भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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पृष्ठ 956

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वारिवर्गः ९०५ अवगुण करने वाले जल के लक्षण-जो जल-पिच्छिल, कृमियुक्त और पत्ते, सेवार तथा कीचड़ से खराब हो गया हो, एवम् विकृत वर्ण का, विरस, गाढ़ा तथा दुर्गन्ध युक्त हो गया हो वह हितकारी नहीं होता है। और जो जल- गंदला तथा कमल के पत्ते, सेवार तथा तृण आदि से ढका हुआ एवं जिसके स्पर्श से खुजली होने लगे और जिस पर सूर्य तथा चन्द्रमा की किरणें कभी न पड़ती हों, और जो अनार्त्तव (पूस, माघ, फागुन, चैत इन चार मांसों में वर्षा का) और प्रथम वर्षा का भूमि पर स्थित जल हो तथा दूषित हो तो ऐसा जल पीने के लिये सर्वथा त्याग करने योग्य होता है क्योंकि वह सब दोषों को प्रकुपित करने वाला होता है। और उक्त जल को जो कोई पीने तथा नहाने के कार्य में लेता है तो उसे तृषा, अफारा, जीर्णज्वर, खाँसी, अग्नि की मन्दता, अभिष्यन्द, खुजली तथा गलगण्ड आदि रोग उत्पन्न हो जाते हैं। [७८-८१] अथ दूषितजलस्य निर्दोषीकरणोपायमाह निन्दितं चापि पानीयं क्वथितं सूर्यतापितम्। सुवर्णं रजतं लौहं पाषाणं सिकतामपि ।।८२।। भृशं सन्ताप्य निर्वाप्य सप्तधा साधितं तथा। कर्पूरजातिपुन्नागपाटलादिसुवासितम् ।।८३।। शुचिसान्द्रपटस्रावि क्षुद्रजन्तुविवर्जितम्। स्वच्छं कनकममुक्ताऽऽद्यैः शुद्धं स्याद्दोषवर्जितम् ।।८४।। पर्णमूलविसग्रन्थिमुक्ताकनकशैवलैः । गोमेदेन च वस्त्रेण कुर्यादम्बुप्रसादनम् ।।८५।। दूषित जल को निर्दोष (शुद्ध) करने का उपाय-जो जल उक्त प्रकार से निन्दित हो उसे काढ़े की भाँति पकावे, या सूर्य की किरणों से गरम कर दे अर्थात् धूप में रख दे, वा सोना, चाँदी, लोहा, पत्थर, बालू को खूब गरम कर-कर के सात बार उक्त जल में बुझा दे, तदुपरांत कपूर, चमेली का पुष्प, सुलतानचम्पा का पुष्प, पाढ़ल पुष्प आदि से सुवासित कर दे और स्वच्छ तथा गाढ़े वस्त्र से छान दे जिससे छोटे-छोटे कृमि दूर हो जायें, इस प्रकार से स्वंच्छ किया हुआ अथवा सोना या मोती आदि के द्वारा शुद्ध किया हुआ जल स्वच्छ तथा दोष रहित हो जाता है। पत्ते, मूल, बिसग्रन्थि (कमल का मूल), मोती, सोना, सेवार, गोमेदमणि तथा वस्त्र इन सबों से जल को स्वच्छ करना चाहिये। [८२-८५] अथ पीतजलस्य परिपाककालानाह पीतं जलं जीर्य्यति यामयुग्माद्यामैकमात्राम्च्छृतशीतलञ्च । तदर्धमात्रेण शृतं कदुष्णं पयःप्रपाके त्रय एव कालाः ।।८६।। पीये हुये जल के पचने में समय का परिमाण-पीया हुआ साधारण जल दो प्रहर (६ घण्टे) में पच जाता है। औटा कर ठंडा किया हुआ जल पीने से वह १ प्रहर (३ घण्टा) में पचता है। और औटा कर किंचित् गरम जल पीने से आधे प्रहर (१।। घण्टे) में पच जाता है। इस भाँति से जल के पचने में ३ प्रकार के समय के परिमाण हैं। [८६] इति श्रीमिश्रलटकनतनय श्रीमिश्रभावविरचिते भावप्रकाशे वर्गप्रकरणे वारिवर्गः समाप्तः। ❧§❧