भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

पृष्ठ 974, कुल 1167 में से

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घृतवर्गः ९२३ अथौष्ट्रघृतस्य गुणानाह औष्ट्रं कटु घृतं पाके शोषक्रिमिविषापहम्। दीपनं कफवातघ्नं कुष्ठगुल्मोदरापहम्।।९।। ऊँटिनी का घी—विपाक में कटुरसयुक्त, अग्निदीपक, कफ-वात नाशक एवम् शोष, क्रिमि, विष, कुष्ठ, गुल्म तथा उदररोग को नष्ट करने वाला होता है। [९] अथाविकघृतस्य गुणानाह पाके लघ्वाविकं सर्पिः सर्वरोगविनाशनम् ।।१०।। वृद्धिं करोति चास्थ्नां वा अश्मरीशर्कराऽपहम्। चक्षुष्यमग्निसंधुक्ष्यं वातदोषनिवारणम् ।।११।। भेंड़ी का घी—पाक में लघु, सम्पूर्ण रोगों को नष्ट करने वाला, हड्डियों की वृद्धि करने वाला, नेत्रों के लिए हितकर, जठराग्नि को प्रदीप्त करने वाला एवम् पथरी, शर्करा तथा वात सम्बन्धी दोषों को दूर करने वाला होता है। [१०-११] अथ नारीघृतस्य गुणानाह कफेऽनिले योनिदोषे पित्ते रक्ते च तद्धितम्। चक्षुष्यमाज्यं स्त्रीणां वा सर्पिः स्यादाभृतोपमम् ।।१२।। स्त्री का घी—अमृत के समान होता है तथा यह नेत्रों के लिये हितकर, एवम् कफ, वात, योनिदोष, पित्त तथा रक्तविकार में भी हितकर होता है। [१२] अथ वडवाघृतस्य गुणानाह वृद्धि करोति देहाग्नेर्लघु पाके विषापहम्। तर्पणं नेत्ररोगघ्नं दाहनुद् वडवाघृतम् ।।१३।। घोड़ी का घी—देह तथा अग्नि की वृद्धि करने वाला, पाक में लघु, विषनाशक, तृप्तिकारक, नेत्ररोगनाशक तथा दाह को दूर करने वाला होता है। [१३] अथ दुग्धनिःसृतघृतस्य गुणानाह घृतं दुग्धभवं ग्राहि शीतलं नेत्ररोगहृत्। निहन्ति पित्तदाहास्रमदमूर्च्छाभ्रमानिलान् ।।१४।। दूध से निकाला हुआ घी—ग्राही, शीतल, नेत्ररोगनाशक एवम्—पित्त, दाह, रक्तविकार, मद, मूर्च्छा, भ्रम तथा वात को दूर करने वाला होता है। [१४] अथ ह्यस्तनदुग्धोत्थघृतस्य गुणानाह हविर्ह्यस्तनदुग्धोत्थं तत्स्याद्धैयङ्गवीनकम्। हैयङ्गवीनं चक्षुष्यं दीपनं रुचिकृत्परम्। बलकृद् बृंहणं वृष्यं विशेषाज्ज्वरनाशनम् ।।१५।। एक दिन के पहले के दूध से निकाले हुए घी को संस्कृत में "हैयङ्गवीन" कहते हैं। हैयङ्गवीन—यह नेत्रों के लिये हितकर, अग्निदीपक, अत्यन्त रुचिकारक, बलवर्धक, बृंहण (रसरक्तादिवर्धक), वीर्यवर्धक तथा विशेष करके ज्वरनाशक होता है। [१५] अथ पुराणघृतस्य गुणानाह वर्षादूर्ध्वं भवेदाज्यं पुराणं तत् त्रिदोषनुत् । मूर्च्छाकुष्ठविषोन्मादापस्मारतिमिरापहम् ।।१६।। यथा यथाऽखिलं सर्पिः पुराणमधिकं भवेत्तत् । तथा तथा गुणैः स्वैः स्वैरधिकं तदुदाहृतम् ।।१७।।

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