भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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पृष्ठ 961

९१० भावप्रकाशनिघण्टुः अथ धारोष्णादिदुग्धस्य गुणानाह धारोष्णं गोपयो बल्यं लघु शीतं सुधासमम् । दीपनञ्च त्रिदोषघ्नं तद्धाराशिशिरं त्यजेत् ।। २४ ।। धारोष्णं शस्यते गव्यं धाराशीतन्तु माहिषम् । शृतोष्णमाविकं पथ्यं शृतशीतमजापयः ।। २५ ।। आमं क्षीरमभिष्यन्दि गुरु श्लेष्माभिवर्द्धनम् । ज्ञेयं सर्वमपथ्यं तु गव्यमाहिषवर्जितम् ।। २६ ।। नारीक्षीरं त्वाममेव हितं न तु शृतं हितम् । शृतोष्णं कफवातघ्नं शृतशीतन्तु पित्तनुत् ।। २७ ।। अर्द्धोदकं क्षीरशिष्टमामाल्लघुतरं पयः । जलेन रहितं दुग्धमतिपक्वं यथा यथा । तथा तथा गुरु स्निग्धं वृष्यं बलविवर्धनम् ।। २८ ।। गाय का धारोष्ण दूध—बलकारक, लघु, शीतल, अमृत के समान, अग्निदीपक तथा त्रिदोषनाशक होता है। किन्तु यदि वह (गाय का दूध) धाराशीतल अर्थात् दुहने के बाद देर तक रखने से शीतल हो गया हो तो उसे छोड़ देना चाहिये अर्थात् धारोष्ण का पूर्वोक्त गुण न होने से नहीं पीना चाहिये, यदि पीना हो तो गरम करके पीवे। धरोष्ण (दुहने के समय जो उष्णता रहती है उससे युक्त) दूध—गाय का उत्तम होता है। धाराशीत (दुहने के समय जो उष्णता रहती है उसके निकल जाने के बाद शीतल हुआ) दूध—भैंस का उत्तम होता है। उबाला हुआ गरम-गरम दूध—भेंड़ का पथ्य होता है। उबाल कर शीतल किया हुआ दूध—बकरी का पथ्य होता है। गाय तथा भैंस के दूध को छोड़ कर शेष सभी के कच्चे दूध को अभिष्यन्दी, गुरु, कफ तथा आम को बढ़ाने वाला तथा अपथ्य समझना चाहिये किन्तु स्त्री का दूध तो कच्चा ही हितकर होता है। यदि वही औंटाया हुआ हो तो हितकर नहीं होता है। साधारण रूप से औंटाया हुआ गरम दूध—कफ तथा वातनाशक होता है और औंटाकर शीतल किया हुआ— पित्तनाशक होता है। दूध में यदि आधा भाग जल मिलाकर औंटाया जाय और जब पानी जल कर केवल दूध का भाग शेष रह जाय तब उतार ले—यह दूध कच्चे की अपेक्षा अधिक लघु होता है। बिना जल छोड़े दूध को जितना ही अधिक औंटाया जायगा उतना ही अधिक उत्तरोत्तर गुरु, स्निग्ध, वीर्य तथा बल को बढ़ाने वाला होता जायगा। [२४-२८] अथ पीयूष-किलाट-क्षीरशाक-तक्रपिण्ड-मोरटानां- लक्षणानि गुणांश्चाह क्षीरं तत्कालसूताया घनं पीयूषमुच्यते । नष्टदुग्धस्य पक्वस्य पिण्डः प्रोक्तः किलाटकः ।। २९ ।। पीयूष, किलाट, क्षीरशाक, तक्रपिण्ड तथा मोरट के लक्षण और गुण—पीयूष के लक्षण—तत्काल की ब्याई हुई गाय, भैंस आदि के गाढ़े दूध को "पीयूष" कहते हैं। किलाटक के लक्षण—बिगड़े हुये दूध को यदि औंटाते-औंटाते गाढ़ा करके पिण्डाकार बना लिया जाय तो उसे किलाटक कहते हैं। [२९] पीयूषं "पेवस" इति लोके । किलाटकः "खरेटा" "गिजिरी" वा इति लोके ।। २९ ।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA