्मला हृद्या वातपित्तविनाशनाः ।। ३३।। दीप्ताग्नीनां विनिद्राणां विद्रधौ चाभिपूजिताः। मुखशोषतृषादाहरक्तपित्तज्वरप्रणुत् ।। लघुर्बलकरो रुच्यो मोरटः स्यात्सितायुतः ।। ३४।। तक्रपिण्ड के लक्षण—जो दूध-दही अथवा तक्र (छाछ) के संयोग से फट गया हो अथवा फाड़ा गया हो उसे यदि वस्त्र में बाँध कर लटका दिया जाय तो द्रवपदार्थ हीन होने पर अर्थात् पानी का भाग निकल जाने पर उसे "तक्रपिण्ड" कहते हैं। मोरट के लक्षण—उक्त प्रकार से दूध के फट जाने के बाद वस्त्र में बाँधने पर जो जल टपक कर गिरता है उसे "मोरट" कहते हैं, ऐसा "जेज्जट" आचार्य का कथन है। पीयूष-किलाट-क्षीरशाक तथा तक्रपिण्ड ये सब—वीर्यवर्धक, बृंहण (रस-रक्तादिवर्धक) बल को बढ़ाने वाले, गुरु, कफकारक, हृदय को हितकर, वात तथा पित्तनाशक, दीप्त अग्निवाले तथा जिन्हें नींद नहीं आती है ऐसे लोगों के लिये एवं विद्रधि रोग वालों के लिये अत्युत्तम होते हैं। और मोरट यदि बूरा से युक्त हो तो—लघु, बलकारक, रुचिजनक एवम् मुखशोष, प्यास, दाह, रक्तपित्त तथा ज्वर को दूर करने वाला होता है। [३१-३४] अथ सन्तानिका (मलाई) गुणानाह सन्तानिका गुरुः शीता वृष्या पित्तास्रवातनुत्। तर्पणी बृंहणी स्निग्धा बलासबलशुक्रला ।। ३५ ।। मलाई—गुरु, शीतल, वीर्यवर्धक, तृप्तिकारक, बृंहण (रस-रक्तादि वर्धक), स्निग्ध, कफ, बल तथा शुक्र को उत्पन्न करने वाली एवम् पित्त-रक्तविकार तथा वात को दूर करने वाली होती है। [३५] अथ खण्डादियुक्तस्य दुग्धस्य गुणानाह खण्डेन सहितं दुग्धं कफकृत्पवनापहम्। सितासितोपलायुक्तं शुक्रलं त्रिमलापहम्। सगुडं मूत्रकृच्छ्रघ्नं पित्तश्लेष्मकरं परम् ।। ३६ ।। खांड पड़ा हुआ दूध—कफकारक तथा वातनाशक होता है। बूरा या मिश्री पड़ा हुआ दूध—शुक्रजनक तथा त्रिदोषनाशक होता है। गुड़ पड़ा हुआ दूध—मूत्र-कृच्छ्रनाशक एवम् पित्त तथा कफ को अधिक उत्पन्न करने वाला होता है। [३६] अथ प्रभातादिभवस्य दुग्धस्य गुणानाह रात्रौ चन्द्रगुणाधिक्याद्व्यायामाकरणात्तथा। प्राभातिकंपयः प्रायः प्रादोषाद् गुरु शीतलम् ।। ३७ ।। दिवाकरकराघाताद्व्यायामानिलसेवनात् । प्राभातिकात्तु प्रादोषं लघु वातकफापहम् ।। ३८ ।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
९१२ भावप्रकाशनिघण्टुः प्रातः आदि समयों के दूध का गुण-प्रातःकाल का दूध प्रायः करके सायंकाल के दूध की अपेक्षा अधिक गुरु तथा शीतल होता है क्योंकि-रात्रि में चन्द्रमा के गुणों की अधिकता रहती है तथा व्यायाम (चलने फिरने का श्रम) नहीं किया जाता है और सायंकाल का दूध प्रातःकाल के दूध की अपेक्षा लघु एवम् वात तथा कफनाशक होता है, क्योंकि दिन में शरीर पर सूर्य की किरणें पड़ती रहती हैं एवम् व्यायाम (चलने फिरने का श्रम) तथा वायु सेवन होता रहता है । [३७- ३८] अथ दुग्धसेवनस्य समयविशेषेण गुणविशेषानाह वृष्यं बृंहणमग्निदीपनकरं पूर्वाह्नकाले पयो मध्याह्ने तु बलावहं कफहरं पित्तापहं दीपनम् । वाले वृद्धिकरं क्षयेऽक्षयकरं वृद्धेषु रेतोवहं रात्रौ पथ्यमनेकदोषशमनं चक्षुर्हितं संस्मृतम् ।।३९।। वदन्ति पेयं निशि केवलं पयो भोज्यं न तेनेह सहौदनादिकम् । भवत्यजीर्णं न शयीत शर्वरीं क्षीरस्य पीतस्य न शेषमुत्सृजेत् ।।४०।। विदाहीन्यन्नपानानि दिवा भुङ्क्ते हि यन्नरः । तद्विदाहप्रशान्त्यर्थं रात्रौ क्षीरं सदा पिबेत् ।।४१।। दीप्तानले कृशे पुंसि बाले वृद्धे पयःप्रिये । मतं हिततमं दुग्धं सद्यःशुक्रकरं यतः ।।४२।। समय विशेष में दूध पीने के विशेष गुण-दिन के पूर्व भाग (सुबह से १० बजे तक) में दुग्धपान (दूध पीना) वीर्यवर्धक, बृंहण (रस-रक्तादिवर्धक) तथा अग्नि को दीप्त करने वाला होता है। मध्याह्न काल में दुग्धपान-बलकारक, कफ तथा पित्त को दूर करने वाला एवम् अग्निदीपक होता है । बाल्यावस्था में दुग्धपान-शरीर की वृद्धि करने वाला होता है । क्षय अवस्था में-क्षय का निवारण करने वाला और वृद्धावस्था में दुग्धपान शुक्र की रक्षा करने वाला होता है । रात्रि में दुग्धपान-पथ्य (हितकर), अनेक दोषों को शमन करने वाला एवम् नेत्रों के लिये हितकर ऋषियों द्वारा कहा गया है । और कोई आचार्य यह कहते हैं कि-रात्रि में केवल दूध पीना चाहिये, उसके साथ भात आदि नहीं खाना चाहिये, क्योंकि इससे अजीर्ण होता है और रात्रि में नींद भी नहीं आती है और दूध पीने के बाद पात्र में कुछ शेष भाग न रख छोड़़े अर्थात् जितना पीना हो उतना ही दूध लेकर पीवे अथवा दूध यदि कुछ अधिक हो जाय तो भी पीने से हानि नहीं हो सकती अतः दूध कभी पीकर नहीं छोड़ देना चाहिये । मनुष्य दिन में जो कुछ विदाही (दाह पैदा करने वाले) अन्न-पान आदि का सेवन करता है उससे होने वाले दाह की शान्ति के लिये रात्रि में उसे प्रतिदिन दूध अवश्य पीना चाहिये । जिनकी अग्नि प्रदीप्त है या जो कृश हैं उन सभी के लिये एवम् बालक, वृद्ध तथा जिन्हें दूध प्रिय हो ऐसे लोगों के लिये दुग्ध पान अत्यन्त हितकर होता है क्योंकि यह (दुग्धपान) तत्काल (पीते ही पीते) शुक्र की वृद्धि करने वाला होता है । [३९-४२] अथ मथितदुग्धस्य गुणानाह क्षीरं गव्यमथाजं वा कोष्णं दण्डाहतं पिबेत् । लघु वृष्यं ज्वरहरं वातपित्तकफापहम् ।।४३।। मथे हुये दूध के गुण-गाय अथवा बकरी का दूध यदि औटाया हुआ मथानी से मथ कर किञ्चित् उष्ण रहते ही पीवे तो वह लघु, वीर्यवर्धक, एवम्-ज्वर, वात, पित्त तथा कफ को दूर करने वाला होता है । [४३] अथ दुग्धफेनम् (झाग) । तस्य गुणानाह गोदुग्धप्रभवं किं वा छागीदुग्धसमुद्भवम् । भवेत् फेनं त्रिदोषघ्नं रोचनं बलवर्द्धनम् ।।४४।। वह्निवृद्धिकरं वृष्यं सद्यस्तृप्तिकरं लघु । अतीसारेऽग्निमान्द्ये च ज्वरे जीर्णे प्रशस्तते ।।४५।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
दुग्धवर्गः ९१३ गाय अथवा बकरी के दूध का फेन-त्रिदोषनाशक, रोचक, बलवर्धक, अग्नि की वृद्धि करने वाला, वीर्यवर्धक, तत्काल तृप्ति देने वाला, लघु एवम् अतीसार, अग्नि की मन्दता तथा पुराने ज्वर में हितकर होता है । [४४-४५] अथ निन्दितदुग्धस्य लक्षणमाह विवर्णं विरसं चाम्लं दुर्गन्धं ग्रथितं पयः । वर्जयेदम्ललवणयुक्तं कुष्ठादिकृद् यतः ।।४६।। निन्दित दूध के लक्षण—जो दूध-विवर्ण (बदरङ्ग हो गया हो), विरस (खराब स्वाद वाला), खट्टा, दुर्गन्धयुक्त, ग्रन्थि पड़ा हुआ (फटा हुआ) एवम् खटाई या नमक पड़ा हुआ हो उसे छोड़ देना चाहिये अर्थात् न पीवे, क्योंकि उक्त दूध के पीने से कुष्ठ आदि रोग उत्पन्न हो जाते हैं । [४६] इति श्रीमिश्रलटकनतनयश्रीमिश्रभावविरचिते भावप्रकाशे वर्गप्रकरणे दुग्धवर्गः समाप्तः । ६१ भाव.I CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
अथ दधिवर्गः तत्र दध्नो गुणानाह दध्युष्णं दीपनं स्निग्धं कषायानुरसं गुरु। पाकेऽम्लं ग्राहि १पित्तास्रशोथमेदःकफप्रदम् ।।१।। मूत्रकृच्छ्रे प्रतिश्याये शीतगे विषमज्वरे। अतीसारेऽरुचौ कार्श्ये शस्यते बलशुक्रकृत् ।।२।। दही—उष्ण, अग्निदीपक, स्निग्ध, किञ्चित् कषाय रस युक्त, गुरु, विपाक में अम्लरसयुक्त, ग्राही एवम् पित्त, रक्तविकार, शोथ, मेद और कफ को उत्पन्न करने वाला होता है। और मूत्रकृच्छ्र, जुखाम, शीत विषमज्वर, अतीसार, अरुचि तथा कृशता में उत्तम होता है और बल तथा शुक्र को बढ़ाने वाला होता है। [१-२] अथ दधिभेदानाह आदौ मन्दं ततः स्वादु स्वाद्वम्लञ्च ततः परम्। अम्लं चतुर्थमत्यम्लं पञ्चमं दधि पञ्चधा ।।३।। दही के भेद—(१) मन्द, (२) स्वादु, (३) स्वाद्वम्ल, (४) अम्ल, (५) अत्यम्ल इस भाँति से दही के पाँच भेद होते हैं। [३] अथ मन्दादिदध्नो लक्षणं गुणाँश्चाह मन्दं दुग्धवदव्यक्तरसं किञ्चिद्धनं भवेत्। मन्दं स्यात्सृष्टविण्मूत्रं दोषत्रयविदाहकृत् ।।४।। यत्सम्यग्घनतां यातं व्यक्तस्वादुरसं भवेत्। अव्यक्ताम्लरसं तत्तु स्वादु विज्ञैरुदाहृतम् ।।५।। स्वादु स्यादत्यभिष्यन्दि वृष्यं मेदःकफावहम्। वातघ्नं मधुरं पाके रक्तपित्तप्रसादनम् ।।६।। स्वाद्वम्लं सान्द्रमधुरं कषायानुरसं भवेत्। स्वाद्वम्लस्य गुणा ज्ञेया सामान्यदधिवज्जनैः ।।७।। यत्तिरोहितमाधुर्यं व्यक्ताम्लत्वं तदम्लकम्। अम्लं तु दीपनं पित्तरक्तश्लेष्मविवर्द्धनम् ।।८।। तदत्यम्लं दन्तरोमहर्षकण्ठादिदाहकृत्। अत्यम्लं दीपनं रक्तवातपित्तकरं परम् ।।९।। मन्द दही के लक्षण—जो दही—दूध के समान (ठीक से नहीं जमा हुआ), अव्यक्त रसवाला तथा कुछ गाढ़ा होता है उसे "मन्द" कहते हैं। मन्द दही—मल तथा मूत्र की प्रवृत्ति करने वाला, त्रिदोष और दाह को उत्पन्न करने वाला होता है। स्वादु दही के लक्षण—जो दही भली-भाँति गाढ़ा हो गया हो और जिसका स्वाद (मधुर) रस अच्छी तरह प्रकट हो रहा हो तथा अम्लरस अव्यक्त हो (ठीक से नहीं मालूम पड़ता हो) उसे विद्वानों ने "स्वादु" संज्ञक दही बताया है। स्वादु संज्ञक दही—अत्यन्त अभिष्यन्दी, वीर्यवर्धक, मेद तथा कफ को उत्पन्न करने वाला, वातनाशक, विपाक में मधुर रसयुक्त तथा रक्तपित्त को शांत करने वाला होता है। स्वाद्वम्ल संज्ञक दही के लक्षण—गाढ़ा, मधुर रसयुक्त तथा अन्त में कषाय रस युक्त दही को "स्वाद्वम्ल" संज्ञक दही कहते हैं। १. श्वास इति पाठा० । CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammu. Digitized by S3 Foundation USA