भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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दुग्धवर्गः ९०९ बकरी का दूध-कषाय तथा मधुर रसयुक्त, शीतल, ग्राही, लघु, एवम्-रक्तपित्त, अतिसार, क्षय, खाँसी तथा ज्वर को दूर करने वाला होता है। बकरियाँ शरीर से छोटी होती हैं और कटु तथा तिक्तरसयुक्त पत्ते आदि खाती हैं, थोड़ा जल पीती हैं एवम् व्यायाम (चलना, फिरना) अधिक करती हैं अतः उनका दूध सर्वरोगनाशक होता है। [१६-१७] अथ मृग्यादिदुग्धस्य गुणानाह मृगीणां जाङ्गलोत्थानामजाक्षीरगुणं पयः ।।१८।। जांगल देश की हरिणियों का दूध-बकरी के दूध के समान गुणों से युक्त होता है। [१८] तत्राविकदुग्धस्य गुणानाह आविकं लवणं स्वादु स्निग्धोष्णं चाश्मरीप्रणुत्। अहृद्यं तर्पणं केश्यं¹ शुक्रपित्तकफप्रदम् ।। गुरु कासानिलोद्भूते केवले चानिले वरम् ।।१९।। भेंडी का दूध-लवण तथा मधुर रसयुक्त, स्निग्ध, उष्ण, अश्मरीनाशक, हृदय के लिये अहितकर, तृप्तिकारक, केशों के लिये हितकर, शुक्र-पित्त तथा कफ को उत्पन्न करनेवाला तथा गुरु होता है। एवम् वात से उत्पन्न होनेवाली खाँसी तथा केवल वातरोग में हितकर होता है। [१९] अथ घोटकीदुग्धस्य गुणानाह रूक्षोष्णं वडवाक्षीरं बल्यं शोषानिलापहम्। अम्लं पटु लघु स्वादु सर्वमेकशफं तथा ।।२०।। घोड़ी का दूध-रूक्ष, उष्ण, बलकारक, शोष तथा वायु को नष्ट करने वाला, अम्ल तथा लवण रसयुक्त, लघु और स्वादिष्ट होता है। एवम् घोड़े की भाँति जितने एक शफ अर्थात् अखण्डित खुर वाले हैं उनके भी दूध पूर्वोक्त गुणवाले होते हैं। [२०] अथौष्ट्रदुग्धस्य गुणानाह औष्ट्रं दुग्धं लघु स्वादु लवणं दीपनं तथा। कृमिकुष्ठकफानाहशोथोदरहरं सरम् ।।२१।। ऊँटिनी का दूध-लघु, मधुर तथा लवण रसयुक्त, अग्निदीपक, सारक एवम्-कृमि, कुष्ठ, कफ, अफरा, शोथ तथा उदर विकार को दूर करने वाला होता है। [२१] अथ हस्तिनीदुग्धस्य बृंहणं हस्तिनीदुग्धं मधुरं तुवरं गुरु। वृष्यं बल्यं हिमं स्निग्धं चक्षुष्यं स्थिरताकरम् ।।२२।। हथिनि का दूध-मधुर तथा कषाय रसयुक्त, बृंहण (रस-रक्तादिवर्धक), गुरु, वीर्यवर्धक, बलकारक, शीतल, स्निग्ध, नेत्रों के लिये हितकर तथा शरीर को दृढ़ करने वाला होता है। [२१] अथ नारीदुग्धस्य गुणानाह नार्या लघु पयः शीतं दीपनं वातपित्तजित्। चक्षुःशूलाभिघातघ्नं नस्याश्च्योतनयोर्वरम् ।।२३।। स्त्री का दूध-लघु, शीतल, अग्निदीपक एवम् वात, पित्त, नेत्रों का शूल तथा अभिघात को दूर करने वाला होता है एवम् नस्य तथा आश्च्योतन कर्म के लिये उत्तम होता है। [२३] १. वृष्य इति पाठा० ।