भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंवारिवर्गः १०३ अन्यच्च शरदि स्वच्छमुदयादगस्त्याखिलं हितम् ।।६४।। इसके अतिरिक्त अन्य वचन—शरद ऋतु में अगस्त्य तारा के उदय होने से सभी प्रकार के जल स्वच्छ हो जाते हैं अतः वे भी सभी हितकारी होते हैं । [६४] वृद्धसुश्रुतस्तु पौषे वारि सरोजातं माघे तत्तु तडागजम् । फाल्गुने कूपसम्भूतं चैत्रे चौज्यं हितम् मतम् ।।६५।। वैशाखे नैर्झरं नीरं ज्येष्ठे शस्तं तथौद्भिदम् । आषाढे शस्यते कौपं श्रावणे दिव्यमेव च ।।६६।। भाद्रे कौपं पयः शस्तमाश्विने चौज्यमेव च । कार्तिके मार्गशीर्षे च जलमात्रं प्रशस्यते ।।६७।। वृद्ध सुश्रुत के तो इस विषय में ये वचन हैं कि—पूस मास में—सरोवर का जल, माघ मास में—तालाब का जल, फागुन मास में—कूंएँ का जल, चैत मास में—चौज्य (चौड़े का) जल, वैशाख मास में—झरने का जल, जेठ मास में औद्भिद जल, आषाढ़ मास में—कूंयें का जल, श्रावण मास में—आकाश (वर्षा) का जल, भादो मास में— कूंयें का जल, क्वार मास में—चौज्य (चौड़े का) जल, कार्त्तिक तथा अगहन मास में—सम्पूर्ण जल प्रशस्त होता है । [६५-६७] अथ जलग्रहणस्य समयमाह भौमानामम्भसां प्रायो ग्रहणं प्रातरिष्यते । शीतत्वं निर्मलत्वञ्च यतस्तेषां मतो गुणः ।।६८।। जल ग्रहण करने का समय—सभी प्रकार के भौम (भूमि सम्बन्धी) जलों के ग्रहण करने का समय प्रायः करके प्रातःकाल उत्तम होता है क्योंकि उस समय वे निर्मल तथा शीतल रहते हैं । अतएव और समयों की अपेक्षा अधिक गुणकारी होते हैं । [६८] अथ जलस्य पानविधिमाह अत्यम्बुपानान्न विपच्यतेऽन्नं निरम्बुपानाच्च स एव दोषः । तस्मान्नरो वह्निविवर्द्धनाय मुहुर्मुहुर्वारि पिबेदभूरि ।।६९।। जल पीने की विधि—भोजन के समय अधिक जल पीने से अन्न नहीं पचता है और एकदम कुछ भी जल न पीने से भी उक्त दोष होता है अर्थात् अन्न नहीं पचता है । अतएव मनुष्य को चाहिये कि उक्त समय में अग्नि बढ़ाने के लिए थोड़ा-थोड़ा करके बारम्बार जल पीवे । [६९] अथ शीतलजलपानस्य विषयानाह मूर्च्छापित्तोष्णदाहेषु विषे रक्ते मदात्यये । श्रमे भ्रमे विदग्धेऽन्ने तमके वमथौ तथा । ऊर्ध्वगे रक्तपित्ते च शीतमम्भः प्रशस्यते ।।७०।। शीतल जलपान के विषय (योग्य लोग)—मूर्च्छा, पित्त सम्बन्धी रोग, गरमी, दाह, विष, रक्तविकार, मदात्यय, श्रम, भ्रमरोग, तमक श्वास, वमन, ऊर्ध्वगामी रक्तपित्त इन सब रोगवालों के लिये तथा जिनका अन्न न पचा हुआ हो ऐसे लोगों के लिये शीतल जल पीना हितकर होता है । [७०] अथ शीतलजलपानस्य निषेधविषयानाह पार्श्वशूले प्रतिश्याये वातरोगे गलग्रहे । आध्माने स्तिमिते कोष्ठे सद्यःशुद्धौ नवज्वरे ।।७१।। अरुचिग्रहणीगुल्मश्वासकासेषु विद्रधौ । हिक्कायां स्नेहपाने च शीताम्बु परिवर्जयेत् ।।७२।।