भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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पृष्ठ 963

९१२ भावप्रकाशनिघण्टुः प्रातः आदि समयों के दूध का गुण-प्रातःकाल का दूध प्रायः करके सायंकाल के दूध की अपेक्षा अधिक गुरु तथा शीतल होता है क्योंकि-रात्रि में चन्द्रमा के गुणों की अधिकता रहती है तथा व्यायाम (चलने फिरने का श्रम) नहीं किया जाता है और सायंकाल का दूध प्रातःकाल के दूध की अपेक्षा लघु एवम् वात तथा कफनाशक होता है, क्योंकि दिन में शरीर पर सूर्य की किरणें पड़ती रहती हैं एवम् व्यायाम (चलने फिरने का श्रम) तथा वायु सेवन होता रहता है । [३७- ३८] अथ दुग्धसेवनस्य समयविशेषेण गुणविशेषानाह वृष्यं बृंहणमग्निदीपनकरं पूर्वाह्नकाले पयो मध्याह्ने तु बलावहं कफहरं पित्तापहं दीपनम् । वाले वृद्धिकरं क्षयेऽक्षयकरं वृद्धेषु रेतोवहं रात्रौ पथ्यमनेकदोषशमनं चक्षुर्हितं संस्मृतम् ।।३९।। वदन्ति पेयं निशि केवलं पयो भोज्यं न तेनेह सहौदनादिकम् । भवत्यजीर्णं न शयीत शर्वरीं क्षीरस्य पीतस्य न शेषमुत्सृजेत् ।।४०।। विदाहीन्यन्नपानानि दिवा भुङ्क्ते हि यन्नरः । तद्विदाहप्रशान्त्यर्थं रात्रौ क्षीरं सदा पिबेत् ।।४१।। दीप्तानले कृशे पुंसि बाले वृद्धे पयःप्रिये । मतं हिततमं दुग्धं सद्यःशुक्रकरं यतः ।।४२।। समय विशेष में दूध पीने के विशेष गुण-दिन के पूर्व भाग (सुबह से १० बजे तक) में दुग्धपान (दूध पीना) वीर्यवर्धक, बृंहण (रस-रक्तादिवर्धक) तथा अग्नि को दीप्त करने वाला होता है। मध्याह्न काल में दुग्धपान-बलकारक, कफ तथा पित्त को दूर करने वाला एवम् अग्निदीपक होता है । बाल्यावस्था में दुग्धपान-शरीर की वृद्धि करने वाला होता है । क्षय अवस्था में-क्षय का निवारण करने वाला और वृद्धावस्था में दुग्धपान शुक्र की रक्षा करने वाला होता है । रात्रि में दुग्धपान-पथ्य (हितकर), अनेक दोषों को शमन करने वाला एवम् नेत्रों के लिये हितकर ऋषियों द्वारा कहा गया है । और कोई आचार्य यह कहते हैं कि-रात्रि में केवल दूध पीना चाहिये, उसके साथ भात आदि नहीं खाना चाहिये, क्योंकि इससे अजीर्ण होता है और रात्रि में नींद भी नहीं आती है और दूध पीने के बाद पात्र में कुछ शेष भाग न रख छोड़़े अर्थात् जितना पीना हो उतना ही दूध लेकर पीवे अथवा दूध यदि कुछ अधिक हो जाय तो भी पीने से हानि नहीं हो सकती अतः दूध कभी पीकर नहीं छोड़ देना चाहिये । मनुष्य दिन में जो कुछ विदाही (दाह पैदा करने वाले) अन्न-पान आदि का सेवन करता है उससे होने वाले दाह की शान्ति के लिये रात्रि में उसे प्रतिदिन दूध अवश्य पीना चाहिये । जिनकी अग्नि प्रदीप्त है या जो कृश हैं उन सभी के लिये एवम् बालक, वृद्ध तथा जिन्हें दूध प्रिय हो ऐसे लोगों के लिये दुग्ध पान अत्यन्त हितकर होता है क्योंकि यह (दुग्धपान) तत्काल (पीते ही पीते) शुक्र की वृद्धि करने वाला होता है । [३९-४२] अथ मथितदुग्धस्य गुणानाह क्षीरं गव्यमथाजं वा कोष्णं दण्डाहतं पिबेत् । लघु वृष्यं ज्वरहरं वातपित्तकफापहम् ।।४३।। मथे हुये दूध के गुण-गाय अथवा बकरी का दूध यदि औटाया हुआ मथानी से मथ कर किञ्चित् उष्ण रहते ही पीवे तो वह लघु, वीर्यवर्धक, एवम्-ज्वर, वात, पित्त तथा कफ को दूर करने वाला होता है । [४३] अथ दुग्धफेनम् (झाग) । तस्य गुणानाह गोदुग्धप्रभवं किं वा छागीदुग्धसमुद्भवम् । भवेत् फेनं त्रिदोषघ्नं रोचनं बलवर्द्धनम् ।।४४।। वह्निवृद्धिकरं वृष्यं सद्यस्तृप्तिकरं लघु । अतीसारेऽग्निमान्द्ये च ज्वरे जीर्णे प्रशस्तते ।।४५।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA