भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
९०४ भावप्रकाशनिघण्टुः शीतल जलपान के निषेध के विषय—अर्थात् शीतल जल पीना जिन रोगों में निषिद्ध है उनका निर्देश— पार्श्वशूल (पसली का दर्द), जुकाम, वातरोग, गलग्रह, अफारा, बद्धकोष्ठ तथा वमन विरेचनादि द्वारा शोधन कर्म करने के तत्काल बाद में एवम् नवीन ज्वर, अरुचि, ग्रहणी, गुल्म, श्वास, खाँसी, विद्रधि, हिचकी तथा स्नेहपान (तैल आदि पीने पर) इन सबों में शीतल जल पीना त्याग कर देना चाहिये। [७१-७२] अथाल्पजलपानस्य विषयानाह अरोचके प्रतिश्याये मन्देऽग्नौ श्वयथौ क्षये । मुखप्रसेके जठरे कुष्ठे नेत्राामये ज्वरे । व्रणे च मधुमेहे च पिबेत्पानीयमल्पकम् ।।७३।। थोड़े जलपान के विषय अर्थात् जिनमें थोड़ा जल पीना उचित है उन रोगों का निर्देश—अरुचि, जुकाम, मन्दाग्नि, शोथ, क्षय, मुखप्रसेक (मुख में जल भर आना), उदररोग, कुष्ठ, नेत्रविकार, ज्वर, व्रण और मधुमेह इन रोगों में रोगी को थोड़ा जल पीना उचित है। [७३] अथ जलपानस्यावश्यकतामाह जीवनं जीविनां जीवो जगत् सर्वन्तु तन्मयम् । नातोऽत्यन्तनिषेधेन कदाचिद्वारि वार्यते ।।७४।। जलपान की आवश्यकता—जीवन (जल) प्राणियों का जीवन स्वरूप है और सम्पूर्ण जगत् जलमय है। अतः जल का अत्यन्त निषेध के साथ कभी नहीं निवारण करे अर्थात् एकदम से जल पीने का निषेध कभी नहीं करना चाहिये किन्तु अति स्वल्पमात्रा में देना ही चाहिये। [७४] हारीतश्च तृष्णा गरीयसी घोरा सद्यःप्राणविनाशिनी । तस्माद् देयं तृषाऽर्त्ताय पानीयं प्राणधारणम् ।।७५।। तृषितो मोहमायाति मोहात्प्राणान्विमुञ्चति । अतः सर्वास्ववस्थासु न क्वचिद्वारि वारयेत् ।।७६।। इस विषय में "हारीत" भी कहते हैं कि—अत्यन्त प्यास बड़ी भयंकर होती है क्योंकि उससे सद्यः प्राण निकल जाता है, इसलिये जो अत्यन्त प्यास से पीड़ित हो उसे प्राण धारण करने का प्रधान साधन जल अवश्य पीने के लिये देना चाहिये। और जो प्यासा होता है उसे अन्त में मूर्च्छा हो जाती है और मूर्च्छा होने से अन्त में वह प्राणों को छोड़ देता है, अतः सभी अवस्थाओं में कभी भी जल पीने का निषेध नहीं करना चाहिये। [७५-७६] अथ गुणवतस्तोयस्य लक्षणान्याह अगन्धमव्यक्तरसं सुशीतं सर्पनाशनम् । स्वच्छं लघु च हृद्यञ्च तोयं गुणवदुच्यते ।।७७।। गुणकारी जल के लक्षण—जो जल गन्धरहित हो तथा जिसका रस पूर्ण रूप से न मालूम पड़ता हो एवं जो अति शीतल, पीने से शीघ्र प्यास को शान्त करने वाला, स्वच्छ, लघु तथा हृदय के लिये हितकर या हृदय को प्रिय हो तो उसे प्रशस्त गुणवाला अर्थात् उत्तम जल समझना चाहिये। [७७] अथावगुणकारिजलस्य लक्षणानि दुर्गुणाँश्चाह पिच्छिलं कृमिलं क्लिन्नं पर्णशैवालकर्दमैः । विवर्णं विरसं सान्द्रं दुर्गन्धं न हितं जलम् ।।७८।। कलुषं छन्नमम्भोजपर्णनीलीतृणादिभिः । दुःस्पर्शनमसंस्पृष्टं सौरचान्द्रमरीचिभिः ।।७९।। अनार्त्तवं वार्षिकं तु प्रथमं तच्च भूमिगम् । व्यापन्नं परिहर्त्तव्यं सर्वदोषप्रकोपणम् ।।८०।। तत् कुर्यात्स्नानपानाभ्यां तृष्णाऽऽध्मानचिरज्वरान्। कासाग्निमान्द्याभिष्यन्दकण्डूगण्डादिकं तथा ।।८१।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmụ. Digitized by S3 Foundation USA
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वारिवर्गः ९०५ अवगुण करने वाले जल के लक्षण-जो जल-पिच्छिल, कृमियुक्त और पत्ते, सेवार तथा कीचड़ से खराब हो गया हो, एवम् विकृत वर्ण का, विरस, गाढ़ा तथा दुर्गन्ध युक्त हो गया हो वह हितकारी नहीं होता है। और जो जल- गंदला तथा कमल के पत्ते, सेवार तथा तृण आदि से ढका हुआ एवं जिसके स्पर्श से खुजली होने लगे और जिस पर सूर्य तथा चन्द्रमा की किरणें कभी न पड़ती हों, और जो अनार्त्तव (पूस, माघ, फागुन, चैत इन चार मांसों में वर्षा का) और प्रथम वर्षा का भूमि पर स्थित जल हो तथा दूषित हो तो ऐसा जल पीने के लिये सर्वथा त्याग करने योग्य होता है क्योंकि वह सब दोषों को प्रकुपित करने वाला होता है। और उक्त जल को जो कोई पीने तथा नहाने के कार्य में लेता है तो उसे तृषा, अफारा, जीर्णज्वर, खाँसी, अग्नि की मन्दता, अभिष्यन्द, खुजली तथा गलगण्ड आदि रोग उत्पन्न हो जाते हैं। [७८-८१] अथ दूषितजलस्य निर्दोषीकरणोपायमाह निन्दितं चापि पानीयं क्वथितं सूर्यतापितम्। सुवर्णं रजतं लौहं पाषाणं सिकतामपि ।।८२।। भृशं सन्ताप्य निर्वाप्य सप्तधा साधितं तथा। कर्पूरजातिपुन्नागपाटलादिसुवासितम् ।।८३।। शुचिसान्द्रपटस्रावि क्षुद्रजन्तुविवर्जितम्। स्वच्छं कनकममुक्ताऽऽद्यैः शुद्धं स्याद्दोषवर्जितम् ।।८४।। पर्णमूलविसग्रन्थिमुक्ताकनकशैवलैः । गोमेदेन च वस्त्रेण कुर्यादम्बुप्रसादनम् ।।८५।। दूषित जल को निर्दोष (शुद्ध) करने का उपाय-जो जल उक्त प्रकार से निन्दित हो उसे काढ़े की भाँति पकावे, या सूर्य की किरणों से गरम कर दे अर्थात् धूप में रख दे, वा सोना, चाँदी, लोहा, पत्थर, बालू को खूब गरम कर-कर के सात बार उक्त जल में बुझा दे, तदुपरांत कपूर, चमेली का पुष्प, सुलतानचम्पा का पुष्प, पाढ़ल पुष्प आदि से सुवासित कर दे और स्वच्छ तथा गाढ़े वस्त्र से छान दे जिससे छोटे-छोटे कृमि दूर हो जायें, इस प्रकार से स्वंच्छ किया हुआ अथवा सोना या मोती आदि के द्वारा शुद्ध किया हुआ जल स्वच्छ तथा दोष रहित हो जाता है। पत्ते, मूल, बिसग्रन्थि (कमल का मूल), मोती, सोना, सेवार, गोमेदमणि तथा वस्त्र इन सबों से जल को स्वच्छ करना चाहिये। [८२-८५] अथ पीतजलस्य परिपाककालानाह पीतं जलं जीर्य्यति यामयुग्माद्यामैकमात्राम्च्छृतशीतलञ्च । तदर्धमात्रेण शृतं कदुष्णं पयःप्रपाके त्रय एव कालाः ।।८६।। पीये हुये जल के पचने में समय का परिमाण-पीया हुआ साधारण जल दो प्रहर (६ घण्टे) में पच जाता है। औटा कर ठंडा किया हुआ जल पीने से वह १ प्रहर (३ घण्टा) में पचता है। और औटा कर किंचित् गरम जल पीने से आधे प्रहर (१।। घण्टे) में पच जाता है। इस भाँति से जल के पचने में ३ प्रकार के समय के परिमाण हैं। [८६] इति श्रीमिश्रलटकनतनय श्रीमिश्रभावविरचिते भावप्रकाशे वर्गप्रकरणे वारिवर्गः समाप्तः। ❧§❧
अथ दुग्धवर्गः अथ दुग्धस्य नामानि गुणाँश्चाह दुग्धं क्षीरं पयः स्तन्यं बालजीवनमित्यपि । दुग्धं सुमधुरं स्निग्धं वातपित्तहरं सरम् ॥१॥ सद्यःशुक्रकरं शीतं सात्म्यं सर्वशरीरिणाम्। जीवनं बृंहणं बल्यं मेध्यं वाजीकरं परम् ।। वयःस्थापनमायुष्यं सन्धिकारि रसायनम् ।।२।। दूध के संस्कृत नाम-दुग्ध, क्षीर, पयः (पयस्), स्तन्य तथा बालजीवन ये सब हैं। दूध-मधुररसयुक्त, स्निग्ध, वात तथा पित्त को दूर करने वाला, सारक, तत्काल शुक्र को उत्पन्न करने वाला, शीतल, सम्पूर्ण प्राणियों के लिये सात्म्य (अनुकूल), जीवनी शक्ति को देने वाला, बृंहण (रस-रक्तादि वर्धक), बलकारक, मेधा शक्ति के लिये हितकर, अत्यन्त वाजीकरण, अवस्था को स्थिर रखने वाला, आयु को बढ़ाने वाला, सन्धानकारक तथा रसायन है। [१-२] अथ दुग्धपानार्हजनानाह विरेकवान्तिवस्तीनां सेव्यमोजोविवर्द्धनम् ।।३।। जीर्णज्वरे मनोरोगे शोषमूर्च्छाभ्रमेषु च। ग्रहण्यां पाण्डुरोगे च दाहे तृषि हृदामये ।।४।। शूलोदावर्त्तगुल्मेषु वस्तिरोगे गुदाङ्कुरे। रक्तपित्तेऽतिसारे च योनिरोगे श्रमे क्लमे ।।५।। गर्भस्रावे च सततं हितं मुनिवरैः स्मृतम् । बालवृद्धक्षतक्षीणाः क्षुद्व्यवायकृशाश्च ये ।। तेभ्यः सदाऽतिशयितं हितमेतदुदाहृतम् ।।६।। दूध पीने के योग्य लोग-जिन्होंने विरेचन, वमन तथा वस्ति का प्रयोग किया है, ऐसे लोगों के लिये दूध सेवन करने के योग्य और ओजोवर्धक है। तथा जीर्णज्वर, मानसिकरोग, शोष, मूर्च्छा, भ्रम, ग्रहणी, पाण्डुरोग, दाह, तृषा, हृद्रोग, शूल, उदावर्त्त, गुल्म, वस्तिरोग, अर्श, रक्तपित्त, अतिसार, योनिरोग, श्रम, क्लान्ति, गर्भस्राव, इन सब रोगों में दूध पीना सर्वदा हितकर होता है, ऐसा मुनियों का मत है और जो बालक, वृद्ध तथा क्षतक्षीण हैं या भूख और मैथुन से कृश हो गये हैं ऐसे लोगों के लिये यह (दूध) सदा अत्यन्त हितकर कहा हुआ है। [३-६] अथ गोदुग्धस्य गुणानाह गव्यं दुग्धं विशेषेण मधुरं रसपाकयोः। दोषधातुमलस्रोतः किञ्चित्क्लेदकरं गुरु ।।७।। शीतलं स्तन्यकृत्स्निग्धं वातपित्तास्रनाशनम्। जरासमस्तरोगणां शान्तिकृत् सेविनां सदा ।।८।। गाय के दूध के गुण-गाय का दूध विशेष कर स्वाद तथा विपाक में मधुर रसयुक्त, शीतल, दुग्धवर्धक, स्निग्ध, वात-पित्त तथा रक्तविकार को नष्ट करने वाला, दोष-धातुमल तथा नाड़ियों में किञ्चित् क्लेद (आर्द्रता) उत्पन्न करने वाला, गुरु एवम् निरन्तर सेवन करने वालों की वृद्धावस्था तथा समस्तरोगों को शमन करने वाला होता है। [७-८] अथ कृष्णाऽऽदीनां गवां दुग्धस्य गुणानाह कृष्णाया गोर्भवेद् दुग्धं वातहारि गुणाधिकम् ।।९।। पीताया हरते पित्तं तथा वातहरं भवेत्। श्लेष्मलं गुरु शुक्लाया रक्ता चित्रा च वातहृत् ।।१०।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
"? No. Why would it be "जाङ्गलानूपशैलेषु"? In Sanskrit, the text is: "जाङ्गलानूपशैलेषु चरन्तीनां यथोत्तरम् । पयो गुरुतरं ज्ञेयं स्नेहो वाऽऽहारतो भवेत् ॥" (or स्नेहो यथाऽऽहारं प्रवर्त्तते). The word is unambiguously "जाङ्गलानूपशैलेषु" (जाङ्गल + आनूप + शैलेषु). Wait, look at the image: does the typesetter have an extra 'ा' or is it just "जाङ्गलानूपशैलेषु"? Wait, look at the Hindi translation in line 14: "देश विशेष से गाय का दूध-जांगल देश, आनूप देश तथा पर्वतों पर..." Notice the Hindi says "जांगल देश, आनूप देश"! In line 13, look at "जाङ्गला...": Wait, look at the first 'ा' after 'ल': Wait, is the first bump 'ल'? Wait! Look at the letter before 'नू': It's 'ला'! Wait, what is before 'ला'? 'ङ्ग'! Wait, between 'ङ्ग' and 'ला', is there an 'ा'? No! Ah! I see what happened: 'ङ्ग' has no vertical line. Then comes 'ल'. 'ल' has two arches, then a vertical stem. Then the 'ा' danda. Wait, look at
९०८ भावप्रकाशनिघण्टुः विभिन्न दुग्ध एवं मट्ठा आदि का पोषणात्मक संगठन
| पदार्थ | प्रतिशत % | कॅलरीमान | प्रति १०० ग्राम जीवतिक्ति (Vitamin) | |||||||||
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| प्रभूजिन | स्नेहांश | कार्बोज | कॅल्सियम् | फॉस्फोरस | लौह | ए <br> अ. इ. | बी₁ <br> माइ. ग्रा. | निकोटिनिक एसिड <br> मि. ग्रा. | रिबोफ्लीविन <br> माइ. ग्रा. | सी <br> मि. ग्रा. | ||
| दुग्ध मातृ | १.० | ३.९ | ७.० | ०.०२ | ०.०१ | ०.२ | ६७ | २.८ | - | - | ३० | - |
| ,, गाय | ३.३ | ३.६ | ४.८ | ०.१२ | ०.०९ | ०.२ | ६५ | १८० | ५१ | ०.१ | २०० | २ |
| ,, भैंस | ४.३ | ८.८ | ५.१ | ०.२१ | ०.१३ | ०.२ | ११७ | १६२ | - | ०.१ | - | - |
| ,, बकरी | ३.७ | ५.६ | ४.७ | ०.१७ | ०.१२ | ०.३ | ८४ | १८२ | - | - | ४० | - |
| ,, गर्दभी | १.६-२.० | १.३-१.५ | ६.२७-६.८ | - | - | - | - | - | - | - | - | - |
| ,, घोड़ी | २.१-२.५ | १.६-१.८ | ६.०-८.५ | - | - | - | - | - | - | - | - | - |
| ,, भेड़ | १.५० | २ | १.४१ | - | - | - | ३० | + | + | + | + | + |
| ,, मक्खन निकाला | २.५ | ०.१ | ४.६ | ०.१२ | ०.०९ | ०.२ | २९ | - | - | ०.१ | - | २ |
| मट्ठा | ०.८ | १.१ | ०.०५ | ०.०३ | ०.०३ | ०.८ | १५ | लेश | - | - | - | - |
| दही | २.९ | २.९ | ३.३ | ०.१२ | ०.०९ | ०.३ | ५१ | १३० | - | - | ६० | - |
| मक्खन | १.१५ | ८१.५ | - | - | - | - | ७६२ | - | - | - | - | - |
| घी | - | १०० | - | - | - | - | ९०० | - | - | - | - | - |
| मलाई | २.५ | ३० | ४.५ | - | - | - | ५७५ | - | - | - | - | - |
दुग्धवर्गः ९०९ बकरी का दूध-कषाय तथा मधुर रसयुक्त, शीतल, ग्राही, लघु, एवम्-रक्तपित्त, अतिसार, क्षय, खाँसी तथा ज्वर को दूर करने वाला होता है। बकरियाँ शरीर से छोटी होती हैं और कटु तथा तिक्तरसयुक्त पत्ते आदि खाती हैं, थोड़ा जल पीती हैं एवम् व्यायाम (चलना, फिरना) अधिक करती हैं अतः उनका दूध सर्वरोगनाशक होता है। [१६-१७] अथ मृग्यादिदुग्धस्य गुणानाह मृगीणां जाङ्गलोत्थानामजाक्षीरगुणं पयः ।।१८।। जांगल देश की हरिणियों का दूध-बकरी के दूध के समान गुणों से युक्त होता है। [१८] तत्राविकदुग्धस्य गुणानाह आविकं लवणं स्वादु स्निग्धोष्णं चाश्मरीप्रणुत्। अहृद्यं तर्पणं केश्यं¹ शुक्रपित्तकफप्रदम् ।। गुरु कासानिलोद्भूते केवले चानिले वरम् ।।१९।। भेंडी का दूध-लवण तथा मधुर रसयुक्त, स्निग्ध, उष्ण, अश्मरीनाशक, हृदय के लिये अहितकर, तृप्तिकारक, केशों के लिये हितकर, शुक्र-पित्त तथा कफ को उत्पन्न करनेवाला तथा गुरु होता है। एवम् वात से उत्पन्न होनेवाली खाँसी तथा केवल वातरोग में हितकर होता है। [१९] अथ घोटकीदुग्धस्य गुणानाह रूक्षोष्णं वडवाक्षीरं बल्यं शोषानिलापहम्। अम्लं पटु लघु स्वादु सर्वमेकशफं तथा ।।२०।। घोड़ी का दूध-रूक्ष, उष्ण, बलकारक, शोष तथा वायु को नष्ट करने वाला, अम्ल तथा लवण रसयुक्त, लघु और स्वादिष्ट होता है। एवम् घोड़े की भाँति जितने एक शफ अर्थात् अखण्डित खुर वाले हैं उनके भी दूध पूर्वोक्त गुणवाले होते हैं। [२०] अथौष्ट्रदुग्धस्य गुणानाह औष्ट्रं दुग्धं लघु स्वादु लवणं दीपनं तथा। कृमिकुष्ठकफानाहशोथोदरहरं सरम् ।।२१।। ऊँटिनी का दूध-लघु, मधुर तथा लवण रसयुक्त, अग्निदीपक, सारक एवम्-कृमि, कुष्ठ, कफ, अफरा, शोथ तथा उदर विकार को दूर करने वाला होता है। [२१] अथ हस्तिनीदुग्धस्य बृंहणं हस्तिनीदुग्धं मधुरं तुवरं गुरु। वृष्यं बल्यं हिमं स्निग्धं चक्षुष्यं स्थिरताकरम् ।।२२।। हथिनि का दूध-मधुर तथा कषाय रसयुक्त, बृंहण (रस-रक्तादिवर्धक), गुरु, वीर्यवर्धक, बलकारक, शीतल, स्निग्ध, नेत्रों के लिये हितकर तथा शरीर को दृढ़ करने वाला होता है। [२१] अथ नारीदुग्धस्य गुणानाह नार्या लघु पयः शीतं दीपनं वातपित्तजित्। चक्षुःशूलाभिघातघ्नं नस्याश्च्योतनयोर्वरम् ।।२३।। स्त्री का दूध-लघु, शीतल, अग्निदीपक एवम् वात, पित्त, नेत्रों का शूल तथा अभिघात को दूर करने वाला होता है एवम् नस्य तथा आश्च्योतन कर्म के लिये उत्तम होता है। [२३] १. वृष्य इति पाठा० ।
९१० भावप्रकाशनिघण्टुः अथ धारोष्णादिदुग्धस्य गुणानाह धारोष्णं गोपयो बल्यं लघु शीतं सुधासमम् । दीपनञ्च त्रिदोषघ्नं तद्धाराशिशिरं त्यजेत् ।। २४ ।। धारोष्णं शस्यते गव्यं धाराशीतन्तु माहिषम् । शृतोष्णमाविकं पथ्यं शृतशीतमजापयः ।। २५ ।। आमं क्षीरमभिष्यन्दि गुरु श्लेष्माभिवर्द्धनम् । ज्ञेयं सर्वमपथ्यं तु गव्यमाहिषवर्जितम् ।। २६ ।। नारीक्षीरं त्वाममेव हितं न तु शृतं हितम् । शृतोष्णं कफवातघ्नं शृतशीतन्तु पित्तनुत् ।। २७ ।। अर्द्धोदकं क्षीरशिष्टमामाल्लघुतरं पयः । जलेन रहितं दुग्धमतिपक्वं यथा यथा । तथा तथा गुरु स्निग्धं वृष्यं बलविवर्धनम् ।। २८ ।। गाय का धारोष्ण दूध—बलकारक, लघु, शीतल, अमृत के समान, अग्निदीपक तथा त्रिदोषनाशक होता है। किन्तु यदि वह (गाय का दूध) धाराशीतल अर्थात् दुहने के बाद देर तक रखने से शीतल हो गया हो तो उसे छोड़ देना चाहिये अर्थात् धारोष्ण का पूर्वोक्त गुण न होने से नहीं पीना चाहिये, यदि पीना हो तो गरम करके पीवे। धरोष्ण (दुहने के समय जो उष्णता रहती है उससे युक्त) दूध—गाय का उत्तम होता है। धाराशीत (दुहने के समय जो उष्णता रहती है उसके निकल जाने के बाद शीतल हुआ) दूध—भैंस का उत्तम होता है। उबाला हुआ गरम-गरम दूध—भेंड़ का पथ्य होता है। उबाल कर शीतल किया हुआ दूध—बकरी का पथ्य होता है। गाय तथा भैंस के दूध को छोड़ कर शेष सभी के कच्चे दूध को अभिष्यन्दी, गुरु, कफ तथा आम को बढ़ाने वाला तथा अपथ्य समझना चाहिये किन्तु स्त्री का दूध तो कच्चा ही हितकर होता है। यदि वही औंटाया हुआ हो तो हितकर नहीं होता है। साधारण रूप से औंटाया हुआ गरम दूध—कफ तथा वातनाशक होता है और औंटाकर शीतल किया हुआ— पित्तनाशक होता है। दूध में यदि आधा भाग जल मिलाकर औंटाया जाय और जब पानी जल कर केवल दूध का भाग शेष रह जाय तब उतार ले—यह दूध कच्चे की अपेक्षा अधिक लघु होता है। बिना जल छोड़े दूध को जितना ही अधिक औंटाया जायगा उतना ही अधिक उत्तरोत्तर गुरु, स्निग्ध, वीर्य तथा बल को बढ़ाने वाला होता जायगा। [२४-२८] अथ पीयूष-किलाट-क्षीरशाक-तक्रपिण्ड-मोरटानां- लक्षणानि गुणांश्चाह क्षीरं तत्कालसूताया घनं पीयूषमुच्यते । नष्टदुग्धस्य पक्वस्य पिण्डः प्रोक्तः किलाटकः ।। २९ ।। पीयूष, किलाट, क्षीरशाक, तक्रपिण्ड तथा मोरट के लक्षण और गुण—पीयूष के लक्षण—तत्काल की ब्याई हुई गाय, भैंस आदि के गाढ़े दूध को "पीयूष" कहते हैं। किलाटक के लक्षण—बिगड़े हुये दूध को यदि औंटाते-औंटाते गाढ़ा करके पिण्डाकार बना लिया जाय तो उसे किलाटक कहते हैं। [२९] पीयूषं "पेवस" इति लोके । किलाटकः "खरेटा" "गिजिरी" वा इति लोके ।। २९ ।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA
दुग्धवर्गः ९११ यहाँ पर मूल में— "पीयूष" से लोकप्रसिद्ध "पेवस" का तथा "किलाटक" से लोकप्रसिद्ध "खरेटा-या-गिजिरी" का बोध करना चाहिये। [२९] अपक्वमेव यन्नष्टं क्षीरशाकं हि तत्पयः ।। ३०।। क्षीरशाक के लक्षण—जो दूध बिना औटाये ही (कच्चा ही) फट गया हो उसे क्षीरशाक कहते हैं। [३०] ❖ क्षीरशाकं 'तुषिभरा' वा 'खिरिसा' इति लोके ।। ३०।। यहाँ पर "क्षीरशाक" से लोकप्रसिद्ध "तुषिभरा—या-खिरिसा" का बोध करना चाहिये। [३०] दध्ना तक्रेण वा नष्टं दुग्धं बद्धं सुवाससा। द्रवभावेन सहितं तक्रपिण्डः स उच्यते ।। ३१ ।। नष्टदुग्धभवं नीरं मोरटं जेज्जटोऽब्रवीत्। पीयूषञ्च किलाटश्च क्षीरशाकं तथैव च ।। ३२।। तक्रपिण्ड इमे वृष्या बृंहणा बलवर्द्धनाः। गुरवः श्लेष्मला हृद्या वातपित्तविनाशनाः ।। ३३।। दीप्ताग्नीनां विनिद्राणां विद्रधौ चाभिपूजिताः। मुखशोषतृषादाहरक्तपित्तज्वरप्रणुत् ।। लघुर्बलकरो रुच्यो मोरटः स्यात्सितायुतः ।। ३४।। तक्रपिण्ड के लक्षण—जो दूध-दही अथवा तक्र (छाछ) के संयोग से फट गया हो अथवा फाड़ा गया हो उसे यदि वस्त्र में बाँध कर लटका दिया जाय तो द्रवपदार्थ हीन होने पर अर्थात् पानी का भाग निकल जाने पर उसे "तक्रपिण्ड" कहते हैं। मोरट के लक्षण—उक्त प्रकार से दूध के फट जाने के बाद वस्त्र में बाँधने पर जो जल टपक कर गिरता है उसे "मोरट" कहते हैं, ऐसा "जेज्जट" आचार्य का कथन है। पीयूष-किलाट-क्षीरशाक तथा तक्रपिण्ड ये सब—वीर्यवर्धक, बृंहण (रस-रक्तादिवर्धक) बल को बढ़ाने वाले, गुरु, कफकारक, हृदय को हितकर, वात तथा पित्तनाशक, दीप्त अग्निवाले तथा जिन्हें नींद नहीं आती है ऐसे लोगों के लिये एवं विद्रधि रोग वालों के लिये अत्युत्तम होते हैं। और मोरट यदि बूरा से युक्त हो तो—लघु, बलकारक, रुचिजनक एवम् मुखशोष, प्यास, दाह, रक्तपित्त तथा ज्वर को दूर करने वाला होता है। [३१-३४] अथ सन्तानिका (मलाई) गुणानाह सन्तानिका गुरुः शीता वृष्या पित्तास्रवातनुत्। तर्पणी बृंहणी स्निग्धा बलासबलशुक्रला ।। ३५ ।। मलाई—गुरु, शीतल, वीर्यवर्धक, तृप्तिकारक, बृंहण (रस-रक्तादि वर्धक), स्निग्ध, कफ, बल तथा शुक्र को उत्पन्न करने वाली एवम् पित्त-रक्तविकार तथा वात को दूर करने वाली होती है। [३५] अथ खण्डादियुक्तस्य दुग्धस्य गुणानाह खण्डेन सहितं दुग्धं कफकृत्पवनापहम्। सितासितोपलायुक्तं शुक्रलं त्रिमलापहम्। सगुडं मूत्रकृच्छ्रघ्नं पित्तश्लेष्मकरं परम् ।। ३६ ।। खांड पड़ा हुआ दूध—कफकारक तथा वातनाशक होता है। बूरा या मिश्री पड़ा हुआ दूध—शुक्रजनक तथा त्रिदोषनाशक होता है। गुड़ पड़ा हुआ दूध—मूत्र-कृच्छ्रनाशक एवम् पित्त तथा कफ को अधिक उत्पन्न करने वाला होता है। [३६] अथ प्रभातादिभवस्य दुग्धस्य गुणानाह रात्रौ चन्द्रगुणाधिक्याद्व्यायामाकरणात्तथा। प्राभातिकंपयः प्रायः प्रादोषाद् गुरु शीतलम् ।। ३७ ।। दिवाकरकराघाताद्व्यायामानिलसेवनात् । प्राभातिकात्तु प्रादोषं लघु वातकफापहम् ।। ३८ ।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
९१२ भावप्रकाशनिघण्टुः प्रातः आदि समयों के दूध का गुण-प्रातःकाल का दूध प्रायः करके सायंकाल के दूध की अपेक्षा अधिक गुरु तथा शीतल होता है क्योंकि-रात्रि में चन्द्रमा के गुणों की अधिकता रहती है तथा व्यायाम (चलने फिरने का श्रम) नहीं किया जाता है और सायंकाल का दूध प्रातःकाल के दूध की अपेक्षा लघु एवम् वात तथा कफनाशक होता है, क्योंकि दिन में शरीर पर सूर्य की किरणें पड़ती रहती हैं एवम् व्यायाम (चलने फिरने का श्रम) तथा वायु सेवन होता रहता है । [३७- ३८] अथ दुग्धसेवनस्य समयविशेषेण गुणविशेषानाह वृष्यं बृंहणमग्निदीपनकरं पूर्वाह्नकाले पयो मध्याह्ने तु बलावहं कफहरं पित्तापहं दीपनम् । वाले वृद्धिकरं क्षयेऽक्षयकरं वृद्धेषु रेतोवहं रात्रौ पथ्यमनेकदोषशमनं चक्षुर्हितं संस्मृतम् ।।३९।। वदन्ति पेयं निशि केवलं पयो भोज्यं न तेनेह सहौदनादिकम् । भवत्यजीर्णं न शयीत शर्वरीं क्षीरस्य पीतस्य न शेषमुत्सृजेत् ।।४०।। विदाहीन्यन्नपानानि दिवा भुङ्क्ते हि यन्नरः । तद्विदाहप्रशान्त्यर्थं रात्रौ क्षीरं सदा पिबेत् ।।४१।। दीप्तानले कृशे पुंसि बाले वृद्धे पयःप्रिये । मतं हिततमं दुग्धं सद्यःशुक्रकरं यतः ।।४२।। समय विशेष में दूध पीने के विशेष गुण-दिन के पूर्व भाग (सुबह से १० बजे तक) में दुग्धपान (दूध पीना) वीर्यवर्धक, बृंहण (रस-रक्तादिवर्धक) तथा अग्नि को दीप्त करने वाला होता है। मध्याह्न काल में दुग्धपान-बलकारक, कफ तथा पित्त को दूर करने वाला एवम् अग्निदीपक होता है । बाल्यावस्था में दुग्धपान-शरीर की वृद्धि करने वाला होता है । क्षय अवस्था में-क्षय का निवारण करने वाला और वृद्धावस्था में दुग्धपान शुक्र की रक्षा करने वाला होता है । रात्रि में दुग्धपान-पथ्य (हितकर), अनेक दोषों को शमन करने वाला एवम् नेत्रों के लिये हितकर ऋषियों द्वारा कहा गया है । और कोई आचार्य यह कहते हैं कि-रात्रि में केवल दूध पीना चाहिये, उसके साथ भात आदि नहीं खाना चाहिये, क्योंकि इससे अजीर्ण होता है और रात्रि में नींद भी नहीं आती है और दूध पीने के बाद पात्र में कुछ शेष भाग न रख छोड़़े अर्थात् जितना पीना हो उतना ही दूध लेकर पीवे अथवा दूध यदि कुछ अधिक हो जाय तो भी पीने से हानि नहीं हो सकती अतः दूध कभी पीकर नहीं छोड़ देना चाहिये । मनुष्य दिन में जो कुछ विदाही (दाह पैदा करने वाले) अन्न-पान आदि का सेवन करता है उससे होने वाले दाह की शान्ति के लिये रात्रि में उसे प्रतिदिन दूध अवश्य पीना चाहिये । जिनकी अग्नि प्रदीप्त है या जो कृश हैं उन सभी के लिये एवम् बालक, वृद्ध तथा जिन्हें दूध प्रिय हो ऐसे लोगों के लिये दुग्ध पान अत्यन्त हितकर होता है क्योंकि यह (दुग्धपान) तत्काल (पीते ही पीते) शुक्र की वृद्धि करने वाला होता है । [३९-४२] अथ मथितदुग्धस्य गुणानाह क्षीरं गव्यमथाजं वा कोष्णं दण्डाहतं पिबेत् । लघु वृष्यं ज्वरहरं वातपित्तकफापहम् ।।४३।। मथे हुये दूध के गुण-गाय अथवा बकरी का दूध यदि औटाया हुआ मथानी से मथ कर किञ्चित् उष्ण रहते ही पीवे तो वह लघु, वीर्यवर्धक, एवम्-ज्वर, वात, पित्त तथा कफ को दूर करने वाला होता है । [४३] अथ दुग्धफेनम् (झाग) । तस्य गुणानाह गोदुग्धप्रभवं किं वा छागीदुग्धसमुद्भवम् । भवेत् फेनं त्रिदोषघ्नं रोचनं बलवर्द्धनम् ।।४४।। वह्निवृद्धिकरं वृष्यं सद्यस्तृप्तिकरं लघु । अतीसारेऽग्निमान्द्ये च ज्वरे जीर्णे प्रशस्तते ।।४५।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
दुग्धवर्गः ९१३ गाय अथवा बकरी के दूध का फेन-त्रिदोषनाशक, रोचक, बलवर्धक, अग्नि की वृद्धि करने वाला, वीर्यवर्धक, तत्काल तृप्ति देने वाला, लघु एवम् अतीसार, अग्नि की मन्दता तथा पुराने ज्वर में हितकर होता है । [४४-४५] अथ निन्दितदुग्धस्य लक्षणमाह विवर्णं विरसं चाम्लं दुर्गन्धं ग्रथितं पयः । वर्जयेदम्ललवणयुक्तं कुष्ठादिकृद् यतः ।।४६।। निन्दित दूध के लक्षण—जो दूध-विवर्ण (बदरङ्ग हो गया हो), विरस (खराब स्वाद वाला), खट्टा, दुर्गन्धयुक्त, ग्रन्थि पड़ा हुआ (फटा हुआ) एवम् खटाई या नमक पड़ा हुआ हो उसे छोड़ देना चाहिये अर्थात् न पीवे, क्योंकि उक्त दूध के पीने से कुष्ठ आदि रोग उत्पन्न हो जाते हैं । [४६] इति श्रीमिश्रलटकनतनयश्रीमिश्रभावविरचिते भावप्रकाशे वर्गप्रकरणे दुग्धवर्गः समाप्तः । ६१ भाव.I CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
अथ दधिवर्गः तत्र दध्नो गुणानाह दध्युष्णं दीपनं स्निग्धं कषायानुरसं गुरु। पाकेऽम्लं ग्राहि १पित्तास्रशोथमेदःकफप्रदम् ।।१।। मूत्रकृच्छ्रे प्रतिश्याये शीतगे विषमज्वरे। अतीसारेऽरुचौ कार्श्ये शस्यते बलशुक्रकृत् ।।२।। दही—उष्ण, अग्निदीपक, स्निग्ध, किञ्चित् कषाय रस युक्त, गुरु, विपाक में अम्लरसयुक्त, ग्राही एवम् पित्त, रक्तविकार, शोथ, मेद और कफ को उत्पन्न करने वाला होता है। और मूत्रकृच्छ्र, जुखाम, शीत विषमज्वर, अतीसार, अरुचि तथा कृशता में उत्तम होता है और बल तथा शुक्र को बढ़ाने वाला होता है। [१-२] अथ दधिभेदानाह आदौ मन्दं ततः स्वादु स्वाद्वम्लञ्च ततः परम्। अम्लं चतुर्थमत्यम्लं पञ्चमं दधि पञ्चधा ।।३।। दही के भेद—(१) मन्द, (२) स्वादु, (३) स्वाद्वम्ल, (४) अम्ल, (५) अत्यम्ल इस भाँति से दही के पाँच भेद होते हैं। [३] अथ मन्दादिदध्नो लक्षणं गुणाँश्चाह मन्दं दुग्धवदव्यक्तरसं किञ्चिद्धनं भवेत्। मन्दं स्यात्सृष्टविण्मूत्रं दोषत्रयविदाहकृत् ।।४।। यत्सम्यग्घनतां यातं व्यक्तस्वादुरसं भवेत्। अव्यक्ताम्लरसं तत्तु स्वादु विज्ञैरुदाहृतम् ।।५।। स्वादु स्यादत्यभिष्यन्दि वृष्यं मेदःकफावहम्। वातघ्नं मधुरं पाके रक्तपित्तप्रसादनम् ।।६।। स्वाद्वम्लं सान्द्रमधुरं कषायानुरसं भवेत्। स्वाद्वम्लस्य गुणा ज्ञेया सामान्यदधिवज्जनैः ।।७।। यत्तिरोहितमाधुर्यं व्यक्ताम्लत्वं तदम्लकम्। अम्लं तु दीपनं पित्तरक्तश्लेष्मविवर्द्धनम् ।।८।। तदत्यम्लं दन्तरोमहर्षकण्ठादिदाहकृत्। अत्यम्लं दीपनं रक्तवातपित्तकरं परम् ।।९।। मन्द दही के लक्षण—जो दही—दूध के समान (ठीक से नहीं जमा हुआ), अव्यक्त रसवाला तथा कुछ गाढ़ा होता है उसे "मन्द" कहते हैं। मन्द दही—मल तथा मूत्र की प्रवृत्ति करने वाला, त्रिदोष और दाह को उत्पन्न करने वाला होता है। स्वादु दही के लक्षण—जो दही भली-भाँति गाढ़ा हो गया हो और जिसका स्वाद (मधुर) रस अच्छी तरह प्रकट हो रहा हो तथा अम्लरस अव्यक्त हो (ठीक से नहीं मालूम पड़ता हो) उसे विद्वानों ने "स्वादु" संज्ञक दही बताया है। स्वादु संज्ञक दही—अत्यन्त अभिष्यन्दी, वीर्यवर्धक, मेद तथा कफ को उत्पन्न करने वाला, वातनाशक, विपाक में मधुर रसयुक्त तथा रक्तपित्त को शांत करने वाला होता है। स्वाद्वम्ल संज्ञक दही के लक्षण—गाढ़ा, मधुर रसयुक्त तथा अन्त में कषाय रस युक्त दही को "स्वाद्वम्ल" संज्ञक दही कहते हैं। १. श्वास इति पाठा० । CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammu. Digitized by S3 Foundation USA
दधिवर्ग: १९५
स्वाद्वम्लसंज्ञक दही-गुणों में साधारण दही के समान होता है ऐसा विद्वानों का मत है । अम्लसंज्ञक दही के लक्षण-जिस दही में मधुर रस छिपा हुआ हो और अम्ल रस प्रकट हो रहा हो उसे "अम्ल" संज्ञक दही समझना चाहिये । अम्लसंज्ञक दही-अग्निदीपक एवम् पित्त, रक्तविकार तथा कफ को बढ़ाने वाला होता है । अत्यम्ल संज्ञक दही के लक्षण-जिस दही के खाने से दाँत हर्षित हो जायँ तथा रोंगटे खड़े हो जायँ और कण्ठ आदि में दाह होने लगे उसे "अत्यम्ल" संज्ञक दही जानना चाहिये । अत्यम्ल संज्ञक दही-अग्निदीपक एवम् रक्तविकार, वात तथा पित्त को अत्यन्त उत्पन्न करने वाला होता है । [४-९] अथ गोदधिगुणानाह गव्यं दधि विशेषेण स्वाद्वम्लं च रुचिप्रदम् । पवित्रं दीपनं हृद्यं पुष्टिकृत्पवनापहम् । उक्तं दध्नामशेषाणां मध्ये गव्यं गुणाधिकम् ।।१०।। गाय का दही-विशेष रूप से मधुर तथा अम्लरसयुक्त, रुचि उत्पन्न करने वाला, पवित्र, अग्निदीपक, हृदय के लिये हितकर, पुष्टिकारक तथा वातनाशक होता है और सम्पूर्ण दहियों के बीच में गाय का ही दही अधिक गुण करने वाला कहा हुआ है । [१०] अथ माहिषदधिगुणानाह माहिषं दधि सुस्निग्धं श्लेष्मलं वातपित्तनुत् । स्वादुपाकमभिष्यन्दि वृष्यं गुर्वस्रदूषकम् ।।११।। भैंस का दही-अत्यन्त स्निग्ध, कफजनक, वात तथा पित्त नाशक, विपाक में मधुररसयुक्त, अभिष्यन्दी, वीर्यवर्धक, गुरु तथा रक्त को दूषित करने वाला होता है । [११] अथाजदधिगुणानाह आजं दध्युत्तमं ग्राहि लघु दोषत्रयापहम् । शस्यते श्वासकासार्शःक्षयकार्श्येषु दीपनम् ।।१२।। बकरी का दही-उत्तम, ग्राही, लघु, त्रिदोषनाशक, अग्निदीपक एवम्-श्वास, खाँसी, अर्श, क्षय तथा कृशता में हितकर होता है । [१२] अथ पक्वदुग्धजातस्य दध्नो गुणानाह पक्वदुग्धभवं रुच्यं दधि स्निग्धं गुणोत्तमम् । पित्तानिलापहं सर्वधात्वग्निबलवर्द्धनम् ।।१३।। पकाये हुये दूध से तैयार किया हुआ दही-रुचिकारक, स्निग्ध, उत्तम गुणवाला, पित्त तथा वात को दूर करने वाला एवम्-सम्पूर्ण धातु, अग्नि तथा बल को बढ़ाने वाला होता है । [१३] अथ निःसारदुग्धजनितदध्नो गुणानाह असारं दधि सङ्ग्राहि शीतलं वातलं लघु । विष्टम्भि दीपनं रुच्यं ग्रहणीरोगनाशनम् ।।१४।। निःसार दूध का दही-संग्राही, शीतल, वातजनक, लघु, विष्टम्भकारक, अग्निदीपक, रुचिकारक एवम्- ग्रहणीरोग को नष्ट करने वाला होता है । [१४] अथ गालितदध्नो गुणानाह गालितं दधि सुस्निग्धं वातघ्नं कफकृद् गुरु । बलपुष्टिकरं रुच्यं मधुरं नातिपित्तकृत् ।।१५।।
- ९१६ भावप्रकाशनिघण्टुः गालित (वस्त्र से छाने हुये) दही-अति स्निग्ध, वातनाशक, कफकारक, गुरु, बल तथा पुष्टि को करने वाला, रुचिकारक, मधुररसयुक्त तथा अत्यन्त पित्तकारक नहीं होता है अर्थात् किञ्चित्त पित्त करने वाला होता है। [१५] अथ शर्कराऽदिसहितस्य दध्नो गुणानाह सशर्करं दधि श्रेष्ठं तृष्णापित्तास्रदाहजित्। सगुडं वातनुद् वृष्यं बृंहणं तर्पणं गुरु ।।१६।। शक्कर मिला हुआ दही-श्रेष्ठ होता है एवम् तृष्णा (प्यास), पित्त, रक्तविकार तथा दाह को नष्ट करने वाला होता है। गुड़ मिला हुआ दही-वातनाशक, वीर्यवर्धक, बृंहण (रस रक्तादिवर्धक), तृप्तिकारक तथा गुरु होता है। [१६] अथ रात्रौ दधिभक्षणस्य निषेधमाह न नक्तं दधि भुञ्जीत न चाप्यघृतशर्करम्। नामुद्गसूपं नाक्षौद्रं नोष्णं नामलकैर्विना ।।१७।। रात्रि में दही खाने का निषेध-रात्रि में दही नहीं खाना चाहिये और बिना घी तथा शक्कर के या बिना मूँग की दाल के वा बिना मधु के गरम किंवा बिना आँवला के दही नहीं खाना चाहिये। [१७] ❖ अयमर्थः रात्रौ दधि न भुञ्जीत, चेत्तदा-अघृतशर्करममुद्गसूपमक्षौद्रमुष्णं विनाऽऽमलकञ्च दधि न भुञ्जीत। तेन घृतशर्कराऽऽदियुक्तं दधि रात्रावपि भुञ्जीतेत्यर्थः । यहाँ पर उपर्युक्त श्लोक का वास्तविक अर्थ यह समझना चाहिये कि-रात्रि में दही कभी नहीं खाना चाहिये, यदि खाना ही हो तो घी, शक्कर या मूँग की दाल वा शहद किंवा आँवला के बिना अथवा गरम न खाय, इससे यह सिद्ध हुआ कि-घी, शक्कर आदि से युक्त दही रात्रि में भी खायें। ❖ तथा चं शस्यते दधि नो रात्रौ शस्तं चाम्बुघृतान्वितम्। रक्तपित्तकफोत्थेषु विकारेषु तु नैव तत् ।।१।। तथा इसी विषय में और भी कहा है कि-रात्रि में दही खाना उचित नहीं है किन्तु यदि जल तथा घी मिला हुआ हो तो खाना उचित है। किन्तु रक्त, पित्त तथा कफ सम्बन्धी विकारों में वह भी अर्थात् जल तथा घी से मिला हुआ भी दही खाना उचित नहीं होता है अर्थात् अहितकर होता है। [१] तद् = अम्बुघृतान्वितमपि (।।१।।) ।।१७।। यहाँ पर “तत्” पद का “वह भी अर्थात् जल तथा घी से मिला भी “दही” यह अर्थ समझना चाहिये (।।१।।) । [१७] अथ ऋतुविशेषेण दध्नो विधिनिषेधावाह हेमन्ते शिशिरे चापि वर्षासु दधि शस्यते। शरद्ग्रीष्मवसन्तेषु प्रायशस्तद्विगर्हितम् ।।१८।। ऋतु विशेष में दही खाने की विधि तथा निषेध-हेमन्त (अगहन-पूस), शिशिर (माघ-फागुन) तथा वर्षा (सावन-भादो) ऋतु में दही खाना उत्तम है। शरद् (क्वार-कार्तिक), ग्रीष्म (जेठ-आषाढ़) तथा (चैत-वैशाख) ऋतु में दही खाना प्रायः करके निन्दित है अर्थात् निषिद्ध है। [१८] अथ विधिमन्तरेण दधिसेवने दुर्गुणानाह ज्वरासृक्पित्त वीसर्पकुष्ठपाण्ड्वामयभ्रमान्। प्राप्नुयात्कामलां चोग्रां विधिं हित्वा दधिप्रियः ।।१९।।
दधिवर्गः ९१७
बिना विधि के दही सेवन करने के दुर्गुण—जो दही का प्रेमी व्यक्ति विधि को छोड़ कर अर्थात् जब जिस भाँति दही खाने की विधि है उसके विरुद्ध सदा दही खाता रहता है तो उसे ज्वर, रक्तपित्त, विसर्प, कुष्ठ, पाण्डु तथा भ्रम रोग एवम् प्रचण्ड रूप से कामला रोग उत्पन्न हो जाता है। अतः विधिपूर्वक दही खाना चाहिये। [१९] अथ दध्नः सरमस्तुनोर्लक्षणं गुणाँश्चाह दध्नस्तूपरि यो भागो घनः स्नेहसमन्वितः । स लोके सर इत्युक्तो दध्नो मण्डस्तु मस्त्विति ॥२०॥ सरः स्वादुर्गुरुर्वृष्यो वातवह्निप्रणाशनः । सोऽम्लो वस्तिप्रशमनः पित्तश्लेष्मविवर्द्धनः ॥२१॥ मस्तु क्लमहरं बल्यं लघु भक्ताभिलाषकृत् ॥२२॥ स्रोतोविशोधनं हृदि कफतृष्णानिलापहम् । अवृष्यं प्रीणनं शीघ्र भिनत्ति मलसञ्चयम् ॥२३॥ सर के लक्षण—दही के ऊपर जो गाढ़ा तथा स्नेह (घी) से युक्त भाग होता है उसे लोक में सर (साढ़ी) कहते हैं। मस्तु के लक्षण—और दही के मांड (पानी) को मस्तु (दही का तोड़) कहते हैं। सर—जो सर स्वादिष्ट होता है वह गुरु, वीर्य वर्धक, वात तथा जठराग्नि नाशक होता है और यदि वह (सर) अम्ल रस युक्त होता है, तो बस्ति के रोगों का प्रशमन करता है एवम्–पित्त तथा कफ को बढ़ाता है। मस्तु (दही का तोड़)—क्लान्ति को दूर करने वाला, बलदायक, लघु, अन्न खाने की अभिलाषा को उत्पन्न करने वाला, स्रोतोमार्ग (नाड़ियों के मार्ग) को शुद्ध करने वाला, आह्लादजनक एवम् कफ, तृषा तथा वायु को नष्ट करने वाला, अवृष्य (किञ्चित् वीर्यवर्धक) तथा शीघ्र संचित मल का भेदन करने वाला होता है। [२०-२३] इति श्रीमिश्रलटकनतनय श्रीमिश्रभावविरचिते भावप्रकाशे वर्गप्रकरणे दधिवर्गः समाप्तः ।
अथ तक्रवर्गः तत्र तक्रस्य पृथक्पृथङ् नामानि लक्षणं गुणाँश्चाह घोलं तु मथितं तक्रमुदश्विच्छच्छिकाऽपि च । ससरं निर्जलं घोलं मथितं त्वसरोदकम् ।।१।। तक्रं पादजलं प्रोक्तमुदश्वित्त्वर्द्धवारिकम् । च्छच्छिका सारहीना स्यात्स्वच्छा प्रचुरवारिका ।। घोलं तु शर्करायुक्तं गुणैर्ज्ञेयं रसालवत् ।।२।। तक्र (मट्ठा) के भिन्न-भिन्न लक्षणों के अनुसार भिन्न-भिन्न संस्कृत नाम—घोल, मथित, तक्र, उदश्वित् और च्छच्छिका ये सब हैं। अर्थात् उक्त पाँच भेद तक्र के होते हैं। लक्षण-घोल—बिना जल मिलाये यदि मलाई के सहित दही को मथा जाय तो उसे “घोल” कहते हैं। मथित—यदि दही की मलाई अलग कर बिना जल मिलाये ही मथ दिया जाया तो उसे “मथित” कहते हैं। तक्र— जिस दही में चतुर्थांश जल मिला कर मथा जाय तो उसे तक्र कहते हैं। उदश्वित्—जिस दही में आधा जल मिलाकर मथा जाय उसे “उदश्वित्” कहते हैं। च्छच्छिका—जिस दही में से प्रथम मथ कर मक्खन निकाल लिया हो पुनः उसी में अधिक मात्रा में स्वच्छ जल डालकर फिर मथा जाय तो उसे “च्छच्छिका” कहते हैं। [१-२] ❖ मथितम् = 'महुया' वा 'मथुवा' इति लोके । च्छच्छिका "छाछ" = इति लोके ।।१-२।। यहाँ पर—"मथितम्" से लोकप्रसिद्ध "महुया" या "मथुवा" का तथा "च्छच्छिका" से लोकप्रसिद्ध "छाछ" का ग्रहण करना चाहिये। [१-२] घोलं तु शर्करायुक्तं गुणैर्ज्ञेयं रसालवत् । वातपित्तहरं ह्लादि मथितं कफपित्तनुत् ।।३।। तक्रं ग्राहि कषायाम्लं स्वादुपाकरसं लघु । वीर्योष्णं दीपनं वृष्यं प्रीणनं वातनाशनम् ।।४।। ग्रहण्यादिमतां पथ्यं भवेत्संग्राहि लाघवात् । किञ्च स्वादुविपाकित्वान्न च पित्तप्रकोपणम् ।।५।। अम्लोष्णं दीपनं वृष्यं प्रीणनं वातनाशनम् । कषायोष्णविकाशित्वाद्रौक्ष्याच्चापि कफापहम् ।।६।। न तक्रसेवी व्यथते कदाचिन्न तक्रदग्धाः प्रभवन्ति रोगाः । यथा सुराणाममृत सुखाय तथा नराणां भुवि तक्रमाहुः ।।७।। उदश्वित् कफकृद् बल्यमामघ्नं परमं मतम् । च्छच्छिका शीतला लघ्वी पित्तश्रमतृषाहरी ।। वातनुत् कफकृत् सा तु दीपनी लवणाम्विता ।।८।। घोल—घोल में यदि शक्कर मिला हुआ हो तो वह गुणों में रसाल (सिखरन) के समान होता है एवम् वात तथा पित्तनाशक और आह्लादजनक होता है। मथित—यह कफ तथा पित्तनाशक होता है। तक्र—यह कषाय तथा मधुर रस युक्त, विपाक में मधुर रस युक्त, ग्राही, लघु, उष्णवीर्य, अग्निदीपक, वीर्यवर्धक, तृप्तिकारक तथा वातनाशक होता है। ग्रहणी आदि के रोगियों को तक्र हितकर होता है क्योंकि यह लघु होने से मल का संग्राहक होता है और विपाक में मधुर रस युक्त होने से पित्त को प्रकुपित भी नहीं करता है एवम् अम्लरस युक्त, उष्णवीर्य, अग्निदीपक, वीर्यवर्धक CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmı. Digitized by S3 Foundation USA
तक्रवर्गः ९१९ तथा तृप्तिकारक होने से यह वातनाशक होता है और कषाय रसयुक्त, उष्णवीर्य, विकाशी तथा रूक्ष होने से यह कफनाशक होता है। तक्र का सेवन करने वाला व्यक्ति कभी भी बीमार नहीं पड़ता है और तक्र के प्रभाव से नष्ट हुये रोग पुनः कभी उत्पन्न नहीं हो सकते, अस्तु जिस प्रकार से देवताओं के लिये सुखकारी अमृत है उसी भाँति पृथ्वी तल में मनुष्यों के लिये तक्र सुखकारी, ऋषियों ने बताया है। उदश्वित्—कफकारक, बलवर्धक तथा अत्यन्त आमनाशक होता है। छाछ—शीतल, लघु एवम् पित्त, श्रम तथा तृषा को दूर करने वाला, वातनाशक तथा कफ कारक होता है यदि इसमें सेंधा नमक मिला हो तो अग्निदीपक होता है। [३-८] अथोद्धृतस्तोकोद्धृताननुद्धृतघृतानां तक्राणां गुणानाह समुद्धृतघृतं तक्रं पथ्यं लघु विशेषतः ॥९॥ स्तोकोद्धृतघृतं तस्माद् गुरु वृष्य कफापहम्। अनुद्धृतघृतं सान्द्रं गुरु पुष्टिकफप्रदम् ॥१०॥ घी निकाला हुआ तक्र—पथ्य (रोगियों के लिये हितकर) तथा लघु होता है। यदि कुछ घी निकाल लिया गया हो और कुछ अंश घी का रह गया हो तो ऐसा तक्र—उपर्युक्त तक्र (घी निकाले हुये तक्र) की अपेक्षा गुरु, वीर्यवर्धक तथा कफनाशक होता है और यदि घी न निकाला हुआ हो तथा गाढ़ा हो तो ऐसा तक्र-गुरु एवम् पुष्टिकारक तथा कफजनक होता है। [९-१०] अथ दोषविशेषे व्याधिविशेषे च तक्रविशेषानाह वातेऽम्लं शस्यते तक्रं शुण्ठीसैन्धवसंयुक्तम्। पित्ते स्वादु सितायुक्तं व्योषक्षारयुक्तं कफे ॥११॥ हिङ्गूजीरयुतं घोलं सैन्धवेन च संयुतम्। भवेदतीव वातघ्नमर्शोऽतीसारहृत्परम् ॥१२॥ रुचिदं पुष्टिदं बल्यं वस्तिशूलविनाशनम्। मूत्रकृच्छ्रे तु सगुडं पाण्डुरोगे सचित्रकम् ॥१३॥ दोषविशेष में तथा रोगविशेष में विशेष दो तक्रों का प्रयोग—वातदोष की अधिकता में—अम्लरसयुक्त एवम् सोंठ तथा सेन्धा नमक मिला हुआ तक्र उत्तम अर्थात् हितकारी होता है। पित्त की अधिकता में—मधुर रसयुक्त तथा चीनी मिश्रित तक्र उत्तम हितकारी होता है। कफ की अधिकता में—सोंठ, मिरच तथा पीपर मिश्रित तक्र उत्तम हितकारी होता है। हींग, जीरा (ये दोनों भुने हुये हों) तथा सेंधा नमक से युक्त घोल—अत्यन्त वातनाशक, अर्श तथा अतिसार को अत्यन्त दूर करने वाला, रुचिजनक, पुष्टिकारक, बलदायक एवं बस्तिशूल नाशक होता है। गुड़युक्त घोल—मूत्रकृच्छ्र में एवम् चित्रक (चीता) मिश्रित घोल—पाण्डुरोग में देना हितकर है। अथ पक्वापक्वतक्रयोर्गुणानाह तक्रमामं कफं कोष्ठे हन्ति कण्ठे करोति च। पीनसश्वासकासादौ पक्वमेव प्रयुज्यते ॥१४॥ कच्चा (बिना पकाया हुआ) तक्र-कोष्ठ स्थित कफ को नष्ट करता है तथा कण्ठ में कफ करने वाला होता है। अतः पकाये हुए तक्र का ही—पीनस, श्वास तथा कास आदि में प्रयोग करना उचित है क्योंकि हितकर होता है। [१४] अथ तक्रसेवनविषयानाह शीतकालेऽग्निमान्द्ये च तथा वातामयेषु च। अरुचौ स्रोतसां रोधे तक्रं स्यादमृतोपमम् ॥ तत्तु हन्ति गरच्छर्दिप्रसेकविषमज्वरान्। पाण्डुमेदोग्रहण्यर्शोर्मूत्रग्रहभगन्दरान् ॥१५॥ मेहं गुल्ममतीसारं शूलप्लीहोदरारुचीः। श्वित्रकोष्ठगतव्याधीन् कुष्ठशोथतृषाकृमीन् ॥१६॥
९२० भावप्रकाशनिघण्टुः **तक्र सेवन करने के विषय-**शीतकाल में तथा अग्नि की मन्दता, वातरोग, अरुचि तथा नाड़ियों के अवरोध में तक्र अमृत के समान गुणकारी होता है। और यह—गर (संयोगज विष), वमन, प्रसेक (कफजन्य लार आदि गिरना), विषमज्वर, पाण्डुरोग, मेदरोग, ग्रहणी, अर्श (बवासीर), मूत्रग्रह (मूत्र का बन्द होना), भगन्दर, प्रमेह, गुल्म, अतीसार, शूल, प्लीहा, उदररोग, अरुचि, श्वित्र (श्वेतकुष्ठ), कोष्ठगत रोग, कुष्ठ, शोथ, तृषा तथा कृमिरोग को नष्ट करने वाला होता है। [१४-१६]
अथ तक्रस्य निषेधविषयानाह
नैव तक्रं क्षये$^१$ दद्यान्नोष्णकाले न दुर्बले। न मूर्च्छाभ्रमदाहेषु न रोगे रक्तपित्तजे ॥१७॥ **तक्र निषेध के विषय—**तक्र—क्षय रोग में तथा ग्रीष्म ऋतु में एवम् दुर्बल व्यक्ति तथा मूर्च्छा, भ्रम, दाह तथा रक्तपित्त रोग युक्त व्यक्ति को नहीं देना चाहिये। अर्थात् देना अहितकर होता है। [१७]
अथ गव्यादीनां विशिष्टतक्राणां गुणानाह
यान्युक्तानि दधीन्यष्टौ तद्गुणं तक्रमादिशेत् ॥१८॥ **गाय आदि के दूध के दही से बने हुये तक्र के गुण—**जो पूर्व में (दधिवर्ग में) गाय आदि के दूध के बने हुए आठ प्रकार के दहियों के गुण कह आये हैं वे ही सब गुण उन दहियों से बने हुये तक्र के भी होते हैं, ऐसा समझना चाहिये। [१८] इति श्रीमिश्रलटकनतनय श्रीमिश्रभावविरचिते भावप्रकाशे वर्गप्रकरणे तक्रवर्गः समाप्तः। ❖|||❖ १. श्वास इति पाठा० । CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
अथ नवनीतवर्गः तत्र नवनीतस्य नामगुणानाह म्रक्षणं सरजं हैयङ्गवीनं नवनीतकम्। नवनीतं हितं गव्यं वृष्यं वर्णबलाग्निकृत् ।।१।। संग्राहि वातपित्तासृक्क्षयार्शोऽर्दितकासहृत्। तद्धितं बालके वृद्धे विशेषादमृतं शिशोः ।।२।। मक्खन के संस्कृत नाम-म्रक्षण, सरज, हैयङ्गवीन तथा नवनीतक ये सब हैं। गाय का मक्खन-हितकर, वीर्यवर्धक, वर्ण को उत्तम करने वाला, बल तथा अग्नि को बढ़ाने वाला, मलसंग्राही, एवम् वात, पित्त, रक्तविकार, क्षय, अर्श, अर्दित वात तथा कास को दूर करने वाला होता है। तथा यह-बालक और वृद्ध के लिये हितकर एवम् विशेषकर के शिशु (अत्यन्त छोटे बच्चों) के लिये अमृत के समान गुणकारी होता है। [१-२] अथ माहिषनवनीतस्य गुणानाह नवनीतं महिष्यास्तु वातश्लेष्मकरं गुरु। दाहपित्तश्रमहरं मेदःशुक्रविवर्द्धनम् ।।३।। भैंस का मक्खन-वात तथा कफ कारक, गुरु एवम् दाह, पित्त तथा श्रम को दूर करने वाला और मेद तथा शुक्र की वृद्धि करने वाला होता है। [३] अथ दुग्धोत्थनवनीतस्य गुणानाह दुग्धोत्थं नवनीतं तु चक्षुष्यं रक्तपित्तनुत्। वृष्यं बल्यमतिस्निग्धं मधुरं ग्राहि शीतलम् ।।४।। दूध से निकला हुआ मक्खन-नेत्रों के लिये हितकर, रक्तपित्तनाशक, वीर्यवर्धक, बलकारक, अत्यन्त स्निग्ध, मधुर रसयुक्त, ग्राही तथा शीतल होता है। [४] अथ सद्योनिःसारितनवनीतस्य गुणानाह नवनीतं तु सद्यस्कं स्वादु ग्राहि हिमं लघु। मेध्यं किञ्चित्कषायाम्लमीषत्तक्रांशसङ्क्रमात् ।।५।। तत्काल का निकाला हुआ मक्खन-स्वादिष्ट, ग्राही, शीतल, लघु, मेधा के लिये हितकर एवम् किञ्चित् तक्र का अंश मिला रहने से किञ्चित् कषाय तथा अम्ल रस से युक्त भी होता है। [५] अथ चिरन्तननवनीतस्य गुणानाह सक्षारकटुकाम्लत्वाच्छर्द्यर्शःकुष्ठकारकम् । श्लेष्मलं गुरु मेदस्यं नवनीतं चिरन्तनम् ।।६।। पुराना मक्खन-क्षार, कटु तथा अम्ल रस युक्त होने से वमन, अर्श तथा कुष्ठ को उत्पन्न करने वाला होता है एवम् कफजनक, गुरु तथा मेद को बढ़ाने वाला होता है। [६] इति श्रीमिश्रलटकनतनय श्रीमिश्रभावविरचिते भावप्रकाशे वर्गप्रकरणे नवनीतवर्गः समाप्तः।
अथ घृतवर्गः तत्र घृतस्य नामगुणानाह घृतमाज्यं हविः सर्पिः कथ्यन्ते तद्गुणा अथ । घृतं रसायनं स्वादु चक्षुष्यं वह्निदीपनम् ।।१।। शीतवीर्यं विषालक्ष्मीपापपित्तानिलापहम् । अल्पाभिष्यन्दि कान्त्योजस्तेजोलावण्यवृद्धिकृत् ।।२।। स्वरस्मृतिकरं मेध्यमायुष्यं बलकृद्गुरु । उदावर्त्तज्वरोन्मादशूलानाहव्रणान् हरेत् । स्निग्धं कफकरं रक्षःक्षयवीसर्परक्तनुत् ।।३।। घी के संस्कृत नाम-घृत, आज्य, हविस् तथा सर्पिस् ये सब हैं। घी-रसायन, स्वादिष्ट, नेत्रों के लिये हितकर, अग्निदीपक, शीतवीर्य, किंचित् अभिष्यन्दौ, क्रान्ति, ओज, तेज और लावण्य की वृद्धि करने वाला, स्वर को स्वच्छ करने वाला तथा स्मरण शक्ति को बढ़ाने वाला, मेधा (धारणाशक्ति) के लिये हितकर, आयु को बढ़ाने वाला, बलकारक, गुरु, स्निग्ध, कफकारक, एवम् विष, अलक्ष्मी (दरिद्रता), पाप, पित्त, वायु, उदावर्त्त, ज्वर, उन्माद, शूल, आनाह (अफारा), व्रण, रक्षोग्रह, क्षय, वीसर्प तथा रक्तविकार को दूर करने वाला होता है। [१-३] अथ गव्यघृतस्य गुणानाह गव्यं घृतं विशेषेण चक्षुष्यं वृष्यमग्निकृत् । स्वादुपाककरं शीतं वातपित्तकफापहम् ।।४।। मेधालावण्यकान्त्योजस्तेजोवृद्धिकरं परम् । अलक्ष्मीपापरक्षोघ्नं वयसः स्थापकं गुरु ।।५।। बल्यं पवित्रमायुष्यं सुमङ्गल्यं रसायनम् । सुगन्धि रोचनं चारु सर्वाज्येषु गुणाधिकम् ।।६।। गाय का घी-विशेष करके नेत्रों के लिये हितकर, वीर्यवर्धक, अग्निवर्धक, विपाक में मधुररसयुक्त, शीतल, वात पित्त तथा कफ को नष्ट करने वाला एवम् मेधाशक्ति, लावण्य, कान्ति, ओज तथा तेज की अत्यन्त वृद्धि करने वाला, अलक्ष्मी, पाप तथा रक्षोग्रह को दूर करने वाला, अवस्था को स्थिर रखने वाला, गुरु, बलकारक, पवित्र, आयु को बढ़ाने वाला, मङ्गलदायक, रसायन, सुगन्धयुक्त, रोचक एवम् सम्पूर्ण घृतों में उत्तम तथा अधिक गुणकारी होता है। [४-६] अथ माहिषघृतस्य गुणानाह माहिषन्तु घृतं स्वादु पित्तरक्तानिलापहम् । शीतलं श्लेष्मलं वृष्यं गुरु स्वादु विपच्यते ।।७।। भैंस का घी-स्वादिष्ट, शीतल, कफजनक, वीर्यवर्धक, गुरु, विपाक में मधुर रसयुक्त एवम् पित्त और रक्त विकार तथा वात को नष्ट करने वाला होता है। [७] अथाजघृतस्य गुणानाह आजमाज्यं करोत्यग्निं चक्षुष्यं बलवर्द्धनम् । कासे श्वासे क्षये चापि हितं पाके भवेत् कटु ।।८।। बकरी का घी-जठराग्निकारक, नेत्रों के लिये हितकर, बलवर्धक, कास, श्वास तथा क्षय रोग में हितकर एवम् विपाक में कटुरसयुक्त होता है। [८] CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA
घृतवर्गः ९२३ अथौष्ट्रघृतस्य गुणानाह औष्ट्रं कटु घृतं पाके शोषक्रिमिविषापहम्। दीपनं कफवातघ्नं कुष्ठगुल्मोदरापहम्।।९।। ऊँटिनी का घी—विपाक में कटुरसयुक्त, अग्निदीपक, कफ-वात नाशक एवम् शोष, क्रिमि, विष, कुष्ठ, गुल्म तथा उदररोग को नष्ट करने वाला होता है। [९] अथाविकघृतस्य गुणानाह पाके लघ्वाविकं सर्पिः सर्वरोगविनाशनम् ।।१०।। वृद्धिं करोति चास्थ्नां वा अश्मरीशर्कराऽपहम्। चक्षुष्यमग्निसंधुक्ष्यं वातदोषनिवारणम् ।।११।। भेंड़ी का घी—पाक में लघु, सम्पूर्ण रोगों को नष्ट करने वाला, हड्डियों की वृद्धि करने वाला, नेत्रों के लिए हितकर, जठराग्नि को प्रदीप्त करने वाला एवम् पथरी, शर्करा तथा वात सम्बन्धी दोषों को दूर करने वाला होता है। [१०-११] अथ नारीघृतस्य गुणानाह कफेऽनिले योनिदोषे पित्ते रक्ते च तद्धितम्। चक्षुष्यमाज्यं स्त्रीणां वा सर्पिः स्यादाभृतोपमम् ।।१२।। स्त्री का घी—अमृत के समान होता है तथा यह नेत्रों के लिये हितकर, एवम् कफ, वात, योनिदोष, पित्त तथा रक्तविकार में भी हितकर होता है। [१२] अथ वडवाघृतस्य गुणानाह वृद्धि करोति देहाग्नेर्लघु पाके विषापहम्। तर्पणं नेत्ररोगघ्नं दाहनुद् वडवाघृतम् ।।१३।। घोड़ी का घी—देह तथा अग्नि की वृद्धि करने वाला, पाक में लघु, विषनाशक, तृप्तिकारक, नेत्ररोगनाशक तथा दाह को दूर करने वाला होता है। [१३] अथ दुग्धनिःसृतघृतस्य गुणानाह घृतं दुग्धभवं ग्राहि शीतलं नेत्ररोगहृत्। निहन्ति पित्तदाहास्रमदमूर्च्छाभ्रमानिलान् ।।१४।। दूध से निकाला हुआ घी—ग्राही, शीतल, नेत्ररोगनाशक एवम्—पित्त, दाह, रक्तविकार, मद, मूर्च्छा, भ्रम तथा वात को दूर करने वाला होता है। [१४] अथ ह्यस्तनदुग्धोत्थघृतस्य गुणानाह हविर्ह्यस्तनदुग्धोत्थं तत्स्याद्धैयङ्गवीनकम्। हैयङ्गवीनं चक्षुष्यं दीपनं रुचिकृत्परम्। बलकृद् बृंहणं वृष्यं विशेषाज्ज्वरनाशनम् ।।१५।। एक दिन के पहले के दूध से निकाले हुए घी को संस्कृत में "हैयङ्गवीन" कहते हैं। हैयङ्गवीन—यह नेत्रों के लिये हितकर, अग्निदीपक, अत्यन्त रुचिकारक, बलवर्धक, बृंहण (रसरक्तादिवर्धक), वीर्यवर्धक तथा विशेष करके ज्वरनाशक होता है। [१५] अथ पुराणघृतस्य गुणानाह वर्षादूर्ध्वं भवेदाज्यं पुराणं तत् त्रिदोषनुत् । मूर्च्छाकुष्ठविषोन्मादापस्मारतिमिरापहम् ।।१६।। यथा यथाऽखिलं सर्पिः पुराणमधिकं भवेत्तत् । तथा तथा गुणैः स्वैः स्वैरधिकं तदुदाहृतम् ।।१७।।