भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
पृष्ठ 962, कुल 1167 में से
संदर्भ में पढ़ेंदुग्धवर्गः ९११ यहाँ पर मूल में— "पीयूष" से लोकप्रसिद्ध "पेवस" का तथा "किलाटक" से लोकप्रसिद्ध "खरेटा-या-गिजिरी" का बोध करना चाहिये। [२९] अपक्वमेव यन्नष्टं क्षीरशाकं हि तत्पयः ।। ३०।। क्षीरशाक के लक्षण—जो दूध बिना औटाये ही (कच्चा ही) फट गया हो उसे क्षीरशाक कहते हैं। [३०] ❖ क्षीरशाकं 'तुषिभरा' वा 'खिरिसा' इति लोके ।। ३०।। यहाँ पर "क्षीरशाक" से लोकप्रसिद्ध "तुषिभरा—या-खिरिसा" का बोध करना चाहिये। [३०] दध्ना तक्रेण वा नष्टं दुग्धं बद्धं सुवाससा। द्रवभावेन सहितं तक्रपिण्डः स उच्यते ।। ३१ ।। नष्टदुग्धभवं नीरं मोरटं जेज्जटोऽब्रवीत्। पीयूषञ्च किलाटश्च क्षीरशाकं तथैव च ।। ३२।। तक्रपिण्ड इमे वृष्या बृंहणा बलवर्द्धनाः। गुरवः श्लेष्मला हृद्या वातपित्तविनाशनाः ।। ३३।। दीप्ताग्नीनां विनिद्राणां विद्रधौ चाभिपूजिताः। मुखशोषतृषादाहरक्तपित्तज्वरप्रणुत् ।। लघुर्बलकरो रुच्यो मोरटः स्यात्सितायुतः ।। ३४।। तक्रपिण्ड के लक्षण—जो दूध-दही अथवा तक्र (छाछ) के संयोग से फट गया हो अथवा फाड़ा गया हो उसे यदि वस्त्र में बाँध कर लटका दिया जाय तो द्रवपदार्थ हीन होने पर अर्थात् पानी का भाग निकल जाने पर उसे "तक्रपिण्ड" कहते हैं। मोरट के लक्षण—उक्त प्रकार से दूध के फट जाने के बाद वस्त्र में बाँधने पर जो जल टपक कर गिरता है उसे "मोरट" कहते हैं, ऐसा "जेज्जट" आचार्य का कथन है। पीयूष-किलाट-क्षीरशाक तथा तक्रपिण्ड ये सब—वीर्यवर्धक, बृंहण (रस-रक्तादिवर्धक) बल को बढ़ाने वाले, गुरु, कफकारक, हृदय को हितकर, वात तथा पित्तनाशक, दीप्त अग्निवाले तथा जिन्हें नींद नहीं आती है ऐसे लोगों के लिये एवं विद्रधि रोग वालों के लिये अत्युत्तम होते हैं। और मोरट यदि बूरा से युक्त हो तो—लघु, बलकारक, रुचिजनक एवम् मुखशोष, प्यास, दाह, रक्तपित्त तथा ज्वर को दूर करने वाला होता है। [३१-३४] अथ सन्तानिका (मलाई) गुणानाह सन्तानिका गुरुः शीता वृष्या पित्तास्रवातनुत्। तर्पणी बृंहणी स्निग्धा बलासबलशुक्रला ।। ३५ ।। मलाई—गुरु, शीतल, वीर्यवर्धक, तृप्तिकारक, बृंहण (रस-रक्तादि वर्धक), स्निग्ध, कफ, बल तथा शुक्र को उत्पन्न करने वाली एवम् पित्त-रक्तविकार तथा वात को दूर करने वाली होती है। [३५] अथ खण्डादियुक्तस्य दुग्धस्य गुणानाह खण्डेन सहितं दुग्धं कफकृत्पवनापहम्। सितासितोपलायुक्तं शुक्रलं त्रिमलापहम्। सगुडं मूत्रकृच्छ्रघ्नं पित्तश्लेष्मकरं परम् ।। ३६ ।। खांड पड़ा हुआ दूध—कफकारक तथा वातनाशक होता है। बूरा या मिश्री पड़ा हुआ दूध—शुक्रजनक तथा त्रिदोषनाशक होता है। गुड़ पड़ा हुआ दूध—मूत्र-कृच्छ्रनाशक एवम् पित्त तथा कफ को अधिक उत्पन्न करने वाला होता है। [३६] अथ प्रभातादिभवस्य दुग्धस्य गुणानाह रात्रौ चन्द्रगुणाधिक्याद्व्यायामाकरणात्तथा। प्राभातिकंपयः प्रायः प्रादोषाद् गुरु शीतलम् ।। ३७ ।। दिवाकरकराघाताद्व्यायामानिलसेवनात् । प्राभातिकात्तु प्रादोषं लघु वातकफापहम् ।। ३८ ।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA