भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें९२४ भावप्रकाशनिघण्टुः पुराना घी—एक वर्ष से ऊपर का रक्खा हुआ घी पुराना कहलाता है । पुराना घी—त्रिदोषनाशक एवम्, मूर्च्छा, कुष्ठ, विष, उन्माद, मिर्गी तथा तिमिर रोग को दूर करने वाला होता है । पूर्वोक्त सभी घृत—जैसे-जैसे अधिक पुराने होते जायेंगे वैसे-वैसे अपने-अपने गुणों को अधिक करते जायेंगे अर्थात् उत्तरोत्तर अधिक गुणकारी होते जायेंगे । [१६-१७] अथ नवीनघृतस्य विषयानाह योजयेन्नवमे वाज्यं भोजने तर्पणे श्रमे । बलक्षये पाण्डुरोगे कामलानेत्ररोगयोः ।। १८ ।। नवीन घी के प्रयोग करने के विषय—भोजन, तर्पण, परिश्रम, बल का क्षय, पाण्डु, कामला तथा नेत्ररोग इन सबों में नवीन घृत का ही प्रयोग करना चाहिये । [१८] अथ घृतप्रयोगस्याविषयानाह राजयक्ष्मणि बाले च वृद्धे श्लेष्मकृते गदे ।। १९ ।। रोगे सोमे विषूच्याञ्च विबन्धे च मदात्यये । ज्वरे च दहने मन्दे न सर्पिर्बहु मन्यते ।। २० ।। घी प्रयोग करने के अविषय—बालक तथा वृद्ध लोगों के लिये, एवम् राजयक्ष्मा, कफजन्यरोग, आमयुक्त रोग, विषूचिका (हैजा), मलबन्ध, मदात्ययं, ज्वर तथा अग्नि की मन्दता इन सबों में घी देना अत्यन्त प्रशस्त नहीं है। [१९-२०] इति श्रीमिश्रलटकनतनय श्रीमिश्रभावविरचिते भावप्रकाशे वर्गप्रकरणे घृतवर्गः समाप्तः ।।