भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें९०४ भावप्रकाशनिघण्टुः शीतल जलपान के निषेध के विषय—अर्थात् शीतल जल पीना जिन रोगों में निषिद्ध है उनका निर्देश— पार्श्वशूल (पसली का दर्द), जुकाम, वातरोग, गलग्रह, अफारा, बद्धकोष्ठ तथा वमन विरेचनादि द्वारा शोधन कर्म करने के तत्काल बाद में एवम् नवीन ज्वर, अरुचि, ग्रहणी, गुल्म, श्वास, खाँसी, विद्रधि, हिचकी तथा स्नेहपान (तैल आदि पीने पर) इन सबों में शीतल जल पीना त्याग कर देना चाहिये। [७१-७२] अथाल्पजलपानस्य विषयानाह अरोचके प्रतिश्याये मन्देऽग्नौ श्वयथौ क्षये । मुखप्रसेके जठरे कुष्ठे नेत्राामये ज्वरे । व्रणे च मधुमेहे च पिबेत्पानीयमल्पकम् ।।७३।। थोड़े जलपान के विषय अर्थात् जिनमें थोड़ा जल पीना उचित है उन रोगों का निर्देश—अरुचि, जुकाम, मन्दाग्नि, शोथ, क्षय, मुखप्रसेक (मुख में जल भर आना), उदररोग, कुष्ठ, नेत्रविकार, ज्वर, व्रण और मधुमेह इन रोगों में रोगी को थोड़ा जल पीना उचित है। [७३] अथ जलपानस्यावश्यकतामाह जीवनं जीविनां जीवो जगत् सर्वन्तु तन्मयम् । नातोऽत्यन्तनिषेधेन कदाचिद्वारि वार्यते ।।७४।। जलपान की आवश्यकता—जीवन (जल) प्राणियों का जीवन स्वरूप है और सम्पूर्ण जगत् जलमय है। अतः जल का अत्यन्त निषेध के साथ कभी नहीं निवारण करे अर्थात् एकदम से जल पीने का निषेध कभी नहीं करना चाहिये किन्तु अति स्वल्पमात्रा में देना ही चाहिये। [७४] हारीतश्च तृष्णा गरीयसी घोरा सद्यःप्राणविनाशिनी । तस्माद् देयं तृषाऽर्त्ताय पानीयं प्राणधारणम् ।।७५।। तृषितो मोहमायाति मोहात्प्राणान्विमुञ्चति । अतः सर्वास्ववस्थासु न क्वचिद्वारि वारयेत् ।।७६।। इस विषय में "हारीत" भी कहते हैं कि—अत्यन्त प्यास बड़ी भयंकर होती है क्योंकि उससे सद्यः प्राण निकल जाता है, इसलिये जो अत्यन्त प्यास से पीड़ित हो उसे प्राण धारण करने का प्रधान साधन जल अवश्य पीने के लिये देना चाहिये। और जो प्यासा होता है उसे अन्त में मूर्च्छा हो जाती है और मूर्च्छा होने से अन्त में वह प्राणों को छोड़ देता है, अतः सभी अवस्थाओं में कभी भी जल पीने का निषेध नहीं करना चाहिये। [७५-७६] अथ गुणवतस्तोयस्य लक्षणान्याह अगन्धमव्यक्तरसं सुशीतं सर्पनाशनम् । स्वच्छं लघु च हृद्यञ्च तोयं गुणवदुच्यते ।।७७।। गुणकारी जल के लक्षण—जो जल गन्धरहित हो तथा जिसका रस पूर्ण रूप से न मालूम पड़ता हो एवं जो अति शीतल, पीने से शीघ्र प्यास को शान्त करने वाला, स्वच्छ, लघु तथा हृदय के लिये हितकर या हृदय को प्रिय हो तो उसे प्रशस्त गुणवाला अर्थात् उत्तम जल समझना चाहिये। [७७] अथावगुणकारिजलस्य लक्षणानि दुर्गुणाँश्चाह पिच्छिलं कृमिलं क्लिन्नं पर्णशैवालकर्दमैः । विवर्णं विरसं सान्द्रं दुर्गन्धं न हितं जलम् ।।७८।। कलुषं छन्नमम्भोजपर्णनीलीतृणादिभिः । दुःस्पर्शनमसंस्पृष्टं सौरचान्द्रमरीचिभिः ।।७९।। अनार्त्तवं वार्षिकं तु प्रथमं तच्च भूमिगम् । व्यापन्नं परिहर्त्तव्यं सर्वदोषप्रकोपणम् ।।८०।। तत् कुर्यात्स्नानपानाभ्यां तृष्णाऽऽध्मानचिरज्वरान्। कासाग्निमान्द्याभिष्यन्दकण्डूगण्डादिकं तथा ।।८१।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmụ. Digitized by S3 Foundation USA