भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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अथ दुग्धवर्गः अथ दुग्धस्य नामानि गुणाँश्चाह दुग्धं क्षीरं पयः स्तन्यं बालजीवनमित्यपि । दुग्धं सुमधुरं स्निग्धं वातपित्तहरं सरम् ॥१॥ सद्यःशुक्रकरं शीतं सात्म्यं सर्वशरीरिणाम्। जीवनं बृंहणं बल्यं मेध्यं वाजीकरं परम् ।। वयःस्थापनमायुष्यं सन्धिकारि रसायनम् ।।२।। दूध के संस्कृत नाम-दुग्ध, क्षीर, पयः (पयस्), स्तन्य तथा बालजीवन ये सब हैं। दूध-मधुररसयुक्त, स्निग्ध, वात तथा पित्त को दूर करने वाला, सारक, तत्काल शुक्र को उत्पन्न करने वाला, शीतल, सम्पूर्ण प्राणियों के लिये सात्म्य (अनुकूल), जीवनी शक्ति को देने वाला, बृंहण (रस-रक्तादि वर्धक), बलकारक, मेधा शक्ति के लिये हितकर, अत्यन्त वाजीकरण, अवस्था को स्थिर रखने वाला, आयु को बढ़ाने वाला, सन्धानकारक तथा रसायन है। [१-२] अथ दुग्धपानार्हजनानाह विरेकवान्तिवस्तीनां सेव्यमोजोविवर्द्धनम् ।।३।। जीर्णज्वरे मनोरोगे शोषमूर्च्छाभ्रमेषु च। ग्रहण्यां पाण्डुरोगे च दाहे तृषि हृदामये ।।४।। शूलोदावर्त्तगुल्मेषु वस्तिरोगे गुदाङ्कुरे। रक्तपित्तेऽतिसारे च योनिरोगे श्रमे क्लमे ।।५।। गर्भस्रावे च सततं हितं मुनिवरैः स्मृतम् । बालवृद्धक्षतक्षीणाः क्षुद्व्यवायकृशाश्च ये ।। तेभ्यः सदाऽतिशयितं हितमेतदुदाहृतम् ।।६।। दूध पीने के योग्य लोग-जिन्होंने विरेचन, वमन तथा वस्ति का प्रयोग किया है, ऐसे लोगों के लिये दूध सेवन करने के योग्य और ओजोवर्धक है। तथा जीर्णज्वर, मानसिकरोग, शोष, मूर्च्छा, भ्रम, ग्रहणी, पाण्डुरोग, दाह, तृषा, हृद्रोग, शूल, उदावर्त्त, गुल्म, वस्तिरोग, अर्श, रक्तपित्त, अतिसार, योनिरोग, श्रम, क्लान्ति, गर्भस्राव, इन सब रोगों में दूध पीना सर्वदा हितकर होता है, ऐसा मुनियों का मत है और जो बालक, वृद्ध तथा क्षतक्षीण हैं या भूख और मैथुन से कृश हो गये हैं ऐसे लोगों के लिये यह (दूध) सदा अत्यन्त हितकर कहा हुआ है। [३-६] अथ गोदुग्धस्य गुणानाह गव्यं दुग्धं विशेषेण मधुरं रसपाकयोः। दोषधातुमलस्रोतः किञ्चित्क्लेदकरं गुरु ।।७।। शीतलं स्तन्यकृत्स्निग्धं वातपित्तास्रनाशनम्। जरासमस्तरोगणां शान्तिकृत् सेविनां सदा ।।८।। गाय के दूध के गुण-गाय का दूध विशेष कर स्वाद तथा विपाक में मधुर रसयुक्त, शीतल, दुग्धवर्धक, स्निग्ध, वात-पित्त तथा रक्तविकार को नष्ट करने वाला, दोष-धातुमल तथा नाड़ियों में किञ्चित् क्लेद (आर्द्रता) उत्पन्न करने वाला, गुरु एवम् निरन्तर सेवन करने वालों की वृद्धावस्था तथा समस्तरोगों को शमन करने वाला होता है। [७-८] अथ कृष्णाऽऽदीनां गवां दुग्धस्य गुणानाह कृष्णाया गोर्भवेद् दुग्धं वातहारि गुणाधिकम् ।।९।। पीताया हरते पित्तं तथा वातहरं भवेत्। श्लेष्मलं गुरु शुक्लाया रक्ता चित्रा च वातहृत् ।।१०।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA